aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "jaahil"
मगर नाज़िर हमारा सोख़्ता-सुल्ब आख़िरी नस्साब अब मरने ही वाला हैबस इक पल हफ़ सदी का फ़ैसला करने ही वाला हैसुनो 'ज़रयून' बस तुम ही सुनो यानी फ़क़त तुम हीवही राहत में है जो आम से होने को अपना लेकभी कोई भी पर हो कोई 'बहमन' यार या 'ज़ेनू'तुम्हें बहका न पाए और बैरूनी न कर डालेमैं सारी ज़िंदगी के दुख भुगत कर तुम से कहता हूँबहुत दुख देगी तुम में फ़िक्र और फ़न की नुमू मुझ कोतुम्हारे वास्ते बेहद सहूलत चाहता हूँ मैंदवाम-ए-जहल ओ हाल-ए-इस्तिराहत चाहता हूँ मैंन देखो काश तुम वो ख़्वाब जो देखा किया हूँ मैंवो सारे ख़्वाब थे क़स्साब जो देखा किया हूँ मैंख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरोमिरे जहमीम-ए-ज़ात-ए-ज़ात से तुम दूर ही ठहरोकोई 'ज़रयून' कोई भी क्लर्क और कोई कारिंदाकोई भी बैंक का अफ़सर सेनेटर कोई पावंदाहर इक हैवान-ए-सरकारी को टट्टू जानता हूँ मैंसो ज़ाहिर है इसे शय से ज़ियादा मानता हूँ मैंतुम्हें हो सुब्ह-दम तौफ़ीक़ बस अख़बार पढ़ने कीतुम्हें ऐ काश बीमारी न हो दीवार पढ़ने कीअजब है 'सार्त्र' और 'रसेल' भी अख़बार पढ़ते थेवो मालूमात के मैदान के शौक़ीन बूढ़े थेनहीं मालूम मुझ को आम शहरी कैसे होते हैंवो कैसे अपना बंजर नाम बंजर-पन में बोते हैंमैं ''उर्र'' से आज तक इक आम शहरी हो नहीं पायाइसी बाइस मैं हूँ अम्बोह की लज़्ज़त से बे-मायामगर तुम इक दो-पाया रास्त क़ामत हो के दिखलानासुनो राय-दहिंदा बिन हुए तुम बाज़ मत आनाफ़क़त 'ज़रयून' हो तुम यानी अपना साबिक़ा छोड़ोफ़क़त 'ज़रयून' हो तुम यानी अपना लाहिक़ा छोड़ोमगर मैं कौन जो चाहूँ तुम्हारे बाब में कुछ भीभला क्यूँ हो मिरे एहसास के अस्बाब में कुछ भीतुम्हारा बाप यानी मैं अबस मैं इक अबस-तर मैंमगर मैं यानी जाने कौन अच्छा मैं सरासर मैंमैं कासा-बाज़ ओ कीना-साज़ ओ कासा-तन हूँ कुत्ता हूँमैं इक नंगीन-ए-बूदश हूँ प तुम तो सिर्र-ए-मुनअम होतुम्हारा बाप रूहुल-क़ुद्स था तुम इब्न-ए-मरयम हो
तुम बिल्कुल हम जैसे निकलेअब तक कहाँ छुपे थे भाईवो मूरखता वो घामड़-पनजिस में हम ने सदी गँवाईआख़िर पहुँची द्वार तुहारेअरे बधाई बहुत बधाईप्रेत धर्म का नाच रहा हैक़ाएम हिन्दू राज करोगेसारे उल्टे काज करोगेअपना चमन ताराज करोगेतुम भी बैठे करोगे सोचापूरी है वैसी तय्यारीकौन है हिन्दू कौन नहीं हैतुम भी करोगे फ़तवा जारीहोगा कठिन यहाँ भी जीनादाँतों आ जाएगा पसीनाजैसी-तैसी कटा करेगीयहाँ भी सब की साँस घुटेगीभाड़ में जाए शिक्षा-विक्षाअब जाहिल-पन के गन गानाआगे गढ़ा है ये मत देखोवापस लाओ गया ज़मानामश्क़ करो तुम आ जाएगाउल्टे पाँव चलते जानाध्यान न दूजा मन में आएबस पीछे ही नज़र जमानाएक जाप सा करते जाओबारम-बार यही दोहराओकैसा वीर महान था भारतकितना 'आली-शान था भारतफिर तुम लोग पहुँच जाओगेबस परलोक पहुँच जाओगेहम तो हैं पहले से वहाँ परतुम भी समय निकालते रहनाअब जिस नर्क में जाओ वहाँ सेचिट्ठी-विट्ठी डालते रहना
