aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "gii"
जनवरी फ़रवरी मार्च में पड़ेगी सर्दीऔर अप्रैल मई जून में हो गी गर्मी
गाती है गीत कोई झूले पे कर के फेरामारो जी आज कीजिए याँ रैन का बसेराहै ख़ुश किसी को आ कर है दर्द-ओ-ग़म ने घेरामुँह ज़र्द बाल बिखरे और आँखों में अँधेराक्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
थी बुज़ुर्गों की जो बनियाइन वो बनिया ले गयाघर में जो गाढ़ी कमाई थी वो गाढ़ा ले गयाजिस्म की एक एक बोटी गोश्त वाला ले गयातन में बाक़ी थी जो चर्बी घी का प्याला ले गया
हमें जवानी में मौत आएगीभीगते तकिए के सर्द सीने पेअपनी साँसों में गर्म बाँहों की प्यास ले कर सुलगने वालीहर एक दोशीज़ा जानती हैकि आँख जब ख़्वाब के सहीफ़े को चाट ले गीतो नूह कैप्सूल से पुकारेगाप्यारे बेटे, अमाँ में आओलो, मैं ने जो क़ब्र उम्र के बेलचे से अपने लिए बनाई हैउस की रानों मेंतुम भी अपना बदन समेटोतुम्हारे एक हाथ चाँद और दूसरे पे सूरजकि मस्लहत की क्रेज़ क़ाएम रहेग्लैमर तुम्हारे कॉलर में फूल बन कर खिलेऐ बेटे, ये शहर उर्यानियों में नुचड़ेगाऔर इस पर अज़ाब दाइम है
गोश्त मछली सब्ज़ियाँ बनिए का राशन दूध घीमुझ को खाती हैं ये चीज़ें मैं ने कब खाया इन्हेंमेरा घर रहता है मुझ में घर में मैं रहता नहींबीवी बच्चों के फटे कपड़ों में हूँऔर नए जोड़ों की ख़ुशियों में छुपा जो कर्ब है वो भी हूँ मैंफ़ीस में स्कूल की कापी किताबों में भी मैंमैं ही हूँ चूल्हे की गैसमैं ही हूँ स्टोव का गैसमेरे जूते जोंक की मानिंद मेरे पाँव से लिपटे हुए हैंचूसते हैं मेरा ख़ूनमेरा स्कूटर मेरे काँधों पे बैठा हैमैं उस के टायरों में लिपटा हूँ और घिसता हूँ
एक लड़की बघारती है दालदाल करती है अर्ज़ यूँ अहवालएक दिन था हरी-भरी थी मैंसारी आफ़ात से बरी थी मैंथा हरा खेत मेरा गहवारावो वतन था मुझे बहुत प्यारापानी पी पी के थी मैं लहरातीधूप लेती कभी हवा खातीमेंह बरसता था झोंके आते थेगोदियों में मुझे खिलाते थेयही सूरज ज़मीं थे माँ बावामुझ से करते थे नेक बर्तावाजब किया मुझ को पाल-पोस बड़ाआह ज़ालिम किसान आन पड़ागई तक़दीर यक-ब-यक जो पलटखेत का खेत कर दिया तलपटख़ूब लूटा धड़ी धड़ी कर केमुझ को गौनों में ले गए भर केहो गई दम के दम में बर्बादीछिन गई हाए मेरी आज़ादी!