aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "maah-e-kaamil"
एक माह-ए-कामिल है मेराइस काएनात मेंजिस की रौशनी मेंजगमगाता है मेरा अक्समुनव्वर हैं मेरी राहेंनूर उस का है पुर-सुकूनवो तजल्ली है राह-ए-हयात कीउस की नर्म-ओ-नाज़ुक शुआ'ओं सेकू-ए-दिल में उजाला हैमेरे माह-ए-कामिल कोमेरे मौलामहफ़ूज़ रखना
माह-ए-कामिल हैरत की तस्वीर हो जैसेहद्द-ए-चाह-ए-नख़शब आलमगीर हो जैसेहोली के रंगों का धोकाचेहरों पर तहरीर हो जैसेभीगी रात में आब-ए-शर-अंगेज़ के मारेमस्त सितारेअपनी चालें चूक रहे हैंदहलीज़ों पर पिघली शमएँनीले बादल के पर्दे में ओझल होतेआँख के तारे ढूँड रही हैंआईनों से नालाँ नक़्श से आरी चेहरेजज़्बों के उक़्दों में उलझेमूर्तियों की माला जपतेकान में हल्क़े डालेगेरवे बादल पहने नाच रहे हैंलाल तिलक में आँख उगाएशमएँ थामे चोब उठाएयक-रंगी दस्तारें जुब्बे गुम्बद ओढ़ेसदियों की दीवार पे रोतेरक़्स-ए-वहशत का ज़हराब उंडेल रहे हैंना-बीनाई के पैग़म्बररंग रचातीमौत की बोली बोल रहे हैंचीख़ रहे हैंइन के पैराहन को देखोचेहरे देखो आँखें देखोदेखो सब हाथों को देखोजिस पर रंग नज़र आ जाएजान से जाए
वो सियह-ज़ुल्फ़ वो आँखों में गुलाबी डोरेजैसे मय-ख़ाने पे घनघोर घटा छा जाएऔर फिर उस पे वो मय-पाश निगाहें तौबाआदमी क्या है फ़रिश्तों को ख़ुमार आ जाए
फिर ये मौसम ये हसीं शाम मिले या न मिलेफ़ुर्सत-ए-गर्दिश-ए-अय्याम मिले या न मिलेफिर तुम्हें 'कामिल'-ए-बदनाम मिले या न मिले
मेरी आँखों में वो रुख़्सत का समाँ है अब भीइसी अंदाज़ से दिल गिर्या-कुनाँ है अब भीहाए वो 'आरिज़-ए-गुलगूँ पे मचलते आँसूएक शो'ला सा मिरे दिल पे रवाँ है अब भीसिसकियों से भरे लहजे में ख़तों की ताकीदमेरे दिल पे उसी लहजे का निशाँ है अब भीचार दिन पहले से इक मोहर-ए-ख़मोशी लब परयाद मुझ को तिरी ख़ामोश फ़ुग़ाँ है अब भीवो ज़रा बात पे मुँह फेर के रो रो देनामेरे एहसास पे इक बार-ए-गराँ है अब भीआख़िरी शब किसे नींद आई थी पल भर के लिएमेरे कानों में वो आवाज़-ए-अज़ाँ है अब भीएक बोसा जो दिया था मिरे पैराहन परपैरहन पर तिरे होंटों का निशान है अब भीमेरे एहसास के परतव को समझने वालीएक बस्ती मिरी हस्ती में निहाँ है अब भीदिल तिरी याद से ग़ाफ़िल नहीं पल भर के लिएतेरी सूरत मिरी आँखों में निहाँ है अब भीकिस तरह दूर हो दूरी कोई तदबीर नहींबम्बई में वही तकलीफ़-ए-मकाँ है अब भीऐ मिरी रूह-ए-ग़ज़ल हुस्न-ए-ग़ज़ल जान-ए-ग़ज़लचैन तुझ बिन तिरे 'कामिल' को कहाँ है अब भी
किसी कोहसार की आग़ोश में गुम हो जाएँनींद आ जाए जो 'कामिल' तो वहीं सो जाएँ
