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नज़्म
नीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताब
क्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बरतर अज़ अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ है ज़िंदगी
है कभी जाँ और कभी तस्लीम-ए-जाँ है ज़िंदगी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
काफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़
दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कुछ लचके शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन भड़के
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बड़ी पुर-ज़ोर आँधी है बड़ी काफ़िर बलाएँ हैं
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दहकती आग भी तय्यार रक्खी है... दिल-ए-काफ़िर
में उस की मेहरबानी और रहमत का तसव्वुर भी
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
खोल आँखें देख अपने मुस्लिमों का हाल-ए-ज़ार
उन को तो उन काफ़िर यहूदों ने बनाया है शिकार
शहज़ादी कुलसूम
नज़्म
क़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़ थीं माहौल की ख़ामोशियाँ
दफ़अतन काफ़िर पपीहा बोल उठा अब क्या करूँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
इक निगार-ए-नाज़ की फिरने लगीं आँखें 'मजाज़'
इक बुत-ए-काफ़िर का दिल दर्द-आश्ना होने लगा