कितनी मोहब्बतों से पहला सबक़ पढ़ायामैं कुछ न जानता था सब कुछ मुझे सिखायाअन-पढ़ था और जाहिल क़ाबिल मुझे बनायादुनिया-ए-इल्म-ओ-दानिश का रास्ता दिखाया
पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर'पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर'चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीररोए भगत कबीरइक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवानमेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समानसब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीररोए भगत कबीरसड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ारएक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कारफ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीररोए भगत कबीरलाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लालशहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का मालऔर कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीररोए भगत कबीरजिस को देखो लीडर है और से मिलो वकीलकिसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झीलमजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीररोए भगत कबीरमहफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोरअपनी मस्जिद की तारीफ़ें बाक़ी जूते-चोरअपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीररोए भगत कबीर
उस की ख़्वाहिश का इज़हारमासूम हद तक रिवायत की बंदिश में उलझा हुआ थाकि मैं उस के हाथों पे मेहंदी लगाऊँमगर शायरी एक देवी है जिस की जलन कोकभी लिखने वालों के हाथों पे इतना तरस ही नहीं आ सका हैकि बाग़ी दिमाग़ों में भी आम रस्तों की तक़लीद भरतीया हाथों की जुम्बिश ख़िरद के तसल्लुत से आज़ाद करतीमिरे हाथ भी ज़ेहन में घूमते कुछ सवालों के साँचे बनाने लगेउस के हाथों पे मेहंदी से एटम के मॉडल बनाने लगेऔर मॉडल भी ऐसे जो मतरूक थेजिस में ज़र्रा बहुत दूर से घूमता झूमता दायरा दायरारफ़्ता रफ़्ता किसी मरकज़े की तरफ़ गामज़नबस तसलसुल से बढ़ती हुई इक कशिश के असर में रहेइक यक़ीनी फ़ना के सफ़र में रहेसाल-हा-साल चीज़ें बदलती गईंवक़्त ने दर्द के जो भी लिरिक्स् लिखे उन को गाना पड़ाजाने कैसे मगरउस को जाना पड़ामैं ने वैसे तो ये उम्र भर सोचना ही नहीं थामगर शायरी एक देवी जलननासटॉलजिक ज़मानों की तस्वीर लॉजिक् के कुछ मसअलेपूछने लग गए हैंभला ऐसा जाहिल कहाँ पर मिलेगाकि जो कीमिया पढ़ के भीइक त'अल्लुक़ में पहले तो ज़र्रा बनेऔर निभाते हुएडाइˈनैमिक्स् के वो ही मतरूक मॉडल चुनेऔर तसलसुल से बढ़ती हुई इक कशिश के असर में रहेइक यक़ीनी फ़ना के सफ़र में रहे
