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नज़्म
लाख बैठे कोई छुप-छुप के कमीं-गाहों में
ख़ून ख़ुद देता है जल्लादों के मस्कन का सुराग़
साहिर लुधियानवी
नज़्म
पर्दा-हा-ए-ख़्वाब हो जाते हैं जिस से चाक चाक
मुस्कुरा कर अपनी चादर को हटा देती है ख़ाक
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जो तुम्हें जादा-ए-मंज़िल का पता देता है
अपनी पेशानी पर वो नक़्श-ए-क़दम ले के चलो
साहिर लुधियानवी
नज़्म
असीरान-ए-क़फ़स से काश ये सय्याद कह देता
रहो आज़ाद हो कर हम तुम्हें आज़ाद करते हैं