aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "chahal"
हम समुंदर से मिलने ज़रा देर से पहुँचेरात समुंदर से ज़्यादा गहरी हो रही थीहम नंगे पाँव साहिल के साथबहुत दूर तक चलेदिनों के बाद सरशारी ने अपना चेहरा दिखाया थाऔर हमारी भूली हुई धुन गुनगुनाई थीसमुंदर हमारी ख़ामोशी में डूबने ही वाला थाजब हमारा गीत पतवार हुआअजनबी क़दमों के निशान चुनते हुएख़याल आयाचहल-कदमी करते हुए वो दो साए क्या हुएये लहरें जिन के पाँव चुरा लाई हैंतभी हम ने अपने जूतों में झाँक कर देखासाहिल अभी पूरी तरह नहीं फिसला थाहम ने सोचासमुंदर को अब सो जाना चाहिएरात की ख़ुनकी हमारी रगों में उतर चुकी थीजब हम वापसी के लिए मुड़ेसमुंदर बड़ी गर्म-जोशी के साथ हमें रुख़्सत करने आया
मुसाहिब-ए-शाह से कहो किफ़क़ीह-ए-आज़म भी आज तस्दीक़ कर गए हैंकि फ़स्ल फिर से गुनाहगारों की पक गई हैहुज़ूर की जुम्बिश-ए-नज़र केतमाम जल्लाद मुंतज़िर हैंकि कौन सी हद जनाब जारी करेंतो तामील-ए-बंदगी होकहाँ पे सर और कहाँ पे दस्तार उतारना अहसन-उल-अमल हैकहाँ पे हाथों कहाँ ज़बानों को क़त्अ कीजिएकहाँ पे दरवाज़ा रिज़्क़ का बंद करना होगाकहाँ पे आसाइशों की भूखों को मार दीजेकहाँ बटेगी लुआन की छूटऔर कहाँ पररज्म के अहकाम जारी होंगेकहाँ पे नौ साला बच्चियां चहल साला मर्दों के साथसंगीन में पिरोने का हुक्म होगाकहाँ पे इक़बाली मुलज़िमों कोकिसी तरह शक का फ़ाएदा हो
अय्यारगी से पहले अपने तईं छुपा करचाहा कि मैं भी निकलूँ उन में से छुट-छुटा करदौड़े कई ये कह कर जाता है दम चुरा करइतने में घेर मुझ को और शोर-ओ-ग़ुल मचा करउस दम कमर कमर तक रंग-ओ-गुलाल आया
ये भी रात गुज़र रही हेकमरे की बिखरी चीज़ें समेटते हुएतुम्हारे जाने के बादतुम्हारी चहल-क़दमियाँ घूमती रहती हैं दिल के आँगन मेंगूँजती रहती हैं तुम्हारी सरगोशियाँ मेरे कानों मेंबिस्तर की सिलवटें मुँह चिढ़ाने लगती हैंइस बार सिगरेट के जले हुए टुकड़ों पर महसूस करती हूँतुम्हारे होंटों का लम्सइधर-उधर बिखरे हुए तुम्हारी बातों के ढेरचाय की झूटी प्यालियाँएक एक को उठाती हूँ और रखती जाती हूँयादों की अलमारी मेंजिस में पहले ही से मौजूद हैंतुम्हारी मुस्कुराहटों की गठरियाँबॉलकोनी से झाँकता हुआ चाँदमहकती हुई रात की रानीकितना कुछ समेटना बाक़ी हे अभीमेरे माथे पर तुम्हारे होंटों का लम्सतुम्हारे नाम का विर्द करती हुई धड़कनेथक कर चूर हो गई हूँ ख़ुद को समेटते हुएऔर आसमान पर चमकता हुआ आख़िरी सितारा भीइस बार डूब जाना चाहता है मेरे साथतुम्हारी यादो के बे-कराँ समुंदर में
सड़क जो आती है छावनी से चहल-पहल उस पे ख़ूब ही हैनिकल के गुंजान बस्तियों से बरा-ए-तफ़रीह सब हैं आए
वसीअ शहर में इक चीख़ क्या सुनाई देबसों के शोर में रेलों की गड़गड़ाहट मेंचहल-पहल में भिड़ों जैसी भनभनाहट मेंकिसी को पकड़ो सर-ए-राह मार दो चाहेकिसी अफ़ीफ़ा की इस्मत उतार दो चाहे!वसीअ शहर में इक चीख़ क्या सुनाई दे!