सामने तो है मगर तेरा मुनव्वर चेहराउसी जाहिल को नज़र आता हैजो ये कहता है कि तैमूर की फ़ौजें जिस वक़्तअपने दुश्मन पे बढ़ा करती थींऔरतें पीछे रहा करती थींऔर जो आलिम थे जो फ़ाज़िल थे वो ये सोचते थेहार किस शख़्स की है जीत है किस की छोड़ोहम भी किन छोटी सी बातों में उलझ बैठे हैंचलते चलते मुझे तेज़ी से ख़याल आया हैतेरा ये जूड़ा जो खुल जाए बिखर जाए तो फिर क्या होगामेरी तारीख़ कि तेरी तारीख़फैल कर आज पे (और कल पे भी) छा जाएगीसोचने वाले को इक पल में बता जाएगीऔरतें पीछे अगर हों भी तो आगे ही रहा करती हैंऔर फ़लातूँ का चचा हाथ में तलवार लिए आगे बढ़ा करता हैलो वो जूड़ा भी फ़लातूँ ही से कुछ कहने लगाऔर रस्ते में उसे कौन मिलेगा तैमूरऔर वो उस से कहेगा कि यहाँ क्यूँ आईजा मिरे पीछे चली जा कि तिरे पीछे हमेशा हर-दमइल्म यूँ रेंगते ही रेंगते बढ़ता जाएजैसे हर बात के पीछे हर बातरेंगते रेंगते बढ़ती ही चली जाती हैऔर हर एक फ़लातूँ जो शरर बन के चमकता है वो मिट जाता है
सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई जो की थी लड़ाई तो मैं क्या करूँजो कौरव ने पांडव से की हाथा-पाई जो की हाथा-पाई तो मैं क्या करूँजो पी यू टी पुट है तो बी यू टी बट है ज़माने का दस्तूर कितना उलट हैपढ़ाते हैं सब मुझ को उल्टी पढ़ाई है उल्टी पढ़ाई तो मैं क्या करूँहै जाहिल घसीटा मगर खाए हलवा ये हर रोज़ लूटे मिठाई का जल्वाये दूध में पानी मिलाता है भाई न आए मलाई तो मैं क्या करूँये बी-ए है लेकिन चलाए ये ठेला ये एम-ए है लेकिन ये बेचे करैलाअगर तीन दिन से ये भूका है भाई जो भूका है भाई तो मैं क्या करूँये सूरज जो शाम-ओ-सहर घूमता है इसे घूमने दो अगर घूमता हैज़मीं गोल अगर है तो होने दो भाई जो चिपटी है भाई तो मैं क्या करूँ
आओ बच्चो तुम को बताएँआँखों देखा हाल सुनाएँहम ने इस दुनिया में रह करकैसा कैसा देखा मंज़रगर्मी देखी सर्दी देखीतेज़ी देखी नर्मी देखीबादल देखा पानी देखादरिया की तुग़्यानी देखाकेला देखा आम भी देखापिस्ता और बादाम भी देखारंग बिरंगे फूल भी देखेहरे गुलाबी नीले पीलेउम्र की सुब्ह शाम भी देखातकलीफ़-ओ-आराम भी देखामज़दूरों की मेहनत देखीउन की क़द्र-ओ-क़ीमत देखीबे-कारों का रोना देखावक़्त को अपने खोना देखाऔर न पूछो क्या क्या देखाचलता फिरता पैसा देखापैसा है इक ऐसी ताक़तजिस में है दुनिया की अज़्मतजाहिल को भी आक़िल को भीनाक़िस को भी कामिल को भीपैसे का दम भरते देखाझूट को भी सच करते देखालेकिन दौलत से भी बढ़ करहम ने देखा है वो गौहरपैसे पर भी राज है जिस कापैसा भी मुहताज है जिस काजिस की है दुनिया भी साइलजिस का है पैसा भी क़ाइलजिस ने सब को शाद किया हैपैसे को ईजाद किया हैजिस की बदौलत आगे बढ़ करआदमी पहुँचा चाँद के ऊपरउस गौहर का नाम है प्याराउस का सारा काम है प्याराइल्म उसे कहते हैं जहाँ मेंअज़्मत जिस की कौन-ओ-मकाँ मेंइल्म है दुनिया की सच्चाईदूर हुई है इस से बुराई
