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नज़्म
दिखती हड्डियाँ कहती है आराम करो अब
दिल कहता है अभी नहीं अभी तो काम पड़ा है सब
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
तो अपने आप पर कुछ फ़ख़्र होता है
दिखाता फिरता हूँ सब को मैं अख़बारों रिसालों में छपी ख़बरें
अमित गोस्वामी
नज़्म
मेरे जज़ीरे पर कभी आ कर मुझे आवाज़ मत देना
बज़ाहिर आँख से दिखती चमक से मुझ को नफ़रत है
माहरुख़ अली माही
नज़्म
तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंट
ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने