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नज़्म
बिलाल असवद
नज़्म
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मिरे हिन्दू मुसलमाँ सब मुझे सर पर बिठाते थे
उन्ही के फ़ैज़ से मअनी मुझे मअनी सिखाते थे
जौन एलिया
नज़्म
वफ़ा ख़ुद की है और मेरी वफ़ा को आज़माया है
मुझे चाहा है मुझ को अपनी आँखों पर बिठाया है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
आ निकलता है कभी रात बिताने के लिए
हम अब उस उम्र को आ पहुँचे हैं जब हम भी यूँही