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नज़्म
यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुम्हारे दिल के इस दुनिया से कैसे सिलसिले होंगे
तुम्हें कैसे गुमाँ होंगे तुम्हें कैसे गिले होंगे
जौन एलिया
नज़्म
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबी
उफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हुज़ूर मुस्कुरा रहे हैं मेरी बात बात पर
हुज़ूर को न जाने क्या गुमाँ है मेरी ज़ात पर
अहमद फ़राज़
नज़्म
कुछ रोज़ का मुसाफ़िर-ओ-मेहमाँ हूँ और क्या
क्यूँ बद-गुमाँ हों यूसुफ़-ए-कनआ'न-ए-लखनऊ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
आँख लगती है तो दिल को ये गुमाँ होता है
सर-ए-बालीं कोई बैठा है बड़े प्यार के साथ
हिमायत अली शाएर
नज़्म
ऐ ख़ाक-ए-हिंद तेरी अज़्मत में क्या गुमाँ है
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-क़ुदरत तेरे लिए रवाँ है