aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "baasii"
हदफ़ होंगे तुम्हारा कौन तुम किस के हदफ़ होगेन जाने वक़्त की पैकार में तुम किस तरफ़ होगेहै रन ये ज़िंदगी इक रन जो बरपा लम्हा लम्हा हैहमें इस रन में कुछ भी हो किसी जानिब तो होना हैसो हम भी इस नफ़स तक हैं सिपाही एक लश्कर केहज़ारों साल से जीते चले आए हैं मर मर केशुहूद इक फ़न है और मेरी अदावत बे-फ़नों से हैमिरी पैकार अज़ल सेये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या हैहमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' कासो रिज़्क़-ए-फ़ख़्र अब हम खा रहे हैं 'मीर'-ए-बिस्मिल कासिधारत भी था शर्मिंदा कि दो-आबे का बासी थातुम्हें मालूम है उर्दू जो है पाली से निकली हैवो गोया उस की ही इक पुर-नुमू डाली से निकली है
ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारोये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारोविर्से में हमें ये ग़म है मिला इस ग़म को नया क्या लिखनाज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
प्यार पर बस तो नहीं है मिरा लेकिन फिर भीतू बता दे कि तुझे प्यार करूँ या न करूँतू ने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हेंउन तमन्नाओं का इज़हार करूँ या न करूँ
मैं ने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटींतुम ने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़ेमैं ने जेबों से निकालीं सभी सूखी नज़्मेंतुम ने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोलेअपनी इन आँखों से मैं ने कई माँजे तोड़ेऔर हाथों से कई बासी लकीरें फेंकींतुम ने पलकों पे नमी सूख गई थी सो गिरा दीरात भर जो भी मिला उगते बदन पर हम कोकाट के डाल दिया जलते अलाव में उसे
मैं बंजारावक़्त के कितने शहरों से गुज़रा हूँलेकिनवक़्त के इस इक शहर से जाते जाते मुड़ के देख रहा हूँसोच रहा हूँतुम से मेरा ये नाता भी टूट रहा हैतुम ने मुझ को छोड़ा था जिस शहर में आ करवक़्त का अब वो शहर भी मुझ से छूट रहा हैमुझ को विदाअ करने आए हैंइस नगरी के सारे बासीवो सारे दिनजिन के कंधे पर सोती हैअब भी तुम्हारी ज़ुल्फ़ की ख़ुशबूसारे लम्हेजिन के माथे पर रौशनअब भी तुम्हारे लम्स का टीकानम आँखों सेगुम-सुम मुझ को देख रहे हैंमुझ को इन के दुख का पता हैइन को मेरे ग़म की ख़बर हैलेकिन मुझ को हुक्म-ए-सफ़र हैजाना होगावक़्त के अगले शहर मुझे अब जाना होगा
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
जग के चारों कूट में घूमा सैलानी हैराँ हो करइस बस्ती के इस कूचे के इस आँगन में ऐसा चाँद
कभी हम ख़ूब-सूरत थेकिताबों में बसीख़ुश्बू की सूरतसाँस साकिन थीबहुत से अन-कहे लफ़्ज़ों सेतस्वीरें बनाते थेपरिंदों के परों पर नज़्म लिख करदूर की झीलों में बसने वालेलोगों को सुनाते थेजो हम से दूर थेलेकिन हमारे पास रहते थेनए दिन की मसाफ़तजब किरन के साथआँगन में उतरती थीतो हम कहते थेअम्मी तितलियों के परबहुत ही ख़ूब-सूरत हैंहमें माथे पे बोसा दोकि हम को तितलियों केजुगनुओं के देस जाना हैहमें रंगों के जुगनूरौशनी की तितलियाँ आवाज़ देती हैंनए दिन की मसाफ़तरंग में डूबी हवा के साथखिड़की से बुलाती हैहमें माथे पे बोसा दोहमें माथे पे बोसा दो
