aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "faiz"
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँगमैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयाततेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या हैतेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबाततेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या हैतू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाएयूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाएऔर भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवाराहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
कुछ इश्क़ किया कुछ काम कियावो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थेजो इश्क़ को काम समझते थेया काम से आशिक़ी करते थेहम जीते-जी मसरूफ़ रहेकुछ इश्क़ किया कुछ काम कियाकाम इश्क़ के आड़े आता रहाऔर इश्क़ से काम उलझता रहाफिर आख़िर तंग आ कर हम नेदोनों को अधूरा छोड़ दिया
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ सेजिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा थाजिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम नेदहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था
हम देखेंगेलाज़िम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिस का वादा हैजो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा हैजब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँरूई की तरह उड़ जाएँगेहम महकूमों के पाँव-तलेजब धरती धड़-धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहींराह-रौ होगा कहीं और चला जाएगाढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबारलड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ारअजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लोअब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आएगा
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरेबोल ज़बाँ अब तक तेरी हैतेरा सुत्वाँ जिस्म है तेराबोल कि जाँ अब तक तेरी हैदेख कि आहन-गर की दुकाँ मेंतुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहनखुलने लगे क़ुफ़्लों के दहानेफैला हर इक ज़ंजीर का दामनबोल ये थोड़ा वक़्त बहुत हैजिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहलेबोल कि सच ज़िंदा है अब तकबोल जो कुछ कहना है कह ले
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहींतोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहींआज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलोदस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलोख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलोराह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलोहाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भीतीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भीसुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भीउन का दम-साज़ अपने सिवा कौन हैशहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन हैदस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँचली है रस्म कि कोई न सर उठा के चलेजो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकलेनज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चलेहै अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशादकि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहरवो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहींये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले करचले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहींफ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िलकहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिलकहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिलजवाँ लहू की पुर-असरार शाह-राहों सेचले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़ेदयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों सेपुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहेबहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगनबहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामनसुबुक सुबुक थी तमन्ना दबी दबी थी थकन
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैंतेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराबदश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तलेखिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
तेरे होंटों के फूलों की चाहत में हमदार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गएतेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हमनीम-तारीक राहों में मारे गए
सुनो मेरी कहानी पर मियाँ मेरी कहानी क्यामैं यकसर राइगानी हूँ हिसाब-ए-राइगानी क्याबहुत कुछ था कभी शायद पर अब कुछ भी नहीं हूँ मैंन अपना हम-नफ़स हूँ मैं न अपना हम-नशीं हूँ मैंकभी की बात है फ़रियाद मेरा वो कभी यानीनहीं इस का कोई मतलब नहीं इस के कोई मअनीमैं अपने शहर का सब से गिरामी नाम लड़का थामैं बे-हंगाम लड़का था मैं सद-हंगाम लड़का थामिरे दम से ग़ज़ब हंगामा रहता था मोहल्लों मेंमैं हश्र-आग़ाज़ लड़का था मैं हश्र-अंजाम लड़का थामिरे हिन्दू मुसलमाँ सब मुझे सर पर बिठाते थेउन्ही के फ़ैज़ से मअनी मुझे मअनी सिखाते थेसुख़न बहता चला आता है बे-बाइस के होंटों सेवो कुछ कहता चला आता है बे-बाइस के होंटों सेमैं अशराफ़-ए-कमीना-कार को ठोकर पे रखता थासो मैं मेहनत-कशों की जूतियाँ मिम्बर पे रखता थामैं शायद अब नहीं हूँ वो मगर अब भी वही हूँ मैंग़ज़ब हंगामा-परवर ख़ीरा-सरा अब भी वही हूँ मैंमगर मेरा था इक तौर और भी जो और ही कुछ थामगर मेरा था इक दौर और भी जो और ही कुछ थामैं अपने शहर-ए-इल्म-ओ-फ़न का था इक नौजवाँ काहिनमिरे तिल्मीज़-ए-इल्म-ओ-फ़न मिरे बाबा के थे हम-सिनमिरा बाबा मुझे ख़ामोश आवाज़ें सुनाता थावो अपने-आप में गुम मुझ को पुर-हाली सिखाता था
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्तगर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकनतिरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलनमेरी दिल-जूई मिरे प्यार से मिट जाएगीगर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस सेजी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाएगर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्तरोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँमैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरींआबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीतआमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीततुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँकैसे मग़रूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्मगर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैंकैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूशदेखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैंकिस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोरयक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता हैकैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख़-ए-गुलाबकिस तरह रात का ऐवान महक जाता हैयूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिरगीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिरपर मिरे गीत तिरे दुख का मुदावा ही नहींनग़्मा जर्राह नहीं मूनिस-ओ-ग़म ख़्वार सहीगीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सहीतेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवाऔर ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहींइस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहींहाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हमऔर कुछ देर सितम सह लें तड़प लें रो लेंअपने अज्दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
इस वक़्त तो यूँ लगता है अब कुछ भी नहीं हैमहताब न सूरज, न अँधेरा न सवेराआँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमनऔर दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरामुमकिन है कोई वहम था, मुमकिन है सुना होगलियों में किसी चाप का इक आख़िरी फेराशाख़ों में ख़यालों के घने पेड़ की शायदअब आ के करेगा न कोई ख़्वाब बसेराइक बैर न इक मेहर न इक रब्त न रिश्तातेरा कोई अपना, न पराया कोई मेरा
सब माया है, सब ढलती फिरती छाया हैइस इश्क़ में हम ने जो खोया जो पाया हैजो तुम ने कहा है, 'फ़ैज़' ने जो फ़रमाया हैसब माया है
ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्तेकि बख़्शा गया जिन को ज़ौक़-ए-गदाईज़माने की फटकार सरमाया इन काजहाँ भर की धुत्कार इन की कमाई
(1)ताज़ा हैं अभी याद में ऐ साक़ी-ए-गुलफ़ामवो अक्स-ए-रुख़-ए-यार से लहके हुए अय्यामवो फूल सी खुलती हुई दीदार की साअ'तवो दिल सा धड़कता हुआ उम्मीद का हंगाम
मिरे दिल, मिरे मुसाफ़िरहुआ फिर से हुक्म सादिरकि वतन-बदर हों हम तुमदें गली गली सदाएँकरें रुख़ नगर नगर, काकि सुराग़ कोई पाएँकिसी यार-ए-नामा-बर काहर इक अजनबी से पूछेंजो पता था अपने घर कासर-ए-कू-ए-ना-शनायाँहमें दिन से रात करनाकभी इस से बात करनाकभी उस से बात करनातुम्हें क्या कहूँ कि क्या हैशब-ए-ग़म बुरी बला हैहमें ये भी था ग़नीमतजो कोई शुमार होताहमें क्या बुरा था मरनाअगर एक बार होता!
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'दफिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'दकब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहारख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'दथे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ केथीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'ददिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दीकुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'दउन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किएअन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द
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