हर दम इल्म सिखाती हैअक़्ल के राज़ बताती हैप्यारा नाम किताब है उस कामा'लूमात बढ़ाती हैकोई बच्चा हो या बूढ़ासब को यकसाँ भाती हैदादा अब्बा मोल अगर लेंपोते के काम आती हैघर बैठे ही दुनिया भर कीहम को सैर कराती हैअगले वक़्तों के लोगों कासारा हाल सुनाती हैइस की दानाई तो देखोजो पूछो समझाती हैजाहिल से जाहिल को आख़िरक़ाबिल शख़्स बनाती हैहर दफ़्तर के हर अफ़सर कोये परवान चढ़ाती हैदिल की आँखें रौशन करकेहक़ की राह दिखाती हैपढ़ने वाले ख़ुश होते हैंउन का रंज मिटाती हैतन्हाई में हमदम बन कर'फ़ैज़' हमें पहुँचाती है
मुल्क का ग़म है न हम को मिल्लत-ए-बैज़ा का ग़म''बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ऐ-मातम-ख़ाना हम''गरचे जाहिल हूँ पर इतना जानता हूँ कम से कमसारी दुनिया में अगर कुछ है तो इंसाँ का शिकमऐ शिकम मेरे तन-ए-फ़ानी के सद्र-ए-अंजुमन''तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन''
बताऊँ खाया है क्या मैं ने आज दो थप्पड़दुरुस्त कर के गए हैं मिज़ाज दो थप्पड़हकीम नब्ज़ मिरी देख कर ये कहने लगातिरे मरज़ का है असली इलाज दो थप्पड़ये गाल गोरे थे जो आज लाल लाल हुएकि इन पे कर गए हल्का मसाज दो थप्पड़वो मेरा भाई है उस पर भी ध्यान दो अम्मीमैं खाऊँ चार तो खाए सिराज दो थप्पड़न नाश्ता करे खाए न लंच और डिनरबजाए खाने के खाई है ताज दो थप्पड़तमाम दिन नहीं कुछ काम पीटने के सिवाहमारी अम्मी का है काम काज दो थप्पड़हमारी अस्ल ख़ताएँ तो वो बता न सकींपर आपा दे के गईं हम को ब्याज दो थप्पड़बहुत ही हम तो हैं बे-शर्म हाँ मगर अक्सरहमारे चेहरे पे लाए हैं लाज दो थप्पड़ये डर है मैं जो बड़ा हो के भी रहा जाहिलन मार दे मेरे मुँह पर समाज दो थप्पड़
वो बशर जो पढ़ के भी कहता हो यूँबन के तालिब और कुछ हासिल करूँकोई शक उस की फ़ज़ीलत में नहींउस का रुत्बा है फ़रिश्तों से फ़ुज़ूँवो बशर कुछ भी न आता हो जिसेलेकिन उस को शौक़ हो आलिम बनूँअपनी बे-इल्मी का उस को इल्म हैना-मुनासिब है उसे जाहिल गिनूँवो बशर जो हो निरा अहमक़ मगरख़ुद समझता हो कि दानिश-मंद हूँमौत है उस की हिमाक़त का इलाजवो रहेगा उम्र भर ख़्वार-ओ-ज़बूँहर बशर ऐ 'फ़ैज़' ये कोशिश करेजिस तरह भी हो जहालत से बचूँ
पूरे कुँबे से नफ़रत या प्यार करोएक से नफ़रत एक से प्यार ये क्या हैलोग सभी इक जैसे हैंजाहिल हैं तो सब जाहिल हैं आलिम हैं तो सब के सबज़ुल्म किसी इक शख़्स से तो मख़्सूस नहीं हैजिस को तुम ज़ालिम कहते हो वो भीबचपन में मा'सूम था ख़ुश्बू की मानिंद ज़रर से ख़ालीऔर जिस को विद्वान हो कहते उस का ज़ेहनकल तक चट्टे काग़ज़ जैसा निर्मल और बे-दाग़ थाज़ालिम ने उस कुँबे ही में ज़ुल्म की शिक्षा पाईऔर विद्वान ने भी ये उल्टी सीधी बातेंलोगों ही से सुन कर ज़ेहन में भर रखी हैंये लोगों का कुम्बाएक महान दरख़्त है हम सब पत्ते हैंहरे या सूखे मीठे हैं या कड़वेअपना क्या हैपेड़ का रस हम सब में यकसाँ जारी-ओ-सारी है