मेरे पासकोई बाग़ नहीं है दोस्तकुछ अधूरे ख़्वाब एक बॉलकनीऔर दो तीन गमले हैंजो मुझे दुनिया में दरख़्तों केबाक़ी रहने की वजूहात बताते हैंऔर जंगलों को जला दिए जाने की ख़बरें पहुँचाते हैंमेरी बहन मेरे कमज़ोर पैरों मेंज़ैतून के तेल से जान डालने की कोशिश करती हैमाँ होती तो वो भी यही करतीकाश सारी दुनिया मेंज़ैतून के तेल के कुएँ होंऔर कमज़ोर पैरों में जान पड़ जाएऔर हम अपने प्यारों के साथमोहब्बत के बाग़ में रोज़ चहल-क़दमी कर सकेंएक दरख़्त तुम्हारे नाम का भी होगामेरे दोस्तताकि हम हमेशा मोहब्बत और शिफ़ा-याबी के मोजज़े मेंएक दूसरे के शरीक रहें
एक उम्र-ए-दराज़ चेहरापेसमेकर से धड़कता हुआ दिलआँख की धुँदलाती रौशनीज़िंदगी की चमकपूरे कुँबे का जुग़राफ़ियाअपने इर्द-गिर्द समेटेज़िंदगी की शाम कोयादों में लपेटेउम्र की लकीरों मेंतजरबे की चमककिसी फ़रिश्ते की तरहएक बुज़ुर्ग का सायाघर में टहलता हैअपने धीमे क़दमों सेचहल-क़दमी करते हुएसब की ख़बर रखताबस दुआ है यहीइस दुआ के हाथसब के सर पर रहेकाश हर बुज़ुर्ग का मानहर घर में रहे
मुझ सा तन्हा नहीं दुनिया में ख़ुदाया कोईमैं न अपना हूँ किसी का भी न मेरा कोईक्या मिला मुझ को चहल साला रिफ़ाक़त करकेअब किसी पर न करे आह भरोसा कोईताबिश-ए-हिज्र ने दिल की ये बना दी सूरतजैसे हो धूप में तपता हुआ सहरा कोईआतिश-ए-शौक़ की उठती हैं कुछ ऐसी लहरेंजिस तरह आग का भड़का हुआ दरिया कोईएक वो दिन था कि रोतों को हँसा देता थाअब तो रोता हूँ जो देखा कहीं हँसता कोईमैं हूँ नैरंगी-ए-आलम की मुजस्सम तस्वीरमुझ से बेहतर नहीं इबरत का तमाशा कोईमैं वो क़तरा हूँ समुंदर से जो महरूम रहामुझ को क्या मौज में आया करे दरिया कोईबे-रुख़ी आह ये कैसी है कि इस आलम मेंमिले लाखों न हुआ एक भी अपना कोई
वो प्रेमचंद-मुंशी-ए-बे-मिस्ल-ओ-बे-बदलथी जिस के दम से बज़्म-ए-अदब में चहल-पहलअफ़्साने जिस के शम-ए-हिदायत थे बर-महलना-वक़्त आह हो गया वो लुक़्मा-ए-अजलइस सोज़-ए-जाँ-गुसिल से हर इक दिल कबाब हैफ़र्त-ए-तपिश है आतिश-ए-ग़म बे-हिसाब हैइल्मी शग़फ़ से उस के नहीं कौन बा-ख़बरहर क़ल्ब पर फ़साने हुए नक़्श कलहजरहै बहर-ए-इल्म तेरी रवानी से सर-बसरदामान-ओ-जेब-ए-उर्दू-ओ-हिन्दी हैं पुर-गुहरतर्ज़-ए-बयाँ हर एक का तू ने दिखा दियाधब्बा हर इक का अपने क़लम से मिटा दियाबज़्म-ए-अदब को ख़्वाब में भी ये न था ख़यालउन्नीस सौ छत्तीस का नहस होगा उस को सालअव्वल वफ़ात-ए-बर्क़ का उस को हुआ मलालफिर चल दिया जहान से ये मुंशी-बा-कमालनक़्श-ए-क़रार सैल-ए-फ़ना से मिटा है आजऐवान-ए-नज़्म-ओ-नस्र में मातम बपा है आजतुझ को प्रेमचंद ये शायद नहीं ख़बरकितना वफ़ात का तिरी दुनिया पे है असर'सूफ़ी' जहाँ में ढूँढती है उस को हर नज़रऐ माहताब-ए-इश्क़ बता तू छुपा किधरक्या शौक़ सामईं का फ़रामोश हो गयाअफ़्साना कहते कहते जो ख़ुद हाए सो गया
मचा कोहराम क्यूँ हैघर बदलने परअभी भी हल्के कालेशीशे वालीआँख पर ऐनक लगा करहल्क़ा-ए-याराँ में वो अक्सरचहल-क़दमी को आता हैसुनाता है ग़ज़ल अपनीकभी तारों की झुरमुट मेंकभी रस्ते में शबनम केकभी ख़ुशबू लपेटे जिस्म परदिल-कश फ़ज़ाओं मेंकभी बे-हद चमकती धूप केपीपल की छाँव मेंज़रा साचश्म-ए-बातिन कोमुनव्वर कर के तो देखोलिए दरिया को हाथों मेंबहुत शादाँबहुत फ़रहाँनज़र आता है मसनद परग़ज़ल की वो
मुझ सा तन्हा नहीं दुनिया में ख़ुदाया कोईमैं न अपना हूँ किसी का भी न मेरा कोईक्या मिला मुझ को चहल-साला रिफ़ाक़त कर केअब किसी पर न करे आह भरोसा कोईताबिश-ए-हिज्र ने दिल की ये बना दी सूरतजैसे हो धूप में तपता हुआ सहरा कोईआतिश-ए-शौक़ की उठी हैं कुछ ऐसी लहरेंजिस तरह आग का बहता हुआ दरिया कोईएक वो दिन था कि रोतों को हँसा देता थाअब तो रोता हूँ जो देखा कोई हँसता कोईमैं हूँ नैरंगी-ए-आलम की मुजस्सम तस्वीरमुझ से बेहतर नहीं इबरत का तमाशा कोईमैं वो क़तरा हूँ समुंदर से जो महरूम रहामुझ को क्या मौज में आया करे दरिया कोईबे-रुख़ी आह ये कैसी है कि इस आलम मेंमिले लाखों न हुआ एक भी अपना कोई