क्या बताऊँ कहाँ कहाँ खींचादाल-मण्डी में मुझ को जा बेचाएक ज़ालिम से वाँ पड़ा पालाजिस ने चक्की में मुझ को दल डालाहुआ तक़दीर का लिखा पूरादोनों पाटों ने कर दिया चूरान सुनी मेरी आह और ज़ारीख़ूब बनिए ने की ख़रीदारीछाना छलनी में छाज में फटकाक़ैद-ख़ाना मिरा बना मटकाफिर मुक़द्दर मुझे यहाँ लायातुम ने तो और भी ग़ज़ब ढायाखाल खींची अलग किए छिलकेज़ख़्म क्यूँ-कर हरे न हों दिल केडालीं मिर्चें नमक लगाया ख़ूबरख के चूल्हे पे जी जलाया ख़ूबउस पे कफ़-गीर के भी ठोके हैंऔर नाख़ुन के भी कचोके हैंमेरे गलने की ले रही हो ख़बरदाँत है आप का मिरे ऊपरगर्म घी कर के मुझ को दाग़ दियाहाए तुम ने भी कुछ न रहम कियाहाथ धो कर पड़ी हो पीछे तुमजान पर आ बनी हवास हैं गुमअच्छी बी-बी तुम्हीं करो इंसाफ़ज़ुल्म है या नहीं क़ुसूर-मुआफ़कहा लड़की ने मेरी प्यारी दालमुझ को मालूम है तिरा सब हालतू अगर खेत से नहीं आतीख़ाक में मिल के ख़ाक हो जातीया कोई गाए भैंस चर लेतीपेट में अपने तुझ को भर लेतीमैं तो रुत्बा तिरा बढ़ाती हूँअब चपाती से तुझ को खाती हूँन सताना न जी जलाना थायूँ तुझे आदमी बनाना थाअगली बीती का तू न कर कुछ ग़ममेहरबानी थी सब, न था ये सितम
राम के हिज्र में इक रोज़ भरत ने ये कहाक़ल्ब-ए-मुज़्तर को शब-ओ-रोज़ नहीं चैन ज़रादिल में अरमाँ है कि आ जाएँ वतन में रघुबिरयाद में उन की कलेजे में चुभे हैं नश्तरकोई भाई से कहे ज़ख़्म-ए-जिगर भर दें मिराख़ाना-ए-दिल को ज़ियारत से मुनव्वर कर देंराम आएँ तो दिए घी के जलाऊँ घर घरदीप-माला का समाँ आज दिखाऊँ घर घरतेग़-ए-फ़ुर्क़त से जिगर पाश हुआ जाता हैदिल ग़म-ए-रंज से पामाल हुआ जाता हैदाग़ हैं मेरे जले दिल पे हज़ारों लाखोंग़म के नश्तर जो चले दिल पे हज़ारों लाखोंकह रहे थे ये भरत जबकि सिरी-राम आएधूम दुनिया में मची नूर के बादल छाएअर्श तक फ़र्श से जय जय की सदा जाती थीख़ुर्रमी अश्क हर इक आँख से बरसाती थीजल्वा-ए-रुख़ से हुआ राम के आलम रौशनपुर उमीदों के गुलों से हुआ सब का दामनमोहनी शक्ल जो रघुबिर की नज़र आती थीआँख ताज़ीम से ख़िल्क़त की झुकी जाती थीमुद्दतों बा'द भरत ने ये नज़ारा देखाकामयाबी के फ़लक पर था सितारा चमकादिल ख़ुशी से कभी पहलू में उछल पड़ता थाहो मुबारक ये कभी मुँह से निकल पड़ता थाहोते रौशन हैं चराग़ आज जहाँ में यकसाँगुल हुआ आज ही पर एक चराग़-ए-ताबाँहै मुराद उस से वो भारत का चराग़-ए-रौशननाम है जिस का दयानंद जो था फ़ख़्र-ए-वतनजिस दयानंद ने भारत की पलट दी क़िस्मतजिस दयानंद ने दुनिया की बदल दी हालतजिस दयानंद ने गुलज़ार बनाए जंगलजिस दयानंद ने क़ौमों में मचा दी हलचलआज वो हिन्द का अफ़्सोस दुलारा न रहाग़म-नसीबों के लिए कोई सहारा न रहायाद है उस की ज़माने में हर इक सू जारीउस की फ़ुर्क़त की लगी तेग़ जिगर पर कारीदिल ये कहता है कि इस वक़्त ज़बानें खोलेंआओ मिल मिल के दयानंद की हम जय बोलें
