aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "gud.dii"
आवारा ओ सरगर्दां कफ़नी-ब-गुलू-पेचाँदामाँ भी दुरीदा है गुदड़ी भी सँभाली है
बस्ता फेंक के लो जी भागा रौशन-आरा बाग़ की जानिबचिल्लाता चल गुड्डी चलपक्के जामुन टपकेंगेआँगन की रस्सी से माँ ने कपड़े खोलेऔर तन्नूर पे ला के टीन की चादर डालीसारे दिन के सुखाए पापड़लच्छी ने चादर में लपेटेबच गई रब्बा किया कराया धुल जाना थाख़ैरू ने खेत की सूखी मिट्टीझुर्रियों वाले हाथ में ले करभीगी भीगी आँखों से फिर ऊपर देखाझूम के फिर उठ्ठे हैं बादलटूट के फिर मेंह बरसेगा
किसी शहर में एक बेवा का घर थान जिस में कहीं रौशनी का गुज़र थाबड़ी थी ग़रीब और मुफ़्लिस बिचारीज़माने की दुखिया थी क़िस्मत की मारीन अपना न बेगाना ग़म-ख़्वार कोईफ़क़त एक बेटी ही बेटी थी उस कीमोहल्ले से इक रात खाना जो आयाकिया शुक्र बेवा ने ख़ुश हो के खायामगर रख लिया उस ने लड़की का हिस्सातबीअत ख़राब उस की थी कुछ ज़ियादाठहर कर मैं खाऊँगी खाना वो बोलीहिफ़ाज़त से रखिए इसे प्यारी अम्मीउसी वक़्त दर पर फ़क़ीर एक आयासदा दी कि मिल जाए कुछ राह-ए-मौलाउठी चारपाई से लड़की ये सुन करज़रा खोल दरवाज़ा झाँका जो बाहरउठी चारपाई से लड़की ये सुन करज़रा खोल दरवाज़ा झाँका जो बाहरतो क्या देखती है फ़क़ीर एक बूढ़ाफटी जिस की गुदड़ी पियाला है टूटाअजब रोनी सूरत बना के खड़ा हैकमर झुक रही है लबों पर दुआ हैपलट आई लड़की उठा लाई खानादिया अपना हिस्सा भिकारी को साराभिकारी गया यूँ दुआ उस को देताभला जो करेगा भला होगा उस काहुई सुब्ह इक अर्दली दर पे आयाबुलावे का हाकिम से परवाना लायाडरें पहले दोनों मगर अर्दली नेबँधाई जो ढारस गया ख़ौफ़ दिल सेगईं जब मिला उन को इनआ'म इतनाकभी वहम भी दिल में आया न होगाखुली बा'द में जब हक़ीक़त ये सारीकि ख़ुद हाकिम-ए-शहर था वो भिकारीजो फिरता है शब को यूँही भेस बदलेरेआ'या के हर शख़्स का हाल देखेतो करने लगीं फ़ख़्र क़िस्मत पे अपनीकि रोटी के बदले में दौलत ये पाईग़रज़ जो सवाली की पूरी करेगाख़ुदा उस का मुँह मोतियों से भरेगा
मैं उस की साँसें सूँघता हुआदरियाओं और मैदानों में दाख़िल हुआ थाऔर वो मुझे ज़रख़ेज़ ज़मीन की तरह मिली थीमैं तारीक रात में जन्मा हुआ महताब थाऔर वो शिरयानों से ख़ून उछाल देने वाली तमाज़त थीमैं रेत की कुशादा-दामनी थाऔर उस की पुश्त सरमा के सूरज की तरह थीमैं एड़ लगाए हुए घोड़े की नंगी पीठ पर कूदने वाले का बेटा थाऔर उस की आँखों मेंजाटों की ख़ूँ-रेज़ सदियाँ चुनौती देती थींवो गुनाह की तरह नमकीन थीऔर वो ज़ाइक़ा थी जो चक्खे बग़ैर ज़बान पर फिर जाता थाऔर मैं उस की गुद्दी में दाँत गाड़ देने की हसरत में थावो धरती पर फैला हुआ सरसों का खेत थीऔर उस के हाथ गंदुम काटने वाली माँ ने बनाए थेऔर उस की नाफ़ के गिर्द भरा-पुरा शिकम थाऔर उस की घुंडी में ऐसी जान थीकि उस का बाप मौर्या अहद में पत्थर चमकाने का कारी-गर मालूम होता थाऔर उस के जिस्म में तवे पर सुर्ख़ की हुई रोटी की ख़ुशबू थीऔर मैं आँतों से उगी हुई आरज़ू थाऔर मैं तलवारों की मौसीक़ी पर पढ़ा हुआ रजज़ थाऔर मैं तीर खाए हुए घोड़े से गिरी हार थाऔर वो ताने से दहकी हुई वंगार थीऔर वो ऐसी जीत थीजिस की याद मेंज़मीन पर कोई लाठ गाड़ी जा सकती थी
बतख़ का इक बच्चा पकड़ेआँगन से इक बिल्ली भागीबिल्ली पीछे कुत्ता दौड़ाचुन्नू मुन्नू गुड्डू पप्पूकल्लू सल्लू सारे बच्चेबल्ला ले कर पीछे दौड़ेसाथ में दौड़ें शन्नो अप्पीगुड्डा गुड्डी ले कर अपनेनन्ही मुन्नी चुन्नी दौड़ीअब्बा दौड़े अम्मी दौड़ींदौड़े डब्बू चच्चा भीअच्छन भाई कल्लन भाईछुट्टन भाई मनन्न भाईपीछे पीछे वो भी दौड़ेबिल्ली रुक कर ग़ुर्राईशेर की ख़ाला लहराईआँखें अपनी चमकाईंनीली तोपें दमकाईंहिम्मत सब की थर्राईसूरत इक इक मुरझाईकुत्ता दुम दबा कर भागाबिल्ली से घबरा कर भागादेख ये मंज़र सब घबराएबत्तख़ को अब कौन बचाए
