aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ixA8"
उस ने कहासुनअहद निभाने की ख़ातिर मत आनाअहद निभाने वाले अक्सरमजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैंतुम जाओऔर दरिया दरिया प्यास बुझाओजिन आँखों में डूबोजिस दिल में उतरोमेरी तलब आवाज़ न देगीलेकिन जब मेरी चाहतऔर मिरी ख़्वाहिश की लौइतनी तेज़ और इतनीऊँची हो जाएजब दिल रो देतब लौट आना
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियाजब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दियातुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों मेंनंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों मेंये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों मेंऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियामर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़तामर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ामर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिताऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियाजिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार कियाजिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार कियाजिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार कियासंसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती हैचकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती हैमर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती हैऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियाऔरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी हैअवतार पयम्बर जन्नती है फिर भी शैतान की बेटी हैये वो बद-क़िस्मत माँ है जो बेटों की सेज पे लेटी हैऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों सेबड़ी हसरत से तकती हैंमहीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतींजो शामें उन की सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सरगुज़र जाती हैं कम्पयूटर के पर्दों परबड़ी बेचैन रहती हैं किताबेंउन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई हैबड़ी हसरत से तकती हैंजो क़द्रें वो सुनाती थींकि जिन के सेल कभी मरते नहीं थेवो क़द्रें अब नज़र आती नहीं घर मेंजो रिश्ते वो सुनाती थींवो सारे उधड़े उधड़े हैं
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमकभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम सेतो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझनाकि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारीहैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारीजो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँसजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारीनज़र से ज़माने की ख़ुद को बचानाकिसी और से देखो दिल मत लगानाकि मेरी अमानत हो तुमबहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराऔर इस पर ये काली घटाओं का पहरागुलाबों से नाज़ुक महकता बदन हैये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन हैबिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादलफ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागलवो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमजो बन के कली मुस्कुराती है अक्सरशब-ए-हिज्र में जो रुलाती है अक्सरजो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल देजो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल केछुपाना जो चाहें छुपाई न जाएभुलाना जो चाहें भुलाई न जाएवो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
