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नज़्म
रह-ए-मंज़िल में हम दुश्वारियों का ग़म नहीं करते
गुज़र जाते हैं हँस कर फ़िक्र-ए-पेच-ओ-ख़म नहीं करते
मुनीर वाहिदी
नज़्म
सड़ चुके इस के अनासिर हट चुका सोज़-ए-हयात
अब तुझे फ़िक्र-ए-इलाज-ए-दर्द-ए-इंसाँ है तो क्या
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
उलझ कर रह गए हैं मुद्दइ'यान-ए-रुबूबिय्यत
ख़याल-ए-ख़ाम बिल-आख़िर ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
दिल की आँखों से परे मेरी निगाहों से परे
फिर वही फ़िक्र-ए-सफ़र फ़िक्र-ए-तलब फ़िक्र-ए-ज़वाल
सोहन राही
नज़्म
ग़म को ख़ुद आकर बहा जाएगी मौज-ए-सुरूर
देखता क्या है उठ और फ़िक्र-ए-मय-ओ-पैमाना कर
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
दर्दमंदान-ए-मोहब्बत के दिलों की धड़कन
मश'अल-ए-हुर्रियत-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र महर-ए-यक़ीं
मुस्लिम शमीम
नज़्म
ऐ कि सीने में तिरे अरमान-ए-गुल है बे-क़रार
देखना बेदाद-ए-नोक-ए-ख़ार से भी होशियार