ताँगे का एक घोड़ालंगड़ा था थोड़ा थोड़ापूछा जो मैं ने उस सेक्या पाँव में है फोड़ाबोला ये ज़ुल्म मुझ परइक आदमी ने तोड़ापहले तो उस ने मुझ कोताँगे में ला के जोड़ाफिर उस को ख़ूब भर करबोला कि चल मनोड़ाजब मैं खिसक न पायालहराया उस ने कोड़ामारा मुझे तड़ातड़फिर दुम को भी मरोड़ामैं बिलबिला के भागाबस बन गया भगोड़ाख़ुद भी गिरा फिसल करएक इक का सर भी फोड़ाउस दिन से आज तक मैंलंगड़ा हूँ थोड़ा थोड़ाये दास्ताँ सुना करबोला वो हिनहिना करमैं ने तो मुन्नू भाईतबीअत है सादा पाईख़ुद अपने मुँह से अपनीकरता नहीं बड़ाईक़ुरआन-ए-पाक ने भीमेरी क़सम है खाईगर तीसवां सिपारातुम ने पढ़ा हो भाईवल-अदियात ज़बहन मेंबात है ये आईइंसाँ तो अपने रब सेकरता हे बेवफ़ाईबस माल-ओ-ज़र के पीछेहै ज़िंदगी गँवाईघोड़ों ने मालिकों परहै जान भी लुटाईहम लोग हँसते गातेहर बोझ हैं उठातेहैं जानवर हमेशाइंसाँ के काम आतेमाहौल की कशिश भीहम लोग हैं बढ़ातेदिलकश परिंद प्यारेशाख़ों पे चहचहातेसारे नमाज़ियों कोहर सुब्ह हैं जगातेफिर ख़ुद भी अपने रब कीहम्द-ओ-सना हैं गातेसौ सौ तरह तुम्हाराहम दिल भी हैं लुभातेकुछ ऐसे हैं कि जिन सेतुम हो दवा बनातेकुछ ऊन तुम को दे करसर्दी से हैं बचातेकुछ दूध तुम को देतेकुछ गोश्त हैं खिलातेगर जानवर न होतेतुम घी किधर से लातेमक्खन पनीर अंडेआख़िर कहाँ से खातेबस क्या कहूँ कि क्या क्याहैं फ़ाएदे उठातेफिर भी हैं लोग हम कोहर तरह से सतातेये बात कहते कहतेदुखड़ा ये सब सुनातेऐसा वो बिलबिलायामैं कुछ भी कह न पाया
विदाई के बाद की रात आई थीमैं पहली बार प्यार से कुछ यूँ शर्माई थीआँखें न सही पर दिल मेरे पास थाउस दिल में बसा अब कोई ख़ास थामैं कान लगा कर सुनती रहीबिन आँखें भी राहें तकती रहीइसी सोच में रैना बीतती गईमेरी ख़ुशियाँ हर सोच से जीतती गईआख़िर प्यार मैं ने पाया थाये प्यार मुझे जन्नत में लाया था
इक खाता है हलवा पूरीइक खाता है घी कचौरीइक खाता है गर्म पकौड़ेइक खाता है बर्फ़-मलाईटूट बटूट की शामत आईटूट बटूट के चार हैं भाई
जंग के बारे में हम बच्चों की इक तज्वीज़ हैताकि सब ख़ुश हो के बोलें जंग अच्छी चीज़ हैआप को मा'सूम बच्चों का है गर कुछ भी ख़यालबैठे बैठे एक दम हो जाइए ग़ुस्से से लालखोए की तोपें लिए मैदान में आ जाइएइन से रस-गुल्लों के गोले हर तरफ़ बरसाइएमीठे गोले आप की तोपों के हम खाते रहेंहोंट ये क़ौमी तराने दम-ब-दम गाते रहेंहों हर इक बंदूक़ में रबड़ी के रंगीं कारतूसऔर हर इक टैंक की टँकी में मौसम्मी का जूसआप के दुश्मन की फ़ौजों को हो जब ग़ुस्से की प्यासपेश कीजे मुस्कुरा कर उन को शर्बत का गिलासदूध के सागर में हों कूज़े की मिस्री के जहाज़जिस में हों जासूस सीने में लिए टॉफ़ी के राज़बम फटें तो उन से निकलें झट खिलौने बे-शुमारठा हो और लग जाए गुड्डों और गुड़ियों की क़तारगर कोई बीमार हो चिल्ला रहा हो पेन सेचाकलेट पहुँचाइए झट उस को एरोप्लेन सेकोई ना-माक़ूल आ कर गालियाँ भी दे अगरउस से कहिए भाग जा हट तेरे मुँह में घी शकर
मैं सोचता हूँ तो बस ये कि अब तुम्हारी शक्लगुज़रते वक़्त के हाथों बदल गई होगीख़मीदा ज़ुल्फ़ों की काली घटा में अब शायदसफ़ेद बालों की तादाद बढ़ गई हो गीतुम्हारे गाल पे जो एक तिल चमकता थापता नहीं वो चमक इस में अब भी बाक़ी हैतुम्हारी आँखों में इक चाँदनी सी रौशन थीपता नहीं वो दमक इस में अब भी बाक़ी हैतुम्हारी बातों में फूलों की सी महक थी जोपता नहीं वो महक अब भी सुनने वाले कोमशाम-ए-जाँ में उतर कर निहाल करती है
शहर की इक इक सड़कफाँकती आई है लाखों हादसों की सर्द धूलजाने कितने अजनबी इक दूसरे के दोस्त बनने से किनारा कर गएऔर कितने आश्नाओं के दिलों से मिट गई पहचान भीसौ निगाहें लाख ज़ख़्मचार-समती लाख झूटसौ तमाशों के पड़े हैं जा-ब-जा धब्बेजिन्हेंगर्द-ए-मसाफ़त में छुपाने के लिएबर्क़-पा लम्हों को थामे दौड़ते जाते हैं हमलम्हे दो लम्हे को दम लेने की ख़ातिर सुस्त हो जाएँ अगरशहर की इक इक सड़कआँखों से ख़ूँ रुलवाएगीऔर बना कर हम को भी इक दास्ताँदोहराए गीहाँफती तहज़ीब के इक इक मुसाफ़िर से कहेगीदौड़ते जाओ यही है ज़िंदगीमत रुको इक दूसरे के वास्तेभागता है वक़्तलेकिन लम्हा लम्हादौड़ना है सब कोलेकिन तन्हा तन्हा
क्या ख़ुदा तुझ को भूल जाऊँ मैंकिस लिए तेरे गुन गाऊँ मैंमुझ को इंसाँ बना दिया तू नेसीधा रस्ता बता दिया तू नेफिर समझ दी कि नेक काम करूँकितना ऊँचा उठा दिया तू नेक्या ये एहसान भूल जाऊँ मैंकिस लिए तेरे गुन न गाऊँ मैंचाँद सूरज जो जगमगाते हैंगर्मी और रौशनी बहाते हैंज़िंदगी का यही सहारा हैंखेतियाँ भी यही पकाते हैंये न चमकें तो कुछ न खाऊँ मैंकिस लिए तेरे गुन न गाऊँ मैंये घटाएँ ये ठंडी ठंडी हवाये समुंदर पहाड़ ये दरियाये घने और ये लहलहाते खेततू ने मेरे लिए किए पैदादेन को तेरी क्या गिनाऊँ मैंकिस लिए तेरे गुन न गाऊँ मैंगाय या भैंस बैल या बकरीऊँट घोड़े पहाड़ से हाथीदूध घी दें मुझे सवारी देंजोतें बोएँ यही मेरी खेतीक्या दिया तू ने क्या बताऊँ मैंकिस लिए तेरा गुन न गाऊँ मैंतू ने माता पिता का प्यार दियाफिर मुझे इल्म से सँवार दियाबढ़ के इन सब से तंदुरुस्ती दीजो दिया तू ने बे-शुमार दियाचाहिए सर तुझे झुकाऊँ मैंकिस लिए तेरे गुन न गाऊँ मैं