वो नौ-ख़ेज़ नूरा वो इक बिन्त-ए-मरियमवो मख़मूर आँखें वो गेसू-ए-पुर-ख़मवो अर्ज़-ए-कलीसा की इक माह-पारावो दैर-ओ-हरम के लिए इक शरारावो फ़िरदौस-ए-मरियम का इक ग़ुंचा-ए-तरवो तसलीस की दुख़्तर-ए-नेक-अख़्तरवो इक नर्स थी चारा-गर जिस को कहिएमदावा-ए-दर्द-ए-जिगर जिस को कहिएजवानी से तिफ़्ली गले मिल रही थीहवा चल रही थी कली खिल रही थीवो पुर-रोब तेवर वो शादाब चेहरामता-ए-जवानी पे फ़ितरत का पहरामिरी हुक्मरानी है अहल-ए-ज़मीं परये तहरीर था साफ़ उस की जबीं परसफ़ेद और शफ़्फ़ाफ़ कपड़े पहन करमिरे पास आती थी इक हूर बन करवो इक आसमानी फ़रिश्ता थी गोयाकि अंदाज़ था उस में जिब्रईल का सावो इक मरमरीं हूर ख़ुल्द-ए-बरीं कीवो ताबीर आज़र के ख़्वाब-ए-हसीं कीवो तस्कीन-ए-दिल थी सुकून-ए-नज़र थीनिगार-ए-शफ़क़ थी जमाल-ए-नज़र थीवो शो'ला वो बिजली वो जल्वा वो परतवसुलैमाँ की वो इक कनीज़-ए-सुबुक-रौकभी उस की शोख़ी में संजीदगी थीकभी उस की संजीदगी में भी शोख़ीघड़ी चुप घड़ी करने लगती थी बातेंसिरहाने मिरे काट देती थी रातेंअजब चीज़ थी वो अजब राज़ थी वोकभी सोज़ थी वो कभी साज़ थी वोनक़ाहत के आलम में जब आँख उठतीनज़र मुझ को आती मोहब्बत की देवीवो उस वक़्त इक पैकर-ए-नूर होतीतख़य्युल की पर्वाज़ से दूर होतीहंसाती थी मुझ को सुलाती थी मुझ कोदवा अपने हाथों से मुझ को पिलातीअब अच्छे हो हर रोज़ मुज़्दा सुनातीसिरहाने मिरे एक दिन सर झुकाएवो बैठी थी तकिए पे कुहनी टिकाएख़यालात-ए-पैहम में खोई हुई सीन जागी हुई सी न सोई हुई सीझपकती हुई बार बार उस की पलकेंजबीं पर शिकन बे-क़रार उस की पलकेंवो आँखों के साग़र छलकते हुए सेवो आरिज़ के शोले भड़कते हुए सेलबों में था लाल-ओ-गुहर का ख़ज़ानानज़र आरिफ़ाना अदा राहिबानामहक गेसुओं से चली आ रही थीमिरे हर नफ़स में बसी जा रही थीमुझे लेटे लेटे शरारत की सूझीजो सूझी भी तो किस क़यामत की सूझीज़रा बढ़ के कुछ और गर्दन झुका लीलब-ए-लाल-ए-अफ़्शाँ से इक शय चुरा लीवो शय जिस को अब क्या कहूँ क्या समझिएबेहिश्त-ए-जवानी का तोहफ़ा समझिएशराब-ए-मोहब्बत का इक जाम-ए-रंगींसुबू-ज़ार-ए-फ़ितरत का इक जाम-ए-रंगींमैं समझा था शायद बिगड़ जाएगी वोहवाओं से लड़ती है लड़ जाएगी वोमैं देखूँगा उस के बिफरने का आलमजवानी का ग़ुस्सा बिखरने का आलमइधर दिल में इक शोर-ए-महशर बपा थामगर उस तरफ़ रंग ही दूसरा थाहँसी और हँसी इस तरह खिलखिला करकि शम-ए-हया रह गई झिलमिला करनहीं जानती है मिरा नाम तक वोमगर भेज देती है पैग़ाम तक वोये पैग़ाम आते ही रहते हैं अक्सरकि किस रोज़ आओगे बीमार हो कर
कल भी मेरी प्यास पे दरिया हँसते थेआज भी मेरे दर्द का दरमाँ कोई नहींमैं इस धरती का अदना सा बासी हूँसच पूछो तो मुझ सा परेशाँ कोई नहींकैसे कैसे ख़्वाब बुने थे आँखों नेआज भी उन ख़्वाबों सा अर्ज़ां कोई नहींकल भी मेरे ज़ख़्म भुनाए जाते थेआज भी मेरे हाथ में दामाँ कोई नहींकल मेरा नीलाम किया था ग़ैरों नेआज तो मेरे अपने बेचे देते हैंसच पूछो तो मेरी ख़ता बस इतनी हैमैं इस धरती का अदना सा बासी हूँ
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
आह जब दिल से निकलती है असर रखती हैगुलशन-ए-ज़ीस्त जलाने को शरर रखती हैतोप तलवार न ये तेग़-ओ-तबर रखती हैबिंत-ए-हव्वा की तरह तीर-ए-नज़र रखती हैइतना पुर-सोज़ हुआ नाला-ए-सफ़्फ़ाक मिराकर गया दिल पे असर शिकवा-ए-बेबाक मिराये कहा सुन के ससुर ने कि कहीं है कोईसास चुपके से ये बोलीं कि यहीं है कोईसालियाँ कहने लगीं क़ुर्ब-ओ-क़रीं है कोईसाले ये बोले कि मरदूद-ओ-लईं है कोईकुछ जो समझा है तो हम-ज़ुल्फ़ के बेहतर समझामुझ को बेगम का सताया हुआ शौहर समझाअपने हालात पे तुम ग़ौर ज़रा कर लो अगरजल्द खुल जाएगी फिर सारी हक़ीक़त तुम परमैं ने उगने