aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aavaaraa"
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँजगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्तेकि बख़्शा गया जिन को ज़ौक़-ए-गदाईज़माने की फटकार सरमाया इन काजहाँ भर की धुत्कार इन की कमाई
हैं लाखों रोग ज़माने में क्यूँ इश्क़ है रुस्वा बे-चाराहैं और भी वजहें वहशत की इंसान को रखतीं दुखियाराहाँ बे-कल बे-कल रहता है हो पीत में जिस ने जी हारापर शाम से ले कर सुब्ह तलक यूँ कौन फिरेगा आवाराये बातें झूटी बातें ये लोगों ने फैलाईं हैंतुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं
वक़्त के अगले शहर के सारे बाशिंदेसब दिन सब रातेंजो तुम से ना-वाक़िफ़ होंगेवो कब मेरी बात सुनेंगेमुझ से कहेंगेजाओ अपनी राह लो राहीहम को कितने काम पड़े हैंजो बीती सो बीत गईअब वो बातें क्यूँ दोहराते होकंधे पर ये झोली रक्खेक्यूँ फिरते हो क्या पाते होमैं बे-चाराइक बंजाराआवारा फिरते फिरते जब थक जाऊँगातन्हाई के टीले पर जा कर बैठूँगाफिर जैसे पहचान के मुझ कोइक बंजारा जान के मुझ कोवक़्त के अगले शहर के सारे नन्हे-मुन्ने भोले लम्हेनंगे पाँवदौड़े दौड़े भागे भागे आ जाएँगेमुझ को घेर के बैठेंगेऔर मुझ से कहेंगेक्यूँ बंजारेतुम तो वक़्त के कितने शहरों से गुज़रे होउन शहरों की कोई कहानी हमें सुनाओउन से कहूँगानन्हे लम्हो!एक थी रानीसुन के कहानीसारे नन्हे लम्हेग़मगीं हो कर मुझ से ये पूछेंगेतुम क्यूँ इन के शहर न आईंलेकिन उन को बहला लूँगाउन से कहूँगाये मत पूछोआँखें मूँदोऔर ये सोचोतुम होतीं तो कैसा होतातुम ये कहतींतुम वो कहतींतुम इस बात पे हैराँ होतींतुम उस बात पे कितनी हँसतींतुम होतीं तो ऐसा होतातुम होतीं तो वैसा होता
दयार-ए-शर्क़ की आबादियों के ऊँचे टीलों परकभी आमों के बाग़ों में कभी खेतों की मेंडों परकभी झीलों के पानी में कभी बस्ती की गलियों मेंकभी कुछ नीम उर्यां कमसिनों की रंगरलियों मेंसहर-दम झुटपुटे के वक़्त रातों के अँधेरे मेंकभी मेलों में नाटक-टोलियों में उन के डेरे मेंतआक़ुब में कभी गुम तितलियों के सूनी राहों मेंकभी नन्हे परिंदों की नहुफ़्ता ख़्वाब-गाहों मेंबरहना पाँव जलती रेत यख़-बस्ता हवाओं मेंगुरेज़ाँ बस्तियों से मदरसों से ख़ानक़ाहों मेंकभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम ओ दिल-रफ़्ताकभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ताहवा में तैरता ख़्वाबों में बादल की तरह उड़तापरिंदों की तरह शाख़ों में छुप कर झूलता मुड़तामुझे इक लड़का आवारा-मनुश आज़ाद सैलानीमुझे इक लड़का जैसे तुंद चश्मों का रवाँ पानीनज़र आता है यूँ लगता है जैसे ये बला-ए-जाँमिरा हम-ज़ाद है हर गाम पर हर मोड़ पर जौलाँइसे हम-राह पाता हूँ ये साए की तरह मेरातआक़ुब कर रहा है जैसे मैं मफ़रूर मुल्ज़िम हूँये मुझ से पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगागुज़र गया अब वो दौर-ए-साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वालेबनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होगाकभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगेबरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ारज़ार होगासुना