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नज़्म
सब्र वाले छा रहे हैं जब्र की अक़्लीम पर
हो गया फ़र्सूदा शमशीर-ओ-सिनाँ का इंक़लाब
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
जो सदा हुस्न की अक़्लीम में मुम्ताज़ रहे
दिल के आईने में उतरी है वो तस्वीर अब के
साहिर लुधियानवी
नज़्म
अजम, वो मर्ज़-ए-तिलिस्म-ओ-रंग-ओ-ख़्याल-ओ-नग़मा
अरब, वो इक़लीम-ए-शीर-ओ-शहद-ओ-शराब-ओ-खुर्मा
नून मीम राशिद
नज़्म
क़दमों पे जिन के ताज हैं इक़्लीम-ए-दहर के
उन चंद कुश्तगान-ए-ग़म-ए-दिल में हम भी हों
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वसूल होते हैं पहले ये नामा-ओ-पैग़ाम
कि ऐ शहंशह-ए-अक़्लीम-ए-'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम'
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
संग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न था
इक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न था