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नज़्म
लफ़्ज़ों के तीरों पर ‘अय्यारियों का हलाहल चढ़ाए चले जा रहे हैं
किसी को किसी पर भरोसा नहीं है
डॉ. अब्दुल्लाह
नज़्म
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा