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नज़्म
हुमुक़ की अबक़रिय्यत और सफ़ाहत के तफ़क्कुर ने
हमें तज़ई-ए-मोहलत के लिए अकवान बख़्शे हैं
जौन एलिया
नज़्म
जो और किसी की जाँ बख़्शे तो उस की भी हक़ जान रखे
जो और किसी की आन रखे तो उस की भी हक़ आन रखे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
नेमतें सब बट चुकीं लेकिन न होना मुज़्महिल
सब को बख़्शे हैं दिमाग़ और ले तुझे देते हैं दिल
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मगर मेरी निगाहों में हैं चेहरे उन जवानों के
जिन्हें 'इक़बाल' ने बख़्शे हैं बाज़ू क़हर-मानों के
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
मिरे वालिद ख़ुदा बख़्शे कहीं आते न जाते थे
सहर से शाम तक अमाँ के आगे दुम हिलाते थे