aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "badii"
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों सेबड़ी हसरत से तकती हैंमहीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतींजो शामें उन की सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सरगुज़र जाती हैं कम्पयूटर के पर्दों परबड़ी बेचैन रहती हैं किताबेंउन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई हैबड़ी हसरत से तकती हैंजो क़द्रें वो सुनाती थींकि जिन के सेल कभी मरते नहीं थेवो क़द्रें अब नज़र आती नहीं घर मेंजो रिश्ते वो सुनाती थींवो सारे उधड़े उधड़े हैं
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
देखूँ जो आसमाँ से तो इतनी बड़ी ज़मींइतनी बड़ी ज़मीन पे छोटा सा एक शहरछोटे से एक शहर में सड़कों का एक जालसड़कों के जाल में छुपी वीरान सी गलीवीराँ गली के मोड़ पे तन्हा सा इक शजरतन्हा शजर के साए में छोटा सा इक मकानछोटे से इक मकान में कच्ची ज़मीं का सहनकच्ची ज़मीं के सहन में खिलता हुआ गुलाबखिलते हुए गुलाब में महका हुआ बदनमहके हुए बदन में समुंदर सा एक दिलउस दिल की वुसअ'तों में कहीं खो गया हूँ मैंयूँ है कि इस ज़मीं से बड़ा हो गया हूँ मैं
छोटा सा इक गाँव था जिस मेंदिए थे कम और बहुत अँधेराबहुत शजर थे थोड़े घर थेजिन को था दूरी ने घेराइतनी बड़ी तन्हाई थी जिस मेंजागता रहता था दिल मेराबहुत क़दीम फ़िराक़ था जिस मेंएक मुक़र्रर हद से आगेसोच न सकता था दिल मेराऐसी सूरत में फिर दिल कोध्यान आता किस ख़्वाब में तेराराज़ जो हद से बाहर में थाअपना-आप दिखाता कैसेसपने की भी हद थी आख़िरसपना आगे जाता कैसे
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
गर तो है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी हैऐ ग़ाफ़िल तुझ से भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी हैक्या शक्कर मिस्री क़ंद गरी क्या सांभर मीठा खारी हैक्या दाख मुनक़्का सोंठ मिरच क्या केसर लौंग सुपारी हैसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जानाघरौंदे बनाना बना के मिटानावो मा'सूम चाहत की तस्वीर अपनीवो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनीन दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधनबड़ी ख़ूबसूरत थी वो ज़िंदगानी
ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ कामज़ा घुलता है लफ़्ज़ों का ज़बाँ परकि जैसे पान में महँगा क़िमाम घुलता हैये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का....नशा आता है उर्दू बोलने मेंगिलौरी की तरह हैं मुँह लगी सब इस्तेलाहेंलुत्फ़ देती है, हलक़ छूती है उर्दू तो, हलक़ से जैसे मय का घोंट उतरता हैबड़ी अरिस्टोकरेसी है ज़बाँ मेंफ़क़ीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दूअगरचे मअनी कम होते है उर्दू मेंअल्फ़ाज़ की इफ़रात होती हैमगर फिर भी, बुलंद आवाज़ पढ़िए तो बहुत ही मो'तबर लगती हैं बातेंकहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दूतो लगता है कि दिन जाड़ों के हैं खिड़की खुली है, धूप अंदर आ रही हैअजब है ये ज़बाँ, उर्दूकभी कहीं सफ़र करते अगर कोई मुसाफ़िर शेर पढ़ दे 'मीर', 'ग़ालिब' कावो चाहे अजनबी हो, यही लगता है वो मेरे वतन का हैबड़ी शाइस्ता लहजे में किसी से उर्दू सुन करक्या नहीं लगता कि एक तहज़ीब की आवाज़ है, उर्दू
इस उम्र के बाद उस को देखा!
बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँसामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदेगुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वाचंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्देएक बकरी के मिम्याने की आवाज़और धुँदलाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साएऐसे दीवारों से मुँह जोड़ के चलते हैं यहाँचूड़ी-वालान कै कटरे की बड़ी-बी जैसेअपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
मगर ये सतरें बड़ी अजब हैंकहीं तवाज़ुन बिगड़ गया हैया कोई सीवन उधड़ गई है:''फ़रार हूँ मैं कई दिनों सेजो घुप-अँधेरे की तीर जैसी सुरंग इक कान सेशुरूअ हो के दूसरे कान तक गई है,मैं उस नली में छुपा हुआ हूँ,तुम आ के तिनके से मुझ को बाहर निकाल लेना
मैं शहर से फिर आ गयाख़याल था कि पा गयाउसे जो मुझ से दूर थीमगर मिरी ज़रूर थीऔर इक हसीन शाम कोमैं चल पड़ा सलाम कोगली का रंग देख करनई तरंग देख करमुझे बड़ी ख़ुशी हुई
कोई पहाड़ ये कहता था इक गिलहरी सेतुझे हो शर्म तो पानी में जा के डूब मरेज़रा सी चीज़ है इस पर ग़ुरूर! क्या कहना!ये अक़्ल और ये समझ ये शुऊर! क्या कहना!ख़ुदा की शान है ना-चीज़! चीज़ बन बैठेंजो बे-शुऊर हों यूँ बा-तमीज़ बन बैठें!तिरी बिसात है क्या मेरी शान के आगेज़मीं है पस्त मिरी आन-बान के आगेजो बात मुझ में है तुझ को वो है नसीब कहाँभला पहाड़ कहाँ जानवर ग़रीब कहाँ!कहा ये सुन के गिलहरी ने मुँह सँभाल ज़राये कच्ची बातें हैं दिल से इन्हें निकाल ज़रा!जो मैं बड़ी नहीं तेरी तरह तो क्या पर्वा!नहीं है तू भी तो आख़िर मिरी तरह छोटाहर एक चीज़ से पैदा ख़ुदा की क़ुदरत हैकोई बड़ा कोई छोटा ये उस की हिकमत हैबड़ा जहान में तुझ को बना दिया उस नेमुझे दरख़्त पे चढ़ना सिखा दिया उस नेक़दम उठाने की ताक़त नहीं ज़रा तुझ मेंनिरी बड़ाई है! ख़ूबी है और क्या तुझ मेंजो तू बड़ा है तो मुझ सा हुनर दिखा मुझ कोये छालिया ही ज़रा तोड़ कर दिखा मुझ कोनहीं है चीज़ निकम्मी कोई ज़माने मेंकोई बुरा नहीं क़ुदरत के कार-ख़ाने में
फ़रिश्ते पढ़ते हैं जिस को वो नाम है तेराबड़ी जनाब तिरी फ़ैज़ आम है तेरासितारे इश्क़ के तेरी कशिश से हैं क़ाएमनिज़ाम-ए-मेहर की सूरत निज़ाम है तेरातिरी लहद की ज़ियारत है ज़िंदगी दिल कीमसीह ओ ख़िज़्र से ऊँचा मक़ाम है तेरानिहाँ है तेरी मोहब्बत में रंग-ए-महबूबीबड़ी है शान बड़ा एहतिराम है तेराअगर सियाह दिलम दाग़-ए-लाला-ज़ार-ए-तवामदिगर कुशादा जबीनम गुल-ए-बहार-ए-तवामचमन को छोड़ के निकला हूँ मिस्ल-ए-निकहत-ए-गुलहुआ है सब्र का मंज़ूर इम्तिहाँ मुझ कोचली है ले के वतन के निगार-ख़ाने सेशराब-ए-इल्म की लज़्ज़त कशाँ कशाँ मुझ कोनज़र है अब्र-ए-करम पर दरख़्त-ए-सहरा हूँकिया ख़ुदा ने न मोहताज-ए-बाग़बाँ मुझ कोफ़लक-नशीं सिफ़त-ए-मेहर हूँ ज़माने मेंतिरी दुआ से अता हो वो नर्दबाँ मुझ कोमक़ाम हम-सफ़रों से हो इस क़दर आगेकि समझे मंज़िल-ए-मक़्सूद कारवाँ मुझ कोमिरी ज़बान-ए-क़लम से किसी का दिल न दुखेकिसी से शिकवा न हो ज़ेर-ए-आसमाँ मुझ कोदिलों को चाक करे मिस्ल-ए-शाना जिस का असरतिरी जनाब से ऐसी मिले फ़ुग़ाँ मुझ कोबनाया था जिसे चुन चुन के ख़ार ओ ख़स मैं नेचमन में फिर नज़र आए वो आशियाँ मुझ कोफिर आ रखूँ क़दम-ए-मादर-ओ-पिदर पे जबींकिया जिन्हों ने मोहब्बत का राज़-दाँ मुझ कोवो शम-ए-बारगह-ए-ख़ानदान-ए-मुर्तज़वीरहेगा मिस्ल-ए-हरम जिस का आस्ताँ मुझ कोनफ़स से जिस के खिली मेरी आरज़ू की कलीबनाया जिस की मुरव्वत ने नुक्ता-दाँ मुझ कोदुआ ये कर कि ख़ुदावंद-ए-आसमान-ओ-ज़मींकरे फिर उस की ज़ियारत से शादमाँ मुझ कोवो मेरा यूसुफ़-ए-सानी वो शम-ए-महफ़िल-ए-इश्क़हुई है जिस की उख़ुव्वत क़रार-ए-जाँ मुझ कोजला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तूहवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ कोरियाज़-ए-दहर में मानिंद-ए-गुल रहे ख़ंदाँकि है अज़ीज़-तर अज़-जाँ वो जान-ए-जाँ मुझ कोशगुफ़्ता हो के कली दिल की फूल हो जाएये इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर क़ुबूल हो जाए
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
नेट ईजाद हुआ हिज्र के मारों के लिएसर्च इंजन है बड़ी चीज़ कुँवारों के लिए
अभी मरा नहीं ज़िंदा है आदमी शायदयहीं कहीं उसे ढूँडो यहीं कहीं होगाबदन की अंधी गुफा में छुपा हुआ होगाबढ़ा के हाथहर इक रौशनी को गुल कर दोहवाएँ तेज़ हैं झँडे लपेट कर रख दोजो हो सके तो उन आँखों पे पट्टियाँ कस दोन कोई पाँव की आहटन साँसों की आवाज़डरा हुआ है वोकुछ और भी न डर जाएबदन की अंधी गुफा से न कूच कर जाएयहीं कहीं उसे ढूँडोवो आज सदियों बादउदास उदास हैख़ामोश हैअकेला हैन जाने कब कोई पसली फड़क उठे उस कीयहीं कहीं उसे ढूँडो यहीं कहीं होगाबरहना हो तो उसे फिर लिबास पहना दोअँधेरी आँखों में सूरज की आग दहका दोबहुत बड़ी है ये बस्ती कहीं भी दफ़ना दोअभी मरा नहींज़िंदा है आदमी शायद
उस ने इतनी किताबें चाट डालींकि उस की औरत के पैर काग़ज़ की तरह हो गएवो रोज़ काग़ज़ पे अपना चेहरा लिखता और गंदा होताउस की औरत जो ख़ामोशी काढ़े बैठी थीकाग़ज़ों के भूँकने पर सारतर के पास गईतुम रैम्बो और फ़्राइड से भी मिल आए हो क्यासैफ़ू मेरी सैफ़ू मीराबाई की तरह मत बोलोमैं समझ गई अब उस की आँखेंकीट्स की आँखें हुई जाती हैंमैं जो सोहनी का घड़ा उठाए हुए थीअपना नाम लैला बता चुकी थीमैं ने कहालैला मजमे की बातें मेरे सामने मत दोहराया करोतन्हाई भी कोई चीज़ होती हैशेक्सपियर के ड्रामों से चुन चुन कर उस ने ठुमके लगाएमुझे तन्हा देख करसारतर फ़्राइड के कमरे में चला गयावो अपनी थ्योरी से गिर गिर पड़तामैं समझ गई उस की किताब कितनी हैलेकिन बहर हाल सारतर थाऔर कल को मजमे में भी मिलना थामैं ने भीड़ की तरफ़ इशारा किया तो बोलाइतने सारे सार्त्रों से मिल कर तुम्हें क्या करना हैअगर ज़ियादा ज़िद करती हो तो अपने वारिस 'शाह'हीर सय्याल के कमरों में चले चलते हैंसारतर से इस्तिआरा मिलते हीमैं ने एक तन्क़ीदी नशिस्त रक्खीमैं ने आधा कमरा भी बड़ी मुश्किल से हासिल किया थासो पहले आधे फ़्राइड को बुलायाफिर आधे रैम्बो को बुलायाआधी आधी बात पूछनी शुरूअ कीजॉन डन क्या कर रहा हैसैकेंड हैंड शाइरों से नजात चाहता हैचोरों से सख़्त नालाँ हैदाँते इस वक़्त कहाँ हैवो जहन्नम से भी फ़रार हो चुका हैउस को शुबहा थावो ख़्वाजा-सराओं से ज़ियादा देर मुक़ाबला नहीं कर सकताअपने पस-मंज़र मेंएक कुत्ता मुसलसल भूँकने के लिए छोड़ गया हैइस कुत्ते की ख़सलत क्या हैबियातर्चे की याद में भूँक रहा हैतुम्हारा तसव्वुर क्या कहता हैसार्त्रों की तसव्वुर के लिहाज़ सेअब उस का रुख़ गोएटे के घर की तरफ़ हो गया है
ये शाख़-सार के झूलों में पेंग पड़ते हुएये लाखों पत्तियों का नाचना ये रक़्स-ए-नबातये बे-ख़ुदी-ए-मुसर्रत ये वालिहाना रक़्सये ताल-सम ये छमा-छम कि कान बजते हैंहवा के दोश पे कुछ ऊदी ऊदी शक्लों कीनशे में चूर सी परछाइयाँ थिरकती हुईउफ़ुक़ पे डूबते दिन की झपकती हैं आँखेंख़मोश सोज़-ए-दरूँ से सुलग रही है ये शाम!मिरे मकान के आगे है एक चौड़ा सहन वसीअकभी वो हँसता नज़र आता है कभी वो उदासइसी के बीच में है एक पेड़ पीपल कासुना है मैं ने बुज़ुर्गों से ये कि उम्र उस कीजो कुछ न होगी तो होगी क़रीब छियानवे सालछिड़ी थी हिन्द में जब पहली जंग-ए-आज़ादीजिसे दबाने के ब'अद उस को ग़द्र कहने लगेये अहल-ए-हिन्द भी होते हैं किस क़दर मासूमवो दार-ओ-गीर वो आज़ादी-ए-वतन की जंगवतन से थी कि ग़नीम-ए-वतन से ग़द्दारीबिफर गए थे हमारे वतन के पीर ओ जवाँदयार-ए-हिन्द में रन पड़ गया था चार तरफ़उसी ज़माने में कहते हैं मेरे दादा नेजब अर्ज़-ए-हिन्द सिंची ख़ून से ''सपूतों'' केमियान-ए-सहन लगाया था ला के इक पौदाजो आब-ओ-आतिश-ओ-ख़ाक-ओ-हवा से पलता हुआख़ुद अपने क़द से ब-जोश-ए-नुमू निकलता हुआफ़ुसून-ए-रूह बनाती रगों में चलता हुआनिगाह-ए-शौक़ के साँचों में रोज़ ढलता हुआसुना है रावियों से दीदनी थी उस की उठानहर इक के देखते ही देखते चढ़ा परवानवही है आज ये छितनार पेड़ पीपल कावो टहनियों के कमंडल लिए जटाधारीज़माना देखे हुए है ये पेड़ बचपन सेरही है इस के लिए दाख़ली कशिश मुझ मेंरहा हूँ देखता चुप-चाप देर तक उस कोमैं खो गया हूँ कई बार इस नज़ारे मेंवो उस की गहरी जड़ें थीं कि ज़िंदगी की जड़ें?पस-ए-सुकून-ए-शजर कोई दिल धड़कता थामैं देखता था उसे हसती-ए-बशर की तरहकभी उदास कभी शादमाँ कभी गम्भीरफ़ज़ा का सुरमई रंग और हो चला गहराघुला घुला सा फ़लक है धुआँ धुआँ सी है शामहै झुटपुटा कि कोई अज़दहा है माइल-ए-ख़्वाबसुकूत-ए-शाम में दरमांदगी का आलम हैरुकी रुकी सी किसी सोच में है मौज-ए-सबा
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