aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bahaaraa"
फ़ुसूँ-कारा निगारा नौ-बहारा आरज़ू-आराभला लम्हों का मेरी और तुम्हारी ख़्वाब-परवरआरज़ू-मंदी की सरशारी से क्या रिश्ताहमारी बाहमी यादों की दिलदारी से क्या रिश्तामुझे तुम अपनी बाँहों में जकड़ लो और मैं तुम कोयहाँ अब तीसरा कोई नहीं या'नी मोहब्बत भी
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने मेंज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना होउसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंमदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना होबहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंबदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना होकिसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंकिसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना होहक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना होहमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....
निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँचली है रस्म कि कोई न सर उठा के चलेजो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकलेनज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चलेहै अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशादकि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आजहौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आजआबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आजहुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आजजिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहारतेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदारतेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदारता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसारकौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती हैतपती साँसों की हरारत से पिघल जाती हैपाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती हैबन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती हैज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहींनब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहींउड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहींजन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहींउस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेगोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिएफ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिएक़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिएज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिएरुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहींतुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहींतू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहींतेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहींअपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकलज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकलनफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकलक़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकलराह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवींतेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मींहाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबींमैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहींलड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तुम्हारी जो हमासा है भला उस का तो क्या कहनाहै शायद मुझ को सारी उम्र उस के सेहर में रहनामगर मेरे ग़रीब अज्दाद ने भी कुछ किया होगाबहुत टुच्चा सही उन का भी कोई माजरा होगाये हम जो हैं हमारी भी तो होगी कोई नौटंकीहमारा ख़ून भी सच-मुच का सेहने पर बहा होगाहै आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तरक़यामत सानेहा मतलब क़यामत फ़ाजिआ परवर
जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गयाचेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गयाहाथों से ख़ुशी का जाम छुटा होंटों से हँसी का नाम गया
मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगारतू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार
बरतरी के सुबूत की ख़ातिरख़ूँ बहाना ही क्या ज़रूरी हैघर की तारीकियाँ मिटाने कोघर जलाना ही क्या ज़रूरी है
ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रबइल्म की शम्अ से हो मुझ को मोहब्बत या-रबहो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करनादर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करनामिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ कोनेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को
ऐ दिल पहले भी तन्हा थे, ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैंऔर उन ज़ख़्मों और दाग़ों से अब अपनी बातें होती हैंजो ज़ख़्म कि सुर्ख़ गुलाब हुए, जो दाग़ कि बदर-ए-मुनीर हुएइस तरहा से कब तक जीना है, मैं हार गया इस जीने से
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
क्या बद-नसीब हूँ मैं घर को तरस रहा हूँसाथी तो हैं वतन में मैं क़ैद में पड़ा हूँआई बहार कलियाँ फूलों की हंस रही हैंमैं इस अँधेरे घर में क़िस्मत को रो रहा हूँइस क़ैद का इलाही दुखड़ा किसे सुनाऊँडर है यहीं क़फ़स में मैं ग़म से मर न जाऊँ
ये काएनात-ए-अज़ीमलगता हैअपनी अज़्मत सेआज भी मुतइन नहीं हैकि लम्हा लम्हावसीअ-तर और वसीअ-तर होती जा रही हैये अपनी बाँहें पसारती हैये कहकशाओं की उँगलियों सेनए ख़लाओं को छू रही हैअगर ये सच हैतो हर तसव्वुर की हद से बाहरमगर कहीं परयक़ीनन ऐसा कोई ख़ला हैकि जिस कोइन कहकशाओं की उँगलियों नेअब तक छुआ नहीं हैख़लाजहाँ कुछ हुआ नहीं हैख़लाकि जिस ने किसी से भी ''कुन'' सुना नहीं हैजहाँ अभी तक ख़ुदा नहीं हैवहाँकोई वक़्त भी न होगाये काएनात-ए-अज़ीमइक दिनछुएगीइस अन-छुए ख़ला कोऔर अपने सारे वजूद सेजब पुकारेगी''कुन''तो वक़्त को भी जनम मिलेगाअगर जनम है तो मौत भी हैमैं सोचता हूँये सच नहीं हैकि वक़्त की कोई इब्तिदा है न इंतिहा हैये डोर लम्बी बहुत हैलेकिनकहीं तो इस डोर का सिरा हैअभी ये इंसाँ उलझ रहा हैकि वक़्त के इस क़फ़स मेंपैदा हुआयहीं वो पला-बढ़ा हैमगर उसे इल्म हो गया हैकि वक़्त के इस क़फ़स से बाहर भी इक फ़ज़ा हैतो सोचता हैवो पूछता हैये वक़्त क्या है