न दिया ज़ेहन में नफ़रत का शजरतुम पे डाली है सदा मैं ने मोहब्बत की नज़रकह के सरताज तुम्हें सर पे बिठाया मैं नेतुम तो बेटे थे फ़क़त बाप बनाया मैं नेमैं ने ससुराल में हर शख़्स की इज़्ज़त की हैसास ससुरे नहीं ननदों की भी ख़िदमत की हैजेठ देवर से जेठानी से मोहब्बत की हैमैं ने दिन रात मशक़्क़त ही मशक़्क़त की हैफिर भी होंटों पे कोई शिकवा गिला कुछ भी नहींमेरे दिन रात की मेहनत का सिला कुछ भी नहींसुब्ह-दम बच्चों को तय्यार कराती हूँ मैंनाश्ता सब के लिए रोज़ बनाती हूँ मैंबासी तुम खाते नहीं ताज़ा पकाती हूँ मैंछोड़ने बच्चों को स्कूल भी जाती हूँ मैंमैं कि इंसान हूँ इंसान नहीं जिन कोईमेरी तक़दीर में छुट्टी का नहीं दिन कोईवो भी दिन थे कि दुल्हन बन के मैं जब आई थीसाथ में जीने की मरने की क़सम खाई थीप्यार आँखों में था आवाज़ में शहनाई थीकभी महबूब तुम्हारी यही हरजाई थीअपने घर के लिए ये हस्ती मिटा दी मैं नेज़िंदगी राह-ए-मोहब्बत में लुटा दी मैं नेकिस क़दर तुम पे गिराँ एक फ़क़त नारी हैदाल रोटी जिसे देना भी तुम्हें भारी हैमुझ से कब प्यार है औलाद तुम्हें प्यारी हैतुम ही कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैघर तो बीवी से है बीवी जो नहीं घर भी नहींये डबल बेड ये तकिया नहीं चादर भी नहींमैं ने माना कि वो पहली सी जवानी न रहीहर शब-ए-वस्ल नई कोई कहानी न रहीक़ुल्ज़ुम-ए-हुस्न में पहली सी रवानी न रहीअब मैं पहले की तरह रात की रानी न रहीअपनी औलाद की ख़ातिर मैं जवाँ हूँ अब भीजिस के क़दमों में है जन्नत वही माँ हूँ अब भीथे जो अज्दाद तुम्हारे न था उन का ये शिआरतुम हो बीवी से परेशान वो बीवी पे निसारतुम क्या करते हो हर वक़्त ये जो तुम बेज़ारतुम हो गुफ़्तार के ग़ाज़ी वो सरापा किरदारअपने अज्दाद का तुम को तो कोई पास नहींहम तो बेहिस हैं मगर तुम भी तो हस्सास नहींनहीं जिन मर्दों को परवा-ए-नशेमन तुम होअच्छी लगती है जिसे रोज़ ही उलझन तुम होबन गए अपनी गृहस्ती के जो दुश्मन तुम होहो के ग़ैरों पे फ़िदा बीवी से बद-ज़न तुम होफिर से आबाद नई कोई भी वादी कर लोकिसी कलबिस्नी से अब दूसरी शादी कर लो
'इंशा'-जी ये कौन आया किस देस का बासी हैहोंटों पे तबस्सुम है आँखों में उदासी हैख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा हैया सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा हैतरसी हुई नज़रों को अब और न तरसा रेऐ हुस्न के सौदागर ऐ रूप के बंजारेरमना दिल-ए-'इंशा' का अब तेरा ठिकाना होअब कोई भी सूरत हो अब कोई बहाना हो
धुँदलाई हुई शाम थीअलसाई हुई सीऔर वक़्त भी बासी था मैं जब शहर में आयाहर शाख़ से लिपटे हुए सन्नाटे खड़े थेदीवारों से चिपकी हुई ख़ामोशी पड़ी थीराहों में नफ़्स कोई न परछाईं न सायाउन गलियों में कूचों में, अंधेरा न उजालादरवाज़ों के पट बंद थे, ख़ाली थे दरीचेबस वक़्त के कुछ बासी से टुकड़े थे, पड़े थे
काश मैं तेरे बुन-ए-गोश में बुंदा होतारात को बे-ख़बरी में जो मचल जाता मैंतो तिरे कान से चुप-चाप निकल जाता मैंसुब्ह को गिरते तिरी ज़ुल्फ़ों से जब बासी फूलमेरे खो जाने पे होता तिरा दिल कितना मलूलतू मुझे ढूँढती किस शौक़ से घबराहट मेंअपने महके हुए बिस्तर की हर इक सिलवट मेंजूँही करतीं तिरी नर्म उँगलियाँ महसूस मुझेमिलता इस गोश का फिर गोशा-ए-मानूस मुझेकान से तू मुझे हरगिज़ न उतारा करतीतू कभी मेरी जुदाई न गवारा करतीयूँ तिरी क़ुर्बत-ए-रंगीं के नशे में मदहोशउम्र भर रहता मिरी जाँ मैं तिरा हल्क़ा-ब-गोशकाश मैं तेरे बुन-ए-गोश में बुंदा होता
माज़ी की डेवढ़ी की चिलमनखुले दरीचे की जाली सेछन छन आएँरूप की जोत हिना की लाली कल की यादेंसौंधी ख़ुश्बू ठंडी बूँदेंकल के बासी आँसू जिन सेफ़र्दा के बालीं का पर्दा भीग रहा हैसेहर-ज़दा महबूस हसीनासपनों के शीलाट की रानीआईनों में हुस्न-ए-शिकस्ता देख रही हैकितने चेहरे टूटे टूटेपहचाने अन-पहचाने सेआगे पीछे आगे पीछे भाग रहे हैंक़िलए के आसेब की सूरत किस की सिसकी किस का नालाकमरे की ख़ामोश फ़ज़ा में दर आया है
दौर-ए-ख़िज़ाँ में भी तिरी कलियाँ खिली रहेंता-हश्र ये हसीन फ़ज़ाएँ बसी रहें
ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुईपत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुईमौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश हैशाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश हैचंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुएजैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुएखप गया है यूँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंगजिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंगउमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिएया चली है बाल खोले राँड रोने के लिएजितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान हैहर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान हैइक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहींचिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहींसो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँहो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँहाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागरले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम करदिल सँभलता ही नहिं है सीना-ए-सद-चाक मेंफूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक मेंउड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआरहो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशारहसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश मेंसैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश मेंउम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिएबार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिएचाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहींहाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहींथरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़रले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सरजब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँआह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँहो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराममुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवामदोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गयाप्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गयाले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरारआग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रारपड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभीउँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभीआ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईंऔर कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईंइतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहींयास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहींआ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूकफट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूकअपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद हैऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद हैबाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहारख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकारजब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथदिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगीये नहिं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगीवाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोईचाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोईवाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैंरहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैंदिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गयाहाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गयातिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफतीपी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपतीमौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गएसाँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गएआँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गईमौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गईऔर कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दामऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम
ख़ला के गहरे समुंदरों मेंअगर कहीं कोई है जज़ीराजहाँ कोई साँस ले रहा हैजहाँ कोई दिल धड़क रहा हैजहाँ ज़ेहानत ने इल्म का जाम पी लिया हैजहाँ के बासीख़ला के गहरे समुंदरों मेंउतारने को हैं अपने बेड़ेतलाश करने कोई जज़ीराजहाँ कोई साँस ले रहा हैजहाँ कोई दिल धड़क रहा हैमिरी दुआ हैकि उस जज़ीरे में रहने वालों के जिस्म का रंगइस जज़ीरे के रहने वालों के जिस्म के जितने रंग हैंइन से मुख़्तलिफ़ होबदन की हैअत भी मुख़्तलिफ़और शक्ल-ओ-सूरत भी मुख़्तलिफ़ होमिरी दुआ हैअगर है उन का भी कोई मज़हबतो इस जज़ीरे के मज़हबों से वो मुख़्तलिफ़ होमिरी दुआ हैकि इस जज़ीरे की सब ज़बानों से मुख़्तलिफ़ हो ज़बान उन कीमिरी दुआ हैख़ला के गहरे समुंदरों से गुज़र केइक दिनइस अजनबी नस्ल के जहाज़ीख़लाई बेड़े मेंइस जज़ीरे तक आएँहम उन के मेज़बाँ होंहम उन को हैरत से देखते होंवो पास आ करहमें इशारों से ये बताएँकि उन से हम इतने मुख़्तलिफ़ हैंकि उन को लगता हैइस जज़ीरे के रहने वालेसब एक से हैंमिरी दुआ हैकि इस जज़ीरे के रहने वालेउस अजनबी नस्ल के कहे का यक़ीन कर लें
इश्क़ आवारा-मिज़ाजवो मुसाफ़िर तो गयान कोई उस की महक है कि जो दे उस का पतान कोई नक़्श-ए-कफ़-ए-पान कोई उस का निशाँकोई तल्ख़ी भी तह-ए-जाम न छोड़ी उस नेज़िंदगी बाक़ी हैएक संजीदा हँसीसोच सी दिल में बसीतेज़ आई हुई साँसज़ेहन में थोड़े से वक़्फ़े से खटकती हुई फाँसऔर दुखता हुआ दिलचोट थी जिस पे लगीचोट वैसी तो नहींदर्द बाक़ी तो नहींलाख माने न मगरकुछ पशेमान सा दिलयूँ बदल जाने परआप हैरान सा दिलउस को क्या अपना पताये है इंसान का दिलकोई पत्थर तो नहींजिस पे मिटती नहीं पड़ जाए जो इक बार लकीर
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