कुछ लोग तुम्हें समझाएँगेवो तुम को ख़ौफ़ दिलाएँगेजो है वो भी खो सकता हैइस राह में रहज़न हैं इतनेकुछ और यहाँ हो सकता हैकुछ और तो अक्सर होता हैपर तुम जिस लम्हे में ज़िंदा होये लम्हा तुम से ज़िंदा हैये वक़्त नहीं फिर आएगातुम अपनी करनी कर गुज़रोजो होगा देखा जाएगा
उन हसीनाओं के नामजिन की आँखों के गुलचिलमनों और दरीचों की बेलों पे बे-कार खिल खिल केमुरझा गए हैंउन बियाहताओं के नामजिन के बदनबे मोहब्बत रिया-कार सेजों पे सज सज के उक्ता गए हैंबेवाओं के नामकटड़ियों और गलियों मोहल्लों के नामजिन की नापाक ख़ाशाक से चाँद रातोंको आ आ के करता है अक्सर वज़ूजिन के सायों में करती है आह-ओ-बुकाआँचलों की हिनाचूड़ियों की खनककाकुलों की महकआरज़ू-मंद सीनों की अपने पसीने में जुल्ने की बू
मैं अब जिस घर में रहता हूँबहुत ही ख़ूबसूरत हैमगर अक्सर यहाँ ख़ामोश बैठा याद करता हूँवो कमरा बात करता था
मिरी बस्ती से परे भी मिरे दुश्मन होंगेपर यहाँ कब कोई अग़्यार का लश्कर उतराआश्ना हाथ ही अक्सर मिरी जानिब लपकेमेरे सीने में सदा अपना ही ख़ंजर उतरा
ज़बाँ पर हैं अभी इस्मत ओ तक़्दीस के नग़्मेवो बढ़ जाती है इस दुनिया से अक्सर इस क़दर आगेमिरे तख़्ईल के बाज़ू भी उस को छू नहीं सकतेमुझे हैरान कर देती हैं नुक्ता-दानियाँ उस की
मुझ को भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहेअक्सर तुझ को देखा है कि ताना बुनतेजब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआफिर से बाँध केऔर सिरा कोई जोड़ के उस मेंआगे बुनने लगते होतेरे इस ताने में लेकिनइक भी गाँठ गिरह बुन्तर कीदेख नहीं सकता है कोई
और यूँ कहीं भी रंज-ओ-बला से मफ़र नहींक्या होगा दो घड़ी में किसी को ख़बर नहींअक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बाँहै दिन की धूप रात की शबनम उन्हें गिराँलेकिन जो रंग बाग़ बदलता है ना-गहाँवो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं राएगाँरखते हैं जो 'अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरहमिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरहलेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बे-शुमारमौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उन की नहीं बहारदेखो ये क़ुदरत-ए-चमन-आरा-ए-रोज़गारवो अब्र-ओ-बाद ओ बर्फ़ में रहते हैं बरक़रारहोता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम कामौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम काअपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ परसहरा चमन बनेगा वो है मेहरबाँ अगरजंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़ररहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बरउस का करम शरीक अगर है तो ग़म नहींदामान-ए-दश्त दामन-ए-मादर से कम नहीं
मैं सोचता हूँ इक नज़्म लिखूँलेकिन इस में क्या बात कहूँइक बात में भी सौ बातें हैंकहीं जीतें हैं कहीं मातें हैंदिल कहता है मैं सुनता हूँमन-माने फूल यूँ चुनता हूँजब मात हो मुझ को चुप न रहूँऔर जीत जो हो दर्राना कहूँपल के पल में इक नज़्म लिखूँलेकिन इस में क्या बात कहूँजब यूँ उलझन बढ़ जाती हैतब ध्यान की देवी आती हैअक्सर तो वो चुप ही रहती हैकहती है तो इतना कहती हैक्यूँ सोचते हो इक नज़्म लिखोक्यूँ अपने दिल की बात कहोबेहतर तो यही है चुप ही रहो
माँ अक्सर मेरी खाँसी पर तुम्हारा धोखा खाती हैये बड़ की मेरी इक आदत तुम्हारी सी बताती हैतुम्हारी याद आती है
अक्सर ऐसा हुआशहर-दर-शहरऔर बस्ती बस्तीकिसी भी दरीचे मेंकोई चराग़-ए-मोहब्बत न थाबे-रुख़ी से भरीसारी गलियों मेंसारे मकानों केदरवाज़े यूँ बंद थेजैसे इक सर्दख़ामोश लहजे मेंवो कह रहे होंमुरव्वत का और मेहरबानी का मस्कनकहीं और होगायहाँ तो नहीं हैयही एक मंज़र समेटे थेशहरों के पथरीले सब रास्तेजाने किस वास्तेआरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
