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नज़्म
नीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताब
क्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
काफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़
दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
है कभी जाँ और कभी तस्लीम-ए-जाँ है ज़िंदगी
तू इसे पैमाना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा से न नाप
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की
ये धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का झक्कड़ हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बड़ी पुर-ज़ोर आँधी है बड़ी काफ़िर बलाएँ हैं
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दहकती आग भी तय्यार रक्खी है... दिल-ए-काफ़िर
में उस की मेहरबानी और रहमत का तसव्वुर भी