दिया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िरजो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगानिकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया थासुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगाकिया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन मेंतो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह-फट है ख़्वार होगादयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं हैखरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगातुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगीजो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगासफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर-ए-ना-तावाँ काहज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगाचमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली कोये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगाजो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखायायही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए'तिबार होगाकहा जो क़ुमरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा-ब-गिल हैंतू ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगाख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारेमैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगाये रस्म-ए-बज़्म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भीरहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे-क़रार होगामैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूँगा अपने दर-माँदा कारवाँ कोशरर-फ़िशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला-बार होगानहीं है ग़ैर-अज़-नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी कातू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगान पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस कीकहीं सर-ए-राहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा
ओ देस से आने वाला है बताओ देस से आने वाले बताकिस हाल में हैं यारान-ए-वतनआवारा-ए-ग़ुर्बत को भी सुनाकिस रंग में है कनआन-ए-वतनवो बाग़-ए-वतन फ़िरदौस-ए-वतनवो सर्व-ए-वतन रैहान-ए-वतनओ देस से आने वाले बता
इस क़दर भी नहीं मुझे मा'लूमकिस मोहल्ले में है मकाँ तेराकौन सी शाख़-ए-गुल पे रक़्साँ हैरश्क-ए-फ़िरदौस आशियाँ तेराजाने किन वादियों में उतरा हैग़ैरत-ए-हुस्न कारवाँ तेराकिस से पूछूँगा मैं ख़बर तेरीकौन बतलाएगा निशाँ तेरातेरी रुस्वाइयों से डरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँहाल-ए-दिल भी न कह सका गरचेतू रही मुद्दतों क़रीब मिरेकुछ तिरी अज़्मतों का डर भी थाकुछ ख़यालात थे अजीब मिरेआख़िर-ए-कार वो घड़ी आईबार-वर हो गए रक़ीब मिरेतू मुझे छोड़ कर चली भी गईख़ैर क़िस्मत मिरी नसीब मिरेअब मैं क्यूँ तुझ को याद करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँगो ज़माना तिरी मोहब्बत काएक भूली हुई कहानी हैतेरे कूचे में उम्र-भर न गएसारी दुनिया की ख़ाक छानी हैलज़्ज़त-ए-वस्ल हो कि ज़ख़्म-ए-फ़िराक़जो भी हो तेरी मेहरबानी हैकिस तमन्ना से तुझ को चाहा थाकिस मोहब्बत से हार मानी हैअपनी क़िस्मत पे नाज़ करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँअश्क पलकों पे आ नहीं सकतेदिल में