उन की महफ़िल और जश्न-ए-मय-कशी मेरे बग़ैरदुश्मनों की आरज़ू बर आएगी मेरे बग़ैरहाए कल कैसी घड़ी आ जाएगी मेरे बग़ैरतुम करोगे बज़्म में साक़ी-गरी मेरे बग़ैरऐ मिरी नाकामियो आओ लिपट जाओ मुझेतुम भी कल बे-आसरा हो जाओगी मेरे बग़ैरमैं ने हर महफ़िल में होंटों पे सजाया है उसेकिस के मुँह जा कर लगेगी तिश्नगी मेरे बग़ैरकल किसे छेड़ोगे मुँह भर भर के कोसोगे किसेमुज़्महिल होगी तुम्हारी बरहमी मेरे बग़ैरमैं ने सीने से लगाया उस को सारी ज़िंदगीठोकरें खाती फिरेगी बे-कसी मेरे बग़ैरपड़ रही थीं ख़ुद मिरे ऊपर मिरी परछाइयाँकिस के घर जा कर बसेगी तीरगी मेरे बग़ैरकितने ग़म पलते थे मेरी इक अकेली जान परगर्दिश-ए-दौराँ की महफ़िल लुट गई मेरे बग़ैरहाल क्या है कोई इतना पूछने वाला नहींसर छुपाती फिर रही है बे-कली मेरे बग़ैरमैं तो 'कामिल' चैन से हूँ मौत की आग़ोश मेंख़ाक उड़ाती फिर रही है ज़िंदगी मेरे बग़ैर
बल हैं जबीं के मतला’-ए-अव्वल होंट हैं जैसे मतला’-ए-सानीक़द क्या कहिए शे'र है मौज़ूँ 'कामिल' है तस्वीर ग़ज़ल की
उसे महसूस करता हूँनसीम-ए-सुब्ह के झोंकों मेंसर सर के थपेड़ों मेंअमावस के अँधेरों मेंमह-ए-कामिल के शब-अफ़रोज़ उजालों में
तमन्नाओं के मेले अब नहीं लगते कभी दिल मेंकशिश बाक़ी रही कोई न राहों में, न मंज़िल मेंधुआँ सा अब नज़र आता है मुझ को माह-ए-कामिल में
आँख के शीशों में उतरेअन-गिनत चेहरे मगरकोई भी न रूह का गौतम हुआअंधी गलियों के नगर मेंमैं भटकता ही रहादिल के दरवाज़े पे दस्तकतीरगी देती रहीकोई भी न माह-ए-कामिलचाहतों की झील मेंअक्स-आरा हो सका
थी मह-ए-नौ रफ़्ता रफ़्ता माह-ए-कामिल बन गईशाइराना महफ़िलों में शम-ए-महफ़िल बन गईहुस्न-ए-फ़ितरत की अदा-फ़हमी के क़ाबिल बन गईजब ज़बाँ की तेज़ नश्तर से रग-ए-दिल बन गईक्या क़यामत है कि दिल पर कुछ असर लेते नहींहो रहा है ख़ून इस का तुम ख़बर लेते नहीं
कलाई में तो चौड़ी का खनकनाग़रज़ में आईना तो है सँवरनामैं जैसे दश्त में हूँ राह कोईतो इस पर इक मुसाफ़िर का गुज़रनामैं जैसे ताल देता साज़ कोईतो रक़्क़ासा का इस लय पर थिरकनामैं हूँ बे-नूर सी इक झील और तूहै इस पर माह-ए-कामिल का उतरनातू चेहरा ख़ूबसूरत मैं हूँ पर्दामेरा मक़्सद तुझे महफ़ूज़ रखनातेरी ज़ीनत का पहरे-दार हूँ मैंतुझे ख़ुद से अलग कैसे करूँ मैं
ये बड़ा चाँद चमकता हुआ चेहरा खोलेबैठा रहता है सर-ए-बाम-ए-शबिस्ताँ शब कोहम तो इस शहर में तन्हा हैं, हमीं से बोलेकौन इस हुस्न को देखेगा ये इस से पूछोसोने लगती है सर-ए-शाम ये सारी दुनियाइन के हुजरों में न दर है न दरीचा कोईइन की क़िस्मत में शब-ए-माह को रोना कैसाइन के सीने में न हसरत न तमन्ना कोई
तिरे लुत्फ़-ओ-अता की धूम सही महफ़िल महफ़िलइक शख़्स था इंशा नाम-ए-मोहब्बत में कामिलये शख़्स यहाँ पामाल रहा, पामाल गया
