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नज़्म
जो ख़ुश हैं वो ख़ुशी में काटे हैं रात सारी
जो ग़म में हैं उन्हों पर गुज़रे है रात भारी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सरवत हुसैन
नज़्म
मिरे दादा जो ब्रिटिश फ़ौज के नामी भगोड़े थे
न जाने कितनी जेलों के उन्हों ने क़ुफ़्ल तोड़े थे
नश्तर अमरोहवी
नज़्म
उन्हें भी इक जंग आ पड़ी थी
उन्हों ने सोला दिनों में वो कर दिया जो सदियों में भी न होता
अदीम हाशमी
नज़्म
मुल्क में खोला उन्हों ने जंग-ए-आज़ादी का बाब
सामराजी ज़ुल्म जिस से हो गया फिर बे-नक़ाब