ज़िंदगी से डरते हो!ज़िंदगी तो तुम भी हो ज़िंदगी तो हम भी हैं!ज़िंदगी से डरते हो?आदमी से डरते होआदमी तो तुम भी हो आदमी तो हम भी हैंआदमी ज़बाँ भी है आदमी बयाँ भी हैउस से तुम नहीं डरते!हर्फ़ और मअनी के रिश्ता-हा-ए-आहन से आदमी है वाबस्ताआदमी के दामन से ज़िंदगी है वाबस्ताउस से तुम नहीं डरते''अन-कही'' से डरते होजो अभी नहीं आई उस घड़ी से डरते होउस घड़ी की आमद की आगही से डरते हो
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूरसुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गामबदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूरनशात-ए-वस्ल हलाल ओ अज़ाब-ए-हिज्र हरामजिगर की आग नज़र की उमंग दिल की जलनकिसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहींकहाँ से आई निगार-ए-सबा किधर को गईअभी चराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहींअभी गिरानी-ए-शब में कमी नहीं आईनजात-ए-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आईचले-चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई
जब घुली तेरी राहों में शाम-ए-सितमहम चले आए लाए जहाँ तक क़दमलब पे हर्फ़-ए-ग़ज़ल दिल में क़िंदील-ए-ग़मअपना ग़म था गवाही तिरे हुस्न कीदेख क़ाएम रहे इस गवाही पे हमहम जो तारीक राहों पे मारे गए
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें हैंफ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैंअपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैंज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस मेंहर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमाराहम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमाराग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन मेंसमझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारापर्बत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ कावो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारागोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँगुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमाराऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ कोउतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारामज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखनाहिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारायूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ सेअब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमाराकुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारीसदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा'इक़बाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ मेंमालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
माना कि ये सुनसान घड़ी सख़्त कड़ी हैलेकिन मिरे दिल ये तो फ़क़त इक ही घड़ी हैहिम्मत करो जीने को तो इक उम्र पड़ी है
कुछ उजड़ी माँगें शामों कीआवाज़ शिकस्ता जामों कीकुछ टुकड़े ख़ाली बोतल केकुछ घुँगरू टूटी पायल केकुछ बिखरे तिनके चिलमन केकुछ पुर्ज़े अपने दामन केये तारे कुछ थर्राए हुएये गीत कभी के गाए हुएकुछ शेर पुरानी ग़ज़लों केउनवान अधूरी नज़्मों केटूटी हुई इक अश्कों की लड़ीइक ख़ुश्क क़लम इक बंद घड़ीमत रोको इन्हें पास आने दोये मुझ से मिलने आए हैंमैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँकुछ इतने धुँदले साए हैं
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था कट गया हैकभी सीने पे रख के लेट जाते थेकभी गोदी में लेते थेकभी घुटनों को अपने रेहल की सूरत बना करनीम सज्दे में पढ़ा करते थे छूते थे जबीं से
कभी कभी मैं ये सोचता हूँकि चलती गाड़ी से पेड़ देखोतो ऐसा लगता हैदूसरी सम्त जा रहे हैंमगर हक़ीक़त मेंपेड़ अपनी जगह खड़े हैंतो क्या ये मुमकिन हैसारी सदियाँक़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी होंये वक़्त साकित होऔर हम ही गुज़र रहे होंइस एक लम्हे मेंसारे लम्हेतमाम सदियाँ छुपी हुई होंन कोई आइंदान गुज़िश्ताजो हो चुका हैजो हो रहा हैजो होने वाला हैहो रहा हैमैं सोचता हूँकि क्या ये मुमकिन हैसच ये होकि सफ़र में हम हैंगुज़रते हम हैंजिसे समझते हैं हमगुज़रता हैवो थमा हैगुज़रता है या थमा हुआ हैइकाई है या बटा हुआ हैहै मुंजमिदया पिघल रहा हैकिसे ख़बर हैकिसे पता हैये वक़्त क्या है
दिल से फिर होगी मिरी बात कि ऐ दिल ऐ दिलये जो महबूब बना है तिरी तन्हाई काये तो मेहमाँ है घड़ी-भर का चला जाएगाउस से कब तेरी मुसीबत का मुदावा होगा
तुम मिरे पास रहोमिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहोजिस घड़ी रात चले,आसमानों का लहू पी के सियह रात चलेमरहम-ए-मुश्क लिए, नश्तर-ए-अल्मास लिएबैन करती हुई हँसती हुई, गाती निकलेदर्द के कासनी पाज़ेब बजाती निकलेजिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिलआस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगेआस लिएऔर बच्चों के बिलकने की तरह क़ुलक़ुल-ए-मयबहर-ए-ना-सूदगी मचले तो मनाए न मनेजब कोई बात बनाए न बनेजब न कोई बात चलेजिस घड़ी रात चलेजिस घड़ी मातमी सुनसान सियह रात चलेपास रहोमिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहो
ये खेप भरे जो जाता है ये खेप मियाँ मत गिन अपनीअब कोई घड़ी पल सा'अत में ये खेप बदन की है कफ़नीक्या थाल कटोरी चाँदी की क्या पीतल की ढिबिया-ढकनीक्या बर्तन सोने चाँदी के क्या मिट्टी की हंडिया चीनीसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चले गा बंजारा
जिब्रईलहम-दम-ए-दैरीना कैसा है जहान-ए-रंग-ओ-बूइबलीससोज़-ओ-साज़ ओ दर्द ओ दाग़ ओ जुस्तुजू ओ आरज़ूजिब्रईलहर घड़ी अफ़्लाक पर रहती है तेरी गुफ़्तुगूक्या नहीं मुमकिन कि तेरा चाक दामन हो रफ़ूइबलीसआह ऐ जिबरील तू वाक़िफ़ नहीं इस राज़ सेकर गया सरमस्त मुझ को टूट कर मेरा सुबूअब यहाँ मेरी गुज़र मुमकिन नहीं मुमकिन नहींकिस क़दर ख़ामोश है ये आलम-ए-बे-काख़-ओ-कूजिस की नौमीदी से हो सोज़-ए-दरून-ए-काएनातउस के हक़ में तक़्नतू अच्छा है या ला-तक़्नतूजिब्रईलखो दिए इंकार से तू ने मक़ामात-ए-बुलंदचश्म-ए-यज़्दाँ में फ़रिश्तों की रही क्या आबरूइबलीसहै मिरी जुरअत से मुश्त-ए-ख़ाक में ज़ौक़-ए-नुमूमेरे फ़ित्ने जामा-ए-अक़्ल-ओ-ख़िरद का तार-ओ-पूदेखता है तू फ़क़त साहिल से रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शरकौन तूफ़ाँ के तमांचे खा रहा है मैं कि तूख़िज़्र भी बे-दस्त-ओ-पा इल्यास भी बे-दस्त-ओ-पामेरे तूफ़ाँ यम-ब-यम दरिया-ब-दरिया जू-ब-जूगर कभी ख़ल्वत मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह सेक़िस्सा-ए-आदम को रंगीं कर गया किस का लहूमैं खटकता हूँ दिल-ए-यज़्दाँ में काँटे की तरहतू फ़क़त अल्लाह-हू अल्लाह-हू अल्लाह-हू
दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ायाहै 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखायामैं दाग़ के आँगन में खिली बन के चमेली
गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबाफिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दोउम्र-ए-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्दफिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दोजैसे बेगाने से अब मिलते हो वैसे ही सहीआओ दो चार घड़ी मेरे मुक़ाबिल बैठोगरचे मिल-बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बा'दअपना एहसास-ए-ज़ियाँ और ज़ियादा होगाहम-सुख़न होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीचअन-कही बात का मौहूम सा पर्दा होगाकोई इक़रार न मैं याद दिलाऊँगा न तुमकोई मज़मून वफ़ा का न जफ़ा का होगागर्द-ए-अय्याम की तहरीर को धोने के लिएतुम से गोया हों दम-ए-दीद जो मेरी पलकेंतुम जो चाहो तो सुनो और जो न चाहो न सुनोऔर जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखेंतुम जो चाहो तो कहो और जो न चाहो न कहो
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