अप्पालो दस ये कहता हैनहीं अब दूर वो मंज़िलकि जब महताब की वादीबनेगी खेल की महफ़िलये ज़र्रीं कामयाबी भीहमारी ही बदौलत हैमिलेगा चाँद फूलों सेकि धरती एक जन्नत हैअभी तो चाँद हारा हैसितारे और हारेंगेज़मीं हम ने सजाई हैफ़लक भी हम सँवारेंगेबुज़ुर्गों की निगाहों मेंये सब कुछ एक जादू हैमगर अब वहम-ए-साबिक़ परनई दुनिया को क़ाबू हैमुबारक कोशिश-ए-हाज़िरकि मुस्तक़बिल हमारा हैज़मीं के फूल अपने हैंमह-ए-कामिल हमारा है
तिरी रौशन-दिमाग़ी पर हैं नाज़ाँ आसमाँ वालेतिरी नाज़ुक-ख़याली पर हैं हैराँ गुल्सिताँ वालेतिरी अज़्मत के क़ाइल दिल से हैं सारे-जहाँ वालेसुख़न-दानों की महफ़िल में तू शम-ए-हुस्न-ए-महफ़िल हैसितारों में ज़िया-अफ़रोज़ मिस्ल-ए-माह-ए-कामिल हैसमझते हैं तुझे सालार अपना कारवाँ वालेकहीं अल्फ़ाज़ में हुस्न-ए-हक़ीक़ी की हैं तस्वीरेंकहीं अशआ'र में रम्ज़-ए-मोहब्बत की हैं तफ़्सीरेंतिरे दीवाँ को जाम-ए-जम समझते हैं जहाँ वालेकहीं आँसू कहीं नग़्मे कहीं जल्वे जवानी केतिरे अशआ'र आईने हैं हाल-ए-ज़िंदगानी केकि जिन में अपनी सूरत देख लेते हैं जहाँ वालेकहीं हुब्ब-ए-वतन की आग लफ़्ज़ों में भरी देखीकहीं मंज़र-निगारी की हसीं जादूगरी देखीवो तश्बीहें हैं जिन पर नाज़ करते हैं ज़बाँ वालेजहाँ तू ने ज़रा बर्क़-ए-जमाल-ए-शे'र चमकाईवहीं इक ज़िंदगी की लहर सी दौड़ी नज़र आईतिरी शो'ला-नवाई पर हैं चुप शबनम-सिताँ वालेतिरे अशआ'र ने रंग-ए-क़ुबूल-ए-आम पाया हैजहाँ में तू ने अपनी शेरियत से नाम पाया हैहमेशा याद रक्खेंगे तुझे हिन्दोस्ताँ वाले
ज़रा मोहलत तो दे मुझ कोबसा लूँ इन निगाहों मेंवो चेहराजो मह-ए-कामिल सा रौशन हैवो चेहरा जिस ने वीराने में दिल केखिलाए हैं मोहब्बत के गुलिस्ताँवो चेहरा जिस के दम सेअभी तक हूँ मैं ज़िंदाज़रा मोहलत तो दे मुझ कोमैं उन ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू कोचुरा कर मस्त आँचल सेहवा केमैं अपनी रूह को कर लूँ मोअ'त्तरज़रा मोहलत तो दे मुझ कोमैं ले कर रौशनी की चंद किरनेंउन निगाहों सेअंधेरे दूर कर लूँ अपने दिल केउसे फिर सामने पा करतलब कर लूँ इजाज़त रुख़्सती कीज़रा मोहलत तो दे मुझ कोउखड़ती साँस मेरी
आसफ़ुद्दौला-ए-मरहूम की तामीर-ए-कुहनजिस की सनअ'त का नहीं सफ़्हा-ए-हस्ती पे जवाबदेख सय्याह उसे रात के सन्नाटे मेंमुँह से अपने मह-ए-कामिल ने जब उल्टी हो नक़ाबदर-ओ-दीवार नज़र आते हैं क्या साफ़-ओ-सुबुकसहर करती है निगाहों पे ज़िया-ए-महताबयही होता है गुमाँ ख़ाक से मस इस को नहींहै सँभाले हुए दामन में हवा-ए-शादाबयक-ब-यक दीदा-ए-हैराँ को ये शक होता हैढल के साँचे में ज़मीं पर उतर आया है सहाबबे-ख़ुदी कहती है आया ये फ़ज़ा में क्यूँ करकिसी उस्ताद मुसव्विर का है ये जल्वा-ए-ख़्वाबइक अजब मंज़र-ए-दिल-गीर नज़र आता हैदूर से आलम-ए-तस्वीर नज़र आता है
कुछ नहीं कुछ भी नहीं आज अज़ा-ख़ाने मेंआज ख़स-ख़ाना-ए-ख़्वाहिश में फ़क़त राख है राखवो किसी दस्त-ए-हुनर-वर का तराशा हुआ तिलकफ़-ए-ज़ौ-रेज़ को शरमाता था माह-ए-कामिलवो तