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नज़्म
यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो
तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
देखिए देते हैं किस किस को सदा मेरे बाद
'कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़'
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जा-ब-जा क़ुमरी-ओ-बुलबुल की सदा शोर-अफ़्गन
वाँ भी देखा तो फ़क़त गुल है खिला पैसे का
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बाहें फैलाए हुए रास्ता रोके है खड़ा
कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द अफ़गन-ए-इश्क़
मोहम्मद दीन तासीर
नज़्म
दम-ए-सुब्ह-ए-बहारी है रुख़-ए-ख़ुर पर नक़ाब-अफ़्गन
किसी आईने पर तार-ए-नफ़स जैसे बिखरते हैं
नज़्म तबातबाई
नज़्म
कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़्गन-ए-इल्म
किस के सर जाएगा अब बार-ए-गिरान-ए-उर्दू
मसऊद हुसैन ख़ां
नज़्म
साया-ए-अफ़्गन हूँ कुहन साल दरख़्त उस जा पर
ऐसी ठंडक हो कि बस आए वहाँ जान में जान
सूरज नारायण मेहर
नज़्म
और ऐसे हंगाम में इक आवाज़-ए-नूर अफ़्गन
ज़ुहूर-ए-ख़ुर्शीद की बशारत से दश्त ओ दर को जला रही थी
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
बे-मुरव्वत नावक-अफ़गन का कोई क्या दे निशान
नाम उस बे-दर्द का मशहूर अब सय्याद है