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नज़्म
सदा अपने चमन में दौर-दौरा हो बहारों का
'हबीब' अपनी ज़बाँ पर ये दुआ बे-इख़्तियार आई
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
सह-चश्मे इफ़रीत ने इस कहानी में की थी
जिसे पढ़ के ख़ुद उस पे दीवानगी का वो दौरा पड़ा
अली मोहम्मद फ़र्शी
नज़्म
था ख़िज़ाँ का दौर-दौरा ख़ेमा-ज़न सय्याद थे
तेरे दम से बन गया सेहन-ए-चमन रश्क-ए-जिनाँ