सामने ताक़ पे रक्खी हुई दो तस्वीरेंअक्सर औक़ात मुझे प्यार से यूँ तकती हैंजैसे मैं दूर किसी देस का शहज़ादा हूँमेरा कमरा मिरे माज़ी का हक़ीक़ी मूनिसआज हर फ़िक्र हर एहसास से बेगाना हैअपने हमराज़ किवाड़ों के अहाते के एवज़आज मैं जैसे मज़ारों पे चला आया हूँगर्द-आलूदा कैलेंडर पे अजंता के नुक़ूशमेरे चेहरे की लकीरों की तरफ़ देखते हैंजैसे इक लाश की फैली हुई बे-बस आँखेंअपने मजबूर अज़ीज़ों को तका करती हैं
गिर कर किसी के कपड़े दलदल में हैं मोअ'त्तरफिसला कोई किसी का कीचड़ में मुँह गया भरइक दो नहीं फिसलते कुछ इस में आन अक्सरहोते हैं सैकड़ों के सर नीचे पाँव ऊपरक्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
होंट तबस्सुम के आदी हैं वर्ना रूह में ज़हर-आगींघुपे हुए हैं इतने नश्तर जिन की कोई तादाद नहींकितनी बार हुई है हम पर तंग ये फैली हुई ज़मींजिस पर नाज़ है हम को इतना झुकी है अक्सर वही जबींकभी कोई सिफ़्ला है आक़ा कभी कोई अब्ला फ़र्ज़ींबेची लाज भी अपने हुनर की इस आबाद ख़राबे मेंदेखो हम ने कैसे बसर की आबाद ख़राबे में
लम्बे वक़्त से सोच रहा हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंमिलने से घबराता हूँ मैं झूट नहीं कह पाता हूँउस के शिकवे उस की शिकायत झगड़े से डर जाता हूँइधर-उधर की बातें मुझ को ज़रा न ख़ुश कर पाती हैंजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंदोस्त नहीं बन पाते मेरेरिश्ते नहीं सँभलते हैंबेजा मोहब्बत बेजा तकल्लुफ़दोनों ओछे लगते हैंऔरों की कमियों को बिल्कुलअच्छा नहीं कह पाता हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंअच्छे भले कामों में अक्सरदेर बहुत कर देता हूँअम्मी से बातें करनी हूँ बेटी के स्कूल हो जानाकोई नया नॉवेल पढ़ना हो कोई कहानी लिखनी होसब को टालता रहता हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंभीड़ भरे शहरों से मुझ कोवहशत सी हो जाती हैगाँव जंगल सुनसान जगहेंअक्सर ख़ुश आ जाती हैंकोई अल्हड़ चेहरा देखूँ मन को वो भा जाता हैजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंपेड़ों के पैराहन देखूँ फूलों की ख़ुश्बू को सूंघूँरंग-बिरंगी तितलियाँ पकड़ूँ हल्की हल्की बूँदें भीठंडी नरम हवाएँ जब जब चुपके से छू जाती हैंया कोयल की बोली सुन लूँ मन ब्याकुल हो जाता हैजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंनट बंजारन सन्यासी और खेल-तमाशे वाले लोगखंडर वीराना जलती धूप फूली सरसों धान के खेतलाल पतंग और पीली मैना इन्द्र-धनुष और नदी की धारआते हैं जब ख़्वाब में मेरे दीवाना हो जाता हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंबहुत मुझे अच्छा कहते हैं बुरा भी कोई कहता हैसामने मेरी मदह-सराई पीछे गाली देता हैहमदर्दी है कोई दिखाता कोई साज़िश करता हैफिर भी चुप चुप सा रहता हूँ जैसे बहुत अंजान हूँ मैंजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंथोड़ी सी आज़ादी मुझ को थोड़ा बहुत वक़्त का ज़ियाँकभी कभार की अच्छी बातें किसी किसी का सच्चा प्यारछोटी-मोटी कोई शरारत खिलखिला कर हँसना भीये सब ख़ुश कर जाते हैं जब तोलगता है कि ज़िंदा हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैं
जानतुम को ख़बर तक नहींलोग अक्सर बुरा मानते हैंकि मेरी कहानी किसी मोड़ पर भीअँधेरी गली से गुज़रती नहींकि तुम ने शुआ'ओं से हर रंग ले करमिरे हर निशान-ए-क़दम को धनक सौंप दीन गुम-गश्ता ख़्वाबों की परछाइयाँ हैंन बे-आस लम्हों की सरगोशियाँ हैंकि नाज़ुक हरी बेल कोइक तवाना शजर अन-गिनत अपने हाथों मेंथामे हुए हैकोई ना-रसाई का आसेब उस रहगुज़र में नहींये कैसा सफ़र है कि रूदाद जिस कीग़ुबार-ए-सफ़र में नहीं
चंद बद-ज़ेब से शोहरत-ज़दा इंसाँ अक्सरअपनी दौलत ओ सख़ावत की नुमाइश के लिएया कभी रहम के जज़्बे से हरारत पा करचार छे पैसे उन्हें बख़्श दिया करते हैं
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