aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ghulne"
मैं इक देवता-ए-अनानर्गिसिय्यत का मारा हुआऔर अज़ल से तकब्बुर में डूबा हुआकाफ़ी ख़ुद-सर हूँज़िद्दी हूँ मग़रूर हूँमेरे चारों तरफ़ मेरी अंधी अना की वो दीवार हैजिस में आने की और मुझ से मिलने की घुलने की कोई इजाज़त किसी को नहीं हैतुम्हें भी नहीं हैउसे भी नहीं हैमुझे भी नहीं हैमैं अपनी अना की दीवारों में तुम से अलग हो रहूँमुझ पे सजता भी है येमैं शाइ'र हूँ जो कि फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तकहर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा हूँमैं लफ़्ज़ों का आक़ातख़य्युल का ख़ालिक़मैं सारे ज़माने से यकसर जुदा हूँमुझे ज़ेब देता है मैं अपनी दीवार में इस तरह से मुक़य्यद रहूँयूँही सय्यद रहूँमुझ पे सजता है ये।पर जो कल शब तिरे शबनमी से तबस्सुम में लिपटी हुईइक नज़र बे-नियाज़ी से मुझ पर पड़ीतेरी पहली नज़र से मिरी जान-ए-जाँमेरी दीवार में इक गढ़ा पर पड़ गयाऔर ये ही नहीं मुझ पे वो ही नज़रजब दोबारा दोबारा दोबारा पड़ीमेरी दीवार में ज़लज़ले आ गएऔर रख़्ने शिगाफ़ों में ढलने लगेमेरे अंदर तलातुम वो आतिश-फ़िशाँवो बगूले वो तूफ़ाँ वो महशर बपा थाकि मैं वो कि जिस के तहम्मुल की हिकमत कीफ़हम-ओ-लताफ़त की तमसील शायद कहीं भी नहीं थीसुलगने लगाअपनी हिद्दत से ख़ुद ही पिघलने लगातुझ से कहना था ये कि मिरी जान-ए-जाँहर सितारे की अपनी कशिश होगी लेकिनख़लाओं में मुर्दा सितारों की क़िस्मतवो हॉकिंग की थ्योरी के काले गढ़ेवो वही वो कि जिन में है इतनी कशिश कि मकाँ तो मकाँवो ज़माँ को भी अपने लपेटे में ले लेंवो हॉकिंग की थ्योरी के काले गढ़ों की ग्रेविटी भीतेरी अंखों की गहरी कशिश के मुक़ाबिल में कुछ भी नहींऔर ये तो फ़क़त एक दीवार थीइस को गिरना ही थातेरी नज़रों से हारी है बिखरी पड़ी हैकि दीवार का रेज़ा-रेज़ा तिरी इक नज़र से मिरी जानउजड़ा पड़ा हैमैं जो देवता-ए-अना नर्गिसिय्यत का मारा हुआ वो जो ख़ुद-सर थाज़िद्दी था मग़रूर थाजो फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तक हर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा थातिरी इक नज़र से अनाओं के अर्श-ए-मुअ'ल्ला से सीधा तिरे पाँव में आ केबिखरा पड़ा है
कभी मोहब्बत को याद न बनने देनातुम्हें मा'लूम नहीं हैमोहब्बत याद बन जाए तोलम्बे घने दरख़्तों की शाख़ों की मानिंदबदन के गिर्दयूँ लिपट जाती हैं कि साँसेंरुक रुक कर आती हैंएक लम्हे कोयूँ लगता है जैसेज़िंदगी और मौत के बीच ख़ाना-जंगी मेंज़िंदगी हार जाएगीमगर मोहब्बत की सिसकियाँकुछ देर सहम करचुप ओढ़ लेती हैंऔर फिर उस एक लम्हे की मौतकई सदियों पर भारी हो जाती हैसुनोबस उस एक लम्हे की स्याहीरगों में घुलने से पहलेये जान लोमोहब्बत को कभी याद न बनने देना