कभी जब लफ़्ज़-ए-आज़ादी का सच्चा तर्जुमाँ होगातो फिर ये हिन्द ख़्वाबों का मिरे हिन्दोस्ताँ होगाउभर आएगा ख़ुद्दारी का जज़्बा मुल्क वालों काफ़क़त ईसार होगा मुद्दआ इन ख़ुश-ख़यालों कान होगी चोर-बाज़ारी न अय्यारी न मक्कारीन ये बाक़ी रहेगी रिश्वतों की गर्म-बाज़ारीहुकूमत का जो ढाँचा है बदल जाएगा ये यकसरकि इख़राजात हैं जो आज-कल हो जाएँगे कमतरहुकूमत में सभी अहल-ए-हुनर के क़द्र-दाँ होंगेजो जाहिल हैं वसाइल से न अपने कामराँ होंगेन इतने टैक्स ही होंगे कि जिन से जान हो दूभरख़ुशी से टैक्स सब देंगे बचेगा इस क़द्र खा करमिरे हिन्दोस्ताँ के खेत जब देखो हरे होंगेअनाज इतना मिरे खलियान ग़ल्ले से भरे होंगेमवेशी इस क़दर होंगे बहेंगी दूध की नहरेंमसर्रत के समुंदर में उठेंगी हर तरफ़ लहरेंमशीनों के लिए मुहताज होंगे हम न ग़ैरों केज़रूरत का हर इक सामाँ बनेगा मुल्क में अपनेसुहूलत बर्क़-ओ-टेलीफ़ोन की होगी देहातों मेंसड़क हर गाँव तक बन जाएगी पक्की देहातों मेंनिकल आएँगे काफ़ी इस ज़मीं से तेल के चश्मेन हम मुहताज सोने के रहेंगे और न लोहे केन कोई बे-पढ़ा-लिखा न कोई बे-हुनर होगान औरों के लिए बे-कार कोई दर्द-ए-सर होगाहमारे मुल्क को इक मरकज़-ए-ता'लीम पाएँगेयहाँ ता'लीम लेने दूसरे मुल्कों से आएँगेजो बूढ़े होंगे और मोहताज उन्हें सरकार पालेगीयतीमों और बेवाओं को सीने से लगा लेगीहुकूमत और पब्लिक के भले किरदार अगर होंगेतो मौसम और दरिया भी रहेंगे ठीक ही अपनेहमारे दम का लोहा अहल-ए-क़ुव्वत मान जाएँगेजो हैं कमज़ोर हर सूरत में हामी हम को पाएँगेग़रज़ ये है वो ख़्वाबों का मिरे हिन्दोस्ताँ होगान इक चेहरे पे जिस में फ़िक्र-ओ-वहशत का निशाँ होगान होगी भूक की ला'नत न बेकारी न बीमारीन होगी बे-ईमानी और न अय्यारी न ग़द्दारीशुजाअ'त और जवाँ-मर्दी का पुतला होगा हर इंसाँमोहब्बत और ख़िदमत होगा हर इंसान का ईमाँ'शिफ़ा' मुमकिन है ऐसे दिन न मेरी ज़ीस्त में आएँमैं वो पौदा लगाऊँगा कि नस्लें जिस का फल खाएँ
हाथी कान गला है जिस काअस्तर उधड़ा दामन खिसकाआख़िर तुम क्या दोगे उस काइतने कम सिलवाई दे दोपाँच नहीं तो ढाई दे दोफ़ी सिलवट नौ पाई दे दोये लो घुंडी कैसे वालाआगे पीछे गड़बड़-झालाजाहिल है ना हिन्दी कालाबुढ्ढा तू क्या सोच रहा हैमोंछों को क्यूँ नोच रहा हैशायद जाड़ा कूच रहा हैआ सर्दी से पिंड कटा लेकोई ऊनी कोट चुका लेउस दिन को भगवान उठा लेजिस दिन ये पहनावा छोड़ूँजन्म के साथी से मुँह मोड़ूँना-समझों से क्या सर फोड़ूँरस्सी जिस तहज़ीब की ढीलीबोतल हो जिस चाक में गीलीसब जलती है सूखी गीलीये जिस की भी उतरन होगीया भंगन या कंचन होगीबेवा बाँझ गृहस्तन होगीजर्मन औरत का हर दामनजब झटका खाए का कुंदनबिलकेंगे बे-गिनती जीवनमेरी ये खद्दर की पिंडीऊन से ऊँची रूई की मंडीउन कोटों को काली झंडी
गुफ़्तुगू कितनी भी मजहूल हो माथा हमवारकान बेदार रहें आँखें निहायत गहरीसोच में डूबी हुईफ़लसफ़ी ऐसे किताबी या ज़बानी मानोउस से पहले कभी इंसान ने देखे ने सुनेउन को बतला दो यही बात वगर्ना इक दिनओ रूह दिन भी बहुत दूर नहींतुम नहीं आओगे ये लोग कहेंगे जाहिलबात करने का सलीक़ा ही नहीं जानता हैक्या तुम्हें ख़ौफ़ नहीं आता है
जलाओ इल्म-ओ-मोहब्बत की वो हसीं शमएँन कोई दुश्मनी रक्खे न कोई जाहिल हो
वो तुलसीदास जिस ने इल्म का दरिया बहाया थावो तुलसीदास जिस ने ग़ैर को अपना बनाया थावो तुलसीदास जो दुनिया में सूरज बन के छाया थावो तुलसीदास जो ग़म-ख़्वारियों में मुस्कुराया थाख़ुलूस-ए-दिल से मैं उस को अक़ीदत पेश करता हूँमिरे पेश-ए-नज़र अब तक मिज़ाज-ए-हुक्मरानी हैबहुत उलझी हुई उस दौर-ए-माज़ी की कहानी हैमगर तुलसी की अज़्मत दोस्त दुश्मन सब ने मानी हैवो रामायण का लिखना शाहकार-ए-ज़िंदगानी हैमैं उस इंसान-ए-कामिल को मोहब्बत पेश करता हूँये जो कुछ कह रहा हूँ मैं हक़ीक़त ही हक़ीक़त हैलब-ओ-लहजा की शीरीनी मोहब्बत की अलामत हैवो आलिम हो कि जाहिल आज हर दिल पर हुकूमत हैनज़र-अंदाज़ करना उस की राहों को क़यामत हैमैं अपनी बज़्म में इस की ज़रूरत पेश करता हूँवो तुलसी जिस की गोयाई सुख़न की सर-बुलंदी हैसुख़न की सर-बुलंदी फ़िक्र-ओ-फ़न की सर-बुलंदी हैगुल-ए-रंगीं वो है जिस से चमन की सर-बुलंदी हैउसी की सर-बुलंदी से वतन की सर-बुलंदी हैमैं एहसास-ए-वक़ार-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत पेश करता हूँवो तुलसी जिस की रामायण का इक इक सीन गुलशन हैवो तुलसी जिस का दुनिया-ए-अदब में नाम रौशन हैवो इक आलिम है इक साहिब-नज़र है माहिर-ए-फ़न हैवो अपने दौर का होमर है फ़िरदौसी है मिल्टन हैमैं ऐ 'तकमील' उसे अपनी रियाज़त पेश करता हूँ
जूँही सूरज चढ़ता हैचूज़ा उठ कर पढ़ता हैचूँ-चूँ चूँ-चूँचूँ-चूँ चूँ-चूँपहले बिस्मिल्लाह कहूँफिर मैं अपना सबक़ पढ़ूँसुब्ह सवेरे उठते हीअपने रब को याद करूँखाने पीने से पहलेचोंच रगड़ कर साफ़ करूँइतना तो है याद मुझेअम्मी आगे क्या सीखूँमुर्ग़ी कट कट करती हैख़ुश हो कर यूँ कहती हैमेरा चू चू शाद रहेशाद रहे आबाद रहेपढ़ने ही से 'इज़्ज़त हैबात ये बेटा याद रहेजाहिल लोग ज़माने मेंख़्वार हुए बर्बाद रहेसीखें और सिखाएँ जोबन कर वो उस्ताद रहेबस तू भी मेहनत से पढ़सब लोगों से आगे बढ़
छुट्टी की घंटी बजते हीचप्पल मेरी नेकर की जेबों में होती थीबस्ता कंधे पर फेंकेतख़्ती लहराता भाग निकलता थाफिर ये घोड़े-शोड़े मेरे आगे बच्चे होते थेपर मेरे बच्चेइल्म की डुगडुगीजाहिल के हाथ आ जाएतो बस्ते भारती हो जाते हैंइतने भारी हो जाते हैंछुट्टी की घंटी से घुटने बज उठते हैंफिर सर बढ़ जाते हैंक़द छोटे रह जाते हैंऔर इंसान का बच्चा घोड़ों से डरने लगता है
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