एक चहल-क़दमी के लिए गली बनीसमुंदर के पास ये फूलों की कली बनीमें भी भूले से यहाँ आ जाता हूँमेरी उम्र चलने-फिरने घूमने की नहीं हैऔरतें बच्चे और दो इक बूढ़े भी आते हैंमैं यूँही कछवे की चाल की तरहआहिस्ता आहिस्ता आया थाइक झाड़ी के पीछे दो साए हम-आग़ोश थेएक ने बा-आवाज़-ए-बुलंद कहा:क्या तुम ने इस बूढ़े को देखा?हँसने की आवाज़ आईये बूढ़ा धरती का बोझ हैमैं ने सुना मगर चुप-चाप चलता गयाउस ने शायद सही कहा ये उम्र चलने-फिरने की नहीं हैमगर मैं क्या करूँ डॉक्टर ने मुझे सौ क़दम चलने को कहा है
सैराबी के इस रेले ने लुक-छुप कैसी रास रचाईहाथों बैठ वो बरखा चेहरा फूल सुरेखा खिल उठा हैघुप रंगों के घाट उतरती रीछ की ये अधली सरसाईदिल की उजली बे सर्व सामानी इस में क्या क्या ठाट छपा हैजीते जी इस चहल पहल की तह तक कब होती है रसाई
डल झील में हो पहले सी फिर से चहल-पहलफिर चश्म-ए-शाही की चलो बरकत करें तलाश
सर्द हवा दरवाज़े पर दस्तक देती हैऔर चाप कहीं दूरदिल के अंदर उभरने लगती हैधुंद में डूबे शहर कीवीरान सड़कों परयादों के हयूलेमिरे साथ चहल-क़दमी करते हैंटूट जाने वालेराब्तों और सूखे गिलासोंमें कोई दुख तो मुश्तरक रहा होगाजो पलकों और होंटों के बीच झूलता रहता है
सूरज डूबा हुआ अंधेराचिड़ियाँ लेने लगीं बसेरादिन का ग़ाएब हुआ उजालातारीकी ने पर्दा डालाजलने लगे दिए घर घर मेंगिरजा मस्जिद और मंदर मेंपूजा में है ध्यान में कोईखाने के सामान में कोईचर्ख़-ए-बरीं पर चमके तारेबे-रोग़न हैं रौशन सारेहल्का हल्का नूर है इन काबस्ती से घर दूर है इन काबच्चे नींद में ग़ाफ़िल हो गएलोरी सुनते सुनते सो गएजंगल से घर ग्वाले आएरेवड़ अपना सँभाले आएजा पहुँचे मज़दूर घरों मेंख़ुश ख़ुश हैं बीवी बच्चों मेंदिन भर कब आराम लिया हैख़ून पसीना एक किया हैशाम ने दी है काम से फ़ुर्सतदम लेने की मिली है मोहलतअब सोएँगे लम्बी तानेमेहनत लगेगी ख़ूब ठिकानेमंज़िल पर रहरव जा पहुँचेहारे थके नींद के मातेकिश्त-ओ-चमन सुनसान पड़े हैंख़ाली अब मैदान पड़े हैंपहला सा ग़ुल शोर कहाँ हैदौड़ धूप का ज़ोर कहाँ हैमाइल-ए-राहत हुआ ज़मानाख़त्म हुआ दिन का अफ़्सानाचहल-पहल दो-चार घड़ी हैसब के सिरहाने नींद खड़ी है
धरती नाचे तकली बन करसूरज अपनी जगह पे बैठावायू-मंडल के रेशम सेगालों जैसे नर्म मुलाइमबालों से बारीकरंग-बिरंगे धागे कातेफिर धागों को पिरो पिरो करसूरज बुनता जाए चादररंग-बिरंगी चादर
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँगमैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयाततेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या हैतेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबाततेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या हैतू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाएयूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाएऔर भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवाराहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस नेशायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा होएक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायदअपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो
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