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नज़्म
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
कहाँ अब जादा-ए-ख़ुर्रम में सर-सब्ज़ाना जाना है
कहूँ तो क्या कहूँ मेरा ये ज़ख़्म-ए-जावेदाना है
जौन एलिया
नज़्म
लाखों शक्लों के मेले में तन्हा रहना मेरा काम
भेस बदल कर देखते रहना तेज़ हवाओं का कोहराम
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
इन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' का
इसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर'
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अदना ग़रीब मुफ़्लिस शाह-ओ-वज़ीर ख़ुश हैं
मा'शूक़ शाद-ओ-ख़ुर्रम आशिक़ असीर ख़ुश हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ये 'नानक' की ये 'ख़ुसरव' की 'दया-शंकर' की बोली है
ये दीवाली ये बैसाखी ये ईद-उल-फ़ित्र होली है
मंज़र भोपाली
नज़्म
हम तो मजबूर थे इस दिल से कि जिस में हर दम
गर्दिश-ए-ख़ूँ से वो कोहराम बपा रहता है