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नज़्म
ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
पुर था पहलू-ए-मस्जिद-ए-जामे
रौशनियाँ थीं हर-सू लामे
कोई नहीं था किसी का सामेअ'
सब के सब थे दीद के तामे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
'अकबर' ने जाम-ए-उल्फ़त बख़्शा इस अंजुमन को
सींचा लहू से अपने 'राणा' ने इस चमन को
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
आई तब रिश्वत की चिड़िया पँख अपने खोल कर
वर्ना मर जाते मियाँ कुत्ते की बोली बोल कर