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नज़्म
दामनों में आग ले कर थी दवाँ बाद-ए-सुमूम
थरथराहट थी फ़ज़ा में मिस्ल-ए-मौज-ए-शो'ला-बार
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
कभी साथ अपने उस के आस्ताँ तक मुझ को तू ले चल
छुपा कर अपने दामन में ब-रंग-ए-मौज-ए-बू ले चल