हवा भी ख़ुश-गवार हैगुलों पे भी निखार हैतरन्नुम-ए-हज़ार हैबहार पुर-बहार हैकहाँ चला है साक़ियाइधर तो लौट इधर तो आअरे ये देखता है क्याउठा सुबू सुबू उठासुबू उठा प्याला भरप्याला भर के दे इधरचमन की सम्त कर नज़रसमाँ तो देख बे-ख़बरवो काली काली बदलियाँउफ़ुक़ पे हो गईं अयाँवो इक हुजूम-ए-मय-कशाँहै सू-ए-मय-कदा रवाँये क्या गुमाँ है बद-गुमाँसमझ न मुझ को ना-तवाँख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँअभी तो मैं जवान हूँइबादतों का ज़िक्र हैनजात की भी फ़िक्र हैजुनून है सवाब काख़याल है अज़ाब कामगर सुनो तो शैख़ जीअजीब शय हैं आप भीभला शबाब ओ आशिक़ीअलग हुए भी हैं कभीहसीन जल्वा-रेज़ होंअदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ होंहवाएँ इत्र-बेज़ होंतो शौक़ क्यूँ न तेज़ होंनिगार-हा-ए-फ़ित्नागरकोई इधर कोई उधरउभारते हों ऐश परतो क्या करे कोई बशरचलो जी क़िस्सा-मुख़्तसरतुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़रदुरुस्त है तो हो मगरअभी तो मैं जवान हूँये गश्त कोहसार कीये सैर जू-ए-बार कीये बुलबुलों के चहचहेये गुल-रुख़ों के क़हक़हेकिसी से मेल हो गयातो रंज ओ फ़िक्र खो गयाकभी जो बख़्त सो गयाये हँस गया वो रो गयाये इश्क़ की कहानियाँये रस भरी जवानियाँउधर से मेहरबानियाँइधर से लन-तरानियाँये आसमान ये ज़मींनज़ारा-हा-ए-दिल-नशींइन्हें हयात-आफ़रींभला मैं छोड़ दूँ यहींहै मौत इस क़दर क़रींमुझे न आएगा यक़ींनहीं नहीं अभी नहींअभी तो मैं जवान हूँन ग़म कुशूद ओ बस्त काबुलंद का न पस्त कान बूद का न हस्त कान वादा-ए-अलस्त काउम्मीद और यास गुमहवास गुम क़यास गुमनज़र से आस पास गुमहमा-बजुज़ गिलास गुमन मय में कुछ कमी रहेक़दह से हमदमी रहेनशिस्त ये जमी रहेयही हमा-हामी रहेवो राग छेड़ मुतरिबातरब-फ़ज़ा, अलम-रुबाअसर सदा-ए-साज़ काजिगर में आग दे लगाहर एक लब पे हो सदान हाथ रोक साक़ियापिलाए जा पिलाए जाअभी तो मैं जवान हूँ
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमकभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम सेतो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझनाकि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारीहैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारीजो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँसजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारीनज़र से ज़माने की ख़ुद को बचानाकिसी और से देखो दिल मत लगानाकि मेरी अमानत हो तुमबहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराऔर इस पर ये काली घटाओं का पहरागुलाबों से नाज़ुक महकता बदन हैये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन हैबिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादलफ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागलवो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमजो बन के कली मुस्कुराती है अक्सरशब-ए-हिज्र में जो रुलाती है अक्सरजो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल देजो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल केछुपाना जो चाहें छुपाई न जाएभुलाना जो चाहें भुलाई न जाएवो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगीजो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगीभड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगीघनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगीकि आज तक आज़मा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही होनहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगीवफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगीमुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगीजुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगीक़रीब बढ़ती ही आ रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये दौर अपने बराहीम की तलाश में हैसनम-कदा है जहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहकिया है तू ने मता-ए-ग़ुरूर का सौदाफ़रेब-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये माल-ओ-दौलत-ए-दुनिया ये रिश्ता ओ पैवंदबुतान-ए-वहम-ओ-गुमाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहख़िरद हुई है ज़मान ओ मकाँ की ज़ुन्नारीन है ज़माँ न मकाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये नग़्मा फ़स्ल-ए-गुल-ओ-लाला का नहीं पाबंदबहार हो कि ख़िज़ाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहअगरचे बुत हैं जमाअत की आस्तीनों मेंमुझे है हुक्म-ए-अज़ाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'दफिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'दकब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहारख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'दथे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ केथीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'ददिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दीकुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'दउन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किएअन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द
न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँन मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या हैबसारतों पे वो जाले पड़े कि दोनों कोसमझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है
छोटा सा इक गाँव था जिस मेंदिए थे कम और बहुत अँधेराबहुत शजर थे थोड़े घर थेजिन को था दूरी ने घेराइतनी बड़ी तन्हाई थी जिस मेंजागता रहता था दिल मेराबहुत क़दीम फ़िराक़ था जिस मेंएक मुक़र्रर हद से आगेसोच न सकता था दिल मेराऐसी सूरत में फिर दिल कोध्यान आता किस ख़्वाब में तेराराज़ जो हद से बाहर में थाअपना-आप दिखाता कैसेसपने की भी हद थी आख़िरसपना आगे जाता कैसे
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