मेरे घर की दीवारें अब मुझ को चाट रही हैंसारे शहर की मिट्टी में जो मेरा हिस्सा थावो भी लोगों में तक़्सीम हुआ है अपनी उस की क़ब्र पर मेरी आँखेंउड़ती धूल कीख़ुशबू थामे लटक कर लेट गई हैंऐसे समय अब कौन आता हैटेढ़ी तिरछी उँगलियों में सारे वफ़ा के धागे हल्के हल्के टूट रहे हैंहड्डियों के जलने की बू बिस्तर की शिकनों में घुलने लगी हैदरवाज़ों को बंद करो या खोलोहवा में शो'ले मद्धम मद्धम राख की सूरत सोते जाते हैंऔर हम उखड़ी साँस के वक़्फ़े में लफ़्ज़ों के ता'वीज़ गले में डालेतस्वीरों से पूछते हैं तुम आओगेआओगे तो अपनी आवाज़ों के साए भी ले जानासारे ख़्वाब और परछाईं तुम्हारी साल-गिरह का तोहफ़ा हैंइन पर नए चमकीले वरक़ लगा करऐसी ही लड़की को भेजवाना जिस को तुम ने अपना कहा होवो लड़की भी दरवाज़ों की दरवाज़ों से अब हर्फ़-ए-वफ़ा को सुनने लगी हैइस को तुम मत तरसाना उस के पास चले जानाया उस को पास बुला लेना वो आ जाएगीलड़की है ना कहना कैसे टालेगी
तेज़ महकारफिर लहरये-दार तस्वीर में ढल गईएक सिगरेट थी जल गईदूसरी तेरे हाथों में आ के सुलगने लगीराख झड़ने लगीराख-दाँ इस नवम्बर का भर जाएगाऔर भी आख़िर आख़िर आए आएगाराख से उड़ती चिंगारियों से भरा एक दिनकब का सूरज की आँखों में रक्खा हुआरात के इस किनारे पे टाँका हुआ चाँद हैरान हैधुँद अतराफ़ में तो धुएँ ही से आमेज़ हैआँच क्यों तेज़ हैज़र्द पत्ते दहकने लगे चार सूफिर ज़मिस्ताँ की साँसों मेंघुलने लगी है कोई आरज़ूतेज़ महकार है
जब शाम की पलकें थर्राईंयादों की आँखें भर आईंहर लहर में एक समुंदर थाजो दिल को बहा ले जाता थासाहिल से दूर जज़ीरों परदिल बहते बहते डूब गयाफिर रात हुईफिर हवा में आँसू घुलने लगेफिर ख़्वाबों की मेहराबों मेंमैं घर का रस्ता भूल गयाफिर साँस से पहले मौत आईऔर खेल-तमाशा ख़त्म हुआमैं बीच गली में कैसे गिर करटूट गया
उस लम्स का कोई नाम तो हो जो तुझ को सोच के जगता हैजो तेरे ज़िक्र के आते ही रग रग में दौड़ने लगता हैक्यूँ तेरे नाम को सुनते ही मिरी साँस महकने लगती हैएहसास नशे में होता है हर फ़िक्र बहकने लगती हैइक नादीदा एहसास मिरी पोरों में घुलने लगता हैइक बंद दरीचा हसरत का ख़्वाबों में खुलने लगता हैजब चाँद निकल कर बादल से आँखों में सपना बोता हैइक ख़्वाहिश की तन्हाई से बेदार जुनूँ जब होता हैजब दश्त-ए-तलब में प्यास मिरी आँखों को निगलने लगती हैजब आस उमीद की दुनिया में इक शाम सी ढलने लगती हैजिस वक़्त ग़मों की वहशत का इक साया मुझ पर झुकता हैउस वक़्त तिरा एहसास मिरे पहलू में आ कर रुकता हैऔर उस एहसास के छूते ही मैं ताबिंदा हो जाती हूँमिरी साँसें चलने लगती हैं फिर से ज़िंदा हो जाती हूँ
तू कि शहकार-ए-सन्ना'-ए-हर-अव्वलींतू बयाँ में नहीं दस्तरस में नहींहुस्न काफ़िर तिरा आँख तौबा-शिकनदाव पर लग गए जान-ओ-ईमान भीतू दलील-ए-सहर शम'-ए-बहर-ओ-बरराह-ए-ईमान भी रंग-ए-विज्दान भीतेरी आँखों में दैर-ओ-हरम क़ैद हैजाम-ए-गुलफ़ाम क्या जाम-ए-जम क़ैद हैगाहे रंग-ए-ग़िलाफ़-ए-हरम हो गईंगाहे रंग-ए-हिना दम-ब-दम हो गईंगाहे कितनों को भटका दिया राह सेगाहे ये मंज़िलों का 'अलम हो गईंतेरी पलकें झुकीं चाँद ढलने लगेशाम होने लगी ज़ख़्म जलने लगेसाहिरा फिर तिरा सेहर होने लगालोग गिरने लगे होश उड़ने लगेतेरा रुख़्सार है चाँदनी की हयादूध में जैसे सिंदूर घुलने लगातेरे रुख़्सार रंग-ए-शफ़क़ हो गएया'नी ये शा'इरी के उफ़ुक़ हो गएकिस को तश्बीह दूँ इस्ति'आरा करूँलब को लब के लिए ही गवारा करूँहोंट क्या आयतें हैं ये क़ुरआन कीजान हैं जान-ए-जाँ ये तिरी जान कीउन से छू लें तो अल्फ़ाज़ ख़ुशबू बनेंक़हक़हे नूर बन जाएँ जादू बनेंशबनमी पंखुड़ी पंखुड़ी हैं फ़क़तऔर क्या मैं कहूँ ज़िंदगी हैं फ़क़तसोचता हूँ तो कुछ सोचा जाता नहींहुस्न तेरा तो अब देखा जाता नहींया'नी 'जावेद-अख़्तर’ ने सच ही कहाहुस्न-ए-जानाँ की ता'रीफ़ मुमकिन नहींहुस्न-ए-जानाँ की ता'रीफ़ मुमकिन नहीं
