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नज़्म
ये जुड़ तो सकते हैं लेकिन कहाँ है वो मरहम
जो टूटे रिश्तों को क़ौमों के कर दे फिर बाहम
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
सफ़ा-ओ-सिद्क़ के इंसानियत की ख़िदमत के
करम के जूद-ओ-सख़ा के अता के बख़्शिश के
सुलैमान अरीब हैदराबादी
नज़्म
जो लम्हे बीत गए जानाँ क्यूँकर वो लौट के आएँगे
वो दिल जो टूट गए हमदम आख़िर कैसे जुड़ पाएँगे
साइमा इसमा
नज़्म
मैं शाम का पिंजरा तोड़ के बाहर आ जाता हूँ
मेरे पाँव के सब रिश्ते इक दूजे से जुड़ जाते हैं