है तेरी आबरू अब भीतुझ से रौशन है काएनात मिरीतेरे जल्वे हैं चार-सू अब भीअपने ग़म-ख़ाना-ए-तख़य्युल मेंतुझ से होती है गुफ़्तुगू अब भीतुझ को वीराना-ए-तसव्वुर मेंदेख लेता हूँ रू-ब-रू अब भीअब भी मैं तुझ को प्यार करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँआज भी कार-ज़ार-ए-हस्ती मेंतू अगर एक बार मिल जाएकिसी महफ़िल में सामना हो जाएया सर-ए-रहगुज़ार मिल जाएइक नज़र देख ले मोहब्बत सेएक लम्हे का प्यार मिल जाएआरज़ूओं को चैन आ जाएहसरतों को क़रार मिल जाएजाने क्या क्या ख़याल करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँआज मैं ऐसे मक़ाम पर हूँ जहाँरसन-ओ-दार की बुलंदी हैमेरे अशआ'र की लताफ़त मेंतेरे किरदार की बुलंदी हैतेरी मजबूरियों की अज़्मत हैमेरे ईसार की बुलंदी हैसब तिरे दर्द की इनायत हैसब तिरे प्यार की बुलंदी हैतेरे ग़म से निबाह करता हैजब तिरे शहर से गुज़रता हूँतुझ से कोई गिला नहीं मुझ कोमैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहतातेरा मिलना ख़याल-ओ-ख़्वाब हुआफिर भी ना-आश्ना नहीं कहतावो जो कहता था मुझ को आवारामैं उसे भी बुरा नहीं कहतावर्ना इक बे-नवा मोहब्बत मेंदिल के लुटने पे क्या नहीं कहतामैं तो मुश्किल से आह भरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँकोई पुर्सान-ए-हाल हो तो कहूँकैसी आँधी चली है तेरे बा'ददिन गुज़ारा है किस तरह मैं नेरात कैसे ढली है तेरे बा'दशम-ए-उम्मीद सरसर-ए-ग़म मेंकिस बहाने जली है तेरे बा'दजिस में कोई मकीं न रहता होदिल वो सूनी गली है तेरे बा'दरोज़ जीता हूँ रोज़ मरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँलेकिन ऐ साकिन-ए-हरीम-ए-ख़यालयाद है दौर-ए-कैफ़-ओ-कम कि नहींक्या कभी तेरे दिल पे गुज़रा हैमेरी महरूमियों का ग़म कि नहींमेरी बर्बादियों का सुन कर हालआँख तेरी हुई है नम कि नहींऔर इस कार-ज़ार-ए-हस्ती मेंफिर कभी मिल सकेंगे हम कि नहींडरते डरते सवाल करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँ
इतनी मुद्दत दिल-ए-आवारा कहाँ था कि तुझेअपने ही घर के दर-ओ-बाम भुला बैठे हैंयाद यारों ने तो कब हर्फ़-ए-मोहब्बत रक्खाग़ैर भी तअना ओ दुश्नाम भुला बैठे हैं
और कुछ देर में लुट जाएगा हर बाम पे चाँदअक्स खो जाएँगे आईने तरस जाएँगेअर्श के दीदा-ए-नमनाक से बारी-बारीसब सितारे सर-ए-ख़ाशाक बरस जाएँगेआस के मारे थके हारे शबिस्तानों मेंअपनी तन्हाई समेटेगा, बिछाएगा कोईबेवफ़ाई की घड़ी, तर्क-ए-मदारात का वक़्तइस घड़ी अपने सिवा याद न आएगा कोईतर्क-ए-दुनिया का समाँ ख़त्म-ए-मुलाक़ात का वक़्तइस घड़ी ऐ दिल-ए-आवारा कहाँ जाओगेइस घड़ी कोई कसी का भी नहीं रहने दोकोई इस वक़्त मिले गा ही नहीं रहने दोऔर मिले गा भी इस तौर कि पछताओगेइस घड़ी ऐ दिल-ए-आवारा कहाँ जाओगे
अहद-ए-गुम-गश्ता की तस्वीर दिखाती क्यूँ होएक आवारा-ए-मंज़िल को सताती क्यूँ होवो हसीं अहद जो शर्मिंदा-ए-ईफ़ा न हुआउस हसीं अहद का मफ़्हूम जताती क्यूँ होज़िंदगी शोला-ए-बे-बाक बना लो अपनीख़ुद को ख़ाकिस्तर-ए-ख़ामोश बनाती क्यूँ होमैं तसव्वुफ़ के मराहिल का नहीं हूँ क़ाइलमेरी तस्वीर पे तुम फूल चढ़ाती क्यूँ होकौन कहता है कि आहें हैं मसाइब का इलाजजान को अपनी अबस रोग लगाती क्यूँ होएक सरकश से मोहब्बत की तमन्ना रख करख़ुद को आईन के फंदों में फंसाती क्यूँ होमैं समझता हूँ तक़द्दुस को तमद्दुन का फ़रेबतुम रसूमात को ईमान बनाती क्यूँ होजब तुम्हें मुझ से ज़ियादा है ज़माने का ख़यालफिर मिरी याद में यूँ अश्क बहाती क्यूँ होतुम में हिम्मत है तो दुनिया से बग़ावत कर दोवर्ना माँ बाप जहाँ कहते हैं शादी कर लो
दिल दर्द की शिद्दत से ख़ूँ-गश्ता ओ सी-पाराइस शहर में फिरता है इक वहशी-ओ-आवाराशायर है कि आशिक़ है, जोगी है कि बंजारादरवाज़ा खुला रखना
पथरीले कोहसार के गाते चश्मों मेंगूँज रही है एक औरत की नर्म हँसीदौलत ताक़त और शोहरत सब कुछ भी नहींउस के बदन में छुपी है उस की आज़ादीदुनिया के मा'बद के नए बुत कुछ कर लेंसुन नहीं सकते उस की लज़्ज़त की सिसकीइस बाज़ार में गो हर माल बिकाऊ हैकोई ख़रीद के लाए ज़रा तस्कीन उस कीइक सरशारी जिस से वो ही वाक़िफ़ हैचाहे भी तो उस को बेच नहीं सकतीवादी की आवारा हवाओ आ जाओआओ और उस के चेहरे पर बोसे दोअपने लम्बे लम्बे बाल उड़ाती जाएहवा की बेटी साथ हवा के गाती जाए
इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मिरा सरमाया हैदोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़्र करूँकोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहींकिस को दिल नज़्र करूँ और किसे जाँ नज़्र करूँतुम भी महबूब मिरे, तुम भी हो दिलदार मिरेआश्ना मुझ से मगर तुम भी नहीं, तुम भी नहींख़त्म है तुम पे मसीहा-नफ़सी, चारागरीमहरम-ए-दर्द-ए-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहींअपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहींदस्त-ओ-बाज़ू मिरे नाकारा हुए जाते हैंजिन से हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़आज सज्दे वही आवारा हुए जाते हैंदर्द-ए-मंज़िल थी, मगर ऐसी भी कुछ दूर न थीले के फिरती रही रस्ते ही में वहशत मुझ कोएक ज़ख़्म ऐसा न खाया कि बहार आ जातीदार तक ले के गया शौक़-ए-शहादत मुझ कोराह में टूट गए पाँव तो मालूम हुआजुज़ मिरे और मिरा राह-नुमा कोई नहींएक के ब'अद ख़ुदा एक चला आता थाकह दिया अक़्ल ने तंग आ के ख़ुदा कोई नहीं
मुझ को देखो कि मैं वही तो हूँजिस को कूड़ों की छाँव में दुनियाबेचती भी खरीदती भी थीमुझ को देखो कि मैं वही तो हूँजिस को खेतों से ऐसे बाँधा थाजैसे मैं उन का एक हिस्सा थाखेत बिकते तो मैं भी बिकता थामुझ को देखो कि मैं वही तो हूँकुछ मशीनें बनाईं जब मैं नेउन मशीनों के मालिकों ने मुझेबे-झिजक उन में ऐसे झोंक दियाजैसे मैं कुछ नहीं हूँ ईंधन हूँमुझ को देखो कि मैं थका-हाराफिर रहा हूँ जुगों से आवारातुम यहाँ से हटो तो आज की रातसो रहूँ मैं इसी चबूतरे पर
ऐ सर-ज़मीन-ए-पाक के यारान-ए-नेक-नामबा-सद ख़ुलूस शाइर-ए-आवरा का सलाम
एक पहाड़ी कचरे कीऔर उस पर फिरतेआवारा कुत्तों से बच्चेअपना बचपन ढूँड रहे हैं
चीथडों में दीदनी है रू-ए-ग़मगीन-ए-शबाबअब्र के आवारा टुकड़ों में हो जैसे माहताब
सारे दिन की थकी,वीरान और बे-मसरफ़ रात कोएक अजीब मश्ग़ला हाथ आ गया हैअब वो!सारे शहर की आवारा परछाइयों कोजिस्म देने की कोशिश में मसरूफ़ हैमुझे मालूम हैअगर गुम-नाम परछाइयों कोउन की पहचान मिल गईतो शहर के मुअज़्ज़ज़ और इबादत-गुज़ार शरीफ़-ज़ादेहम-शक्ल परछाइयों के ख़ौफ़ सेपरछाइयों में तब्दील हो जाएँगेऔरबे-मसरफ़ दिन भर की थकी हुई रात कोएक और मश्ग़ला मिल जाएगा
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