ताज़ा लहू पी के फिर से किसी खोए नशेकी जन्नत में घुलनेख़याली अज़ाबों में जलने की हैरत से गोयासरापा ज़र-ओ-सीम की यख़ सलाख़ें और आँखेंबिलोर और हीरेख़ज़ाने तो सब ख़ाक में मिल चुके हैंहवा और हवस के पुराने ठिकानों पे अब नौ-ब-नौफूल हसरत के देखो
सुर्ख़ आँखें घुमाते हुए भेड़िये रात का हुस्न हैंसरसराते हुए शाख़चों में छुपे माँदा पंछीमुसल्ले पे बैठे हुए रीश-दार अहल-ए-बातिनपिंघूड़े में किलकारते नूर चेहरेये बिस्तर बदलती हुई लड़कियाँज़हर उगलते हुए साँपदीवार पर जस्त करते हुए साएलड़ती हुई बिल्लियाँरात का हुस्न हैंअपने सर पर ये सदियों से फैला हुआ बे-मह-ओ-नज्म गर्दूंसर-ए-शाम रंग अपना तब्दील करता है तो रात का आईना जागता हैअँधेरों भरे आईने में सदाएँ हैं, सूरत नहींसामेआ शक्ल तरतीब देता हैसुनते हुए जगमगाते हैं आवाज़ के ख़ाल-ओ-ख़दमैं ने सरगोशियों क़हक़हों मंज़िलों आहटोंऔर आहों में देखा है हुस्नएक पैराए में सर उठाती हैं गुर्राहटें, वस्ल-आसार साँसेंये पलकें जो आहिस्ता आहिस्ता ढलने लगी हैंशफ़क़ जो अँधेरे में घुलने लगी हैयही रात का हुस्न हैरात आँखों में है
हर रोज़मक़ाम-ए-इंतिक़ाल परवक़्त के तेज़-गाम घोड़े पर सवारदाएरों में दौड़ते दिन और रातगिर्ये का बे-सदा गीत गाते हैंहर रातआलम-ए-सुपुर्दगी में आ करवोएक दूसरे से खुलने से पहलेया फिरएक दूसरे में घुलने से पहलेअपना अपना ग़म अपना अपना नमसुरमई हाशियों पर छोड़ जाते हैं
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों सेपीप बहती हुई गलते हुए नासूरों सेलौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजेअब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैंतेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराबदश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तलेखिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्तगर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकनतिरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलनमेरी दिल-जूई मिरे प्यार से मिट जाएगीगर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस सेजी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाएगर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्तरोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँमैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरींआबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीतआमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीततुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँकैसे मग़रूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्मगर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैंकैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूशदेखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैंकिस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोरयक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता हैकैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख़-ए-गुलाबकिस तरह रात का ऐवान महक जाता हैयूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिरगीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिरपर मिरे गीत तिरे दुख का मुदावा ही नहींनग़्मा जर्राह नहीं मूनिस-ओ-ग़म ख़्वार सहीगीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सहीतेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवाऔर ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहींइस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहींहाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा
ऐ दिल पहले भी तन्हा थे, ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैंऔर उन ज़ख़्मों और दाग़ों से अब अपनी बातें होती हैंजो ज़ख़्म कि सुर्ख़ गुलाब हुए, जो दाग़ कि बदर-ए-मुनीर हुएइस तरहा से कब तक जीना है, मैं हार गया इस जीने से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भीमगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल औरमहके हुए रुकएकिताबें माँगने गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थेउन का क्या होगावो शायद अब नहीं होंगे!
देखूँ जो आसमाँ से तो इतनी बड़ी ज़मींइतनी बड़ी ज़मीन पे छोटा सा एक शहरछोटे से एक शहर में सड़कों का एक जालसड़कों के जाल में छुपी वीरान सी गलीवीराँ गली के मोड़ पे तन्हा सा इक शजरतन्हा शजर के साए में छोटा सा इक मकानछोटे से इक मकान में कच्ची ज़मीं का सहनकच्ची ज़मीं के सहन में खिलता हुआ गुलाबखिलते हुए गुलाब में महका हुआ बदनमहके हुए बदन में समुंदर सा एक दिलउस दिल की वुसअ'तों में कहीं खो गया हूँ मैंयूँ है कि इस ज़मीं से बड़ा हो गया हूँ मैं
न सर्व में वो ग़ुरूर-ए-कशीदा-क़ामती हैन क़ुमरियों की उदासी में कुछ कमी आईन खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाबन शाख़-ए-अम्न लिए फ़ाख़्ता कोई आई
हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सहीज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म मेंक़ातिल को जो न टोके वो क़ातिल के साथ हैहम सर-ब-कफ़ उठे हैं कि हक़ फ़तह-याब होकह दो उसे जो लश्कर-ए-बातिल के साथ हैइस ढंग पर है ज़ोर तो ये ढंग ही सहीज़ालिम की कोई ज़ात न मज़हब न कोई क़ौमज़ालिम के लब पे ज़िक्र भी इन का गुनाह हैफलती नहीं है शाख़-ए-सितम इस ज़मीन परतारीख़ जानती है ज़माना गवाह हैकुछ कोर-बातिनों की नज़र तंग ही सहीये ज़र की जंग है न ज़मीनों की जंग हैये जंग है बक़ा के उसूलों के वास्तेजो ख़ून हम ने नज़्र दिया है ज़मीन कोवो ख़ून है गुलाब के फूलों के वास्तेफूटेगी सुब्ह-ए-अम्न लहू-रंग ही सही
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