आटे के और घी के कनस्तरताले पड़े हैं इन में यकसर
तारों भरी इक रात होक़िस्सों में कोई बात होइक बढ़िया रूई काततीऔर घी के लड्डू बाँटतीपीतल की घंटी बोलतीकानों में रस है घोलतीघुंघरू खनक कर रह गएतारे छिटक कर रह गएजब नींद आए दूर सेहम को मनाए दूर सेआओ चलें हम चाँद परतारों भरी इक रात में
घी तुड़ा कर पास वालों की ख़बर लेता हुआचर से शालों पर टपक जाने से बू देता हुआअध-जले ईंधन का आँखों में धुआँ भरता हुआनर्गिस-ए-शहला में सीमाब-ए-ख़िज़ाँ भरता हुआनेक-दिल पत्नी का हिस्सा है मुसीबत झेलनापूरियाँ तलने का पस-मंज़र है पापड़ बेलना
न किरदार असली न गुफ़्तार असलीहो किस तरह दुनिया में ब्योपार असलीइलेक्शन में जीते हैं रिश्वत के बल पेवो कैसे बनाएँगे सरकार असलीब्लैक मार्किट हर जगह खुल रहे हैंन है जिंस असली न बाज़ार असलीइनान-ए-हुकूमत है क़ब्ज़े में जिन केहक़ीक़त में हैं वो ही बे-कार असलीमिलावट का है दूध और घास का घीन ग़ल्ले के मिलते हैं अम्बार असलीबनाए हुए हैं मशीनों के इंसानमुआलिज हैं असली न बीमार असलीहैं अक्सर अवारिज़ की ख़ालिक़ दवाएँन रक्खे तरक़्क़ी ने आज़ार असलीन हमदर्द असली न ग़म-ख़्वार कोईजहाँ देखो मिलते हैं मक्कार असलीबनाई है माशूक़ ने नक़ली सूरततो हो किस तरह आशिक़-ए-ज़ार असलीये मिज़्गान-ओ-अबरू बनाए हुए हैंन हैं ज़ुल्फ़ें असली न रुख़्सार असलीहै बे-कार अब असलियत की तमन्नानहीं हैं परखने के मेआ'र असलीज़मीं तो ज़मीं आसमाँ पे भी अब तोसवाबित हैं असली न सय्यार असली
आ रहा है रोज़ लैला-ए-गिरानी पुर-शबाबतेल खाते हैं जो कल तक देखते थे घी के ख़्वाबआम कपड़ा मुश्किलों से हो रहा है दस्तियाबशहर में चीनी भी मिलती है तो सोने के हिसाबये गिरानी तोड़ देगी ये तिरी दुबली कमरऐ मिरे हमदम ख़ुदा के वास्ते शादी न कर
चाँद ऊपर है नीले अम्बर मेंझील नीचे है और हम दोनोंआ मिरे पास आ यहाँ शब-भरअपने जिस्मों की वादी-ए-नौ मेंसब्ज़ पेड़ों खनकते झरनों कीनग़्मगी लतीफ़ को ढूँडेंअपनी रूहें कसाफ़त-ए-ग़म सेतैर उठेंगी ताज़ा ज़िंदादो कँवल के हसीन फूलों केरूप में ढल के मुस्कुराएँगीऔर परियाँ हमें सुलाएँ गीआसमाँ से ज़मीन तक हस्तीख़्वाब है और ख़्वाब-ए-आवाराझोंके आते हैं नर्म और ताज़ादोनों जिस्मों में राज़दारी हैदोनों रूहों पे वज्द तारी है
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books