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नज़्म
मेरी तख़्ईल में है एक जहान-ए-बेदार
दस्तरस में मिरी नज़्ज़ारा-ए-गुल-हा-ए-चमन
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
जफ़ाओं के एवज़ में कीं वफ़ाएँ हर घड़ी हम ने
मगर इस बे-असर दिल से मोहब्बत की न बू निकली
मंझू बेगम लखनवी
नज़्म
कि वो किस जहान-ए-ख़राबात से रौशनी की क़तारों को कर्ज़ों की सूरत में ले कर
बड़े मान से ऐसे मंज़र
माहरुख़ अली माही
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कि आख़िर इस जहाँ का एक निज़ाम-ए-कार है आख़िर
जज़ा का और सज़ा का कोई तो हंजार है आख़िर
जौन एलिया
नज़्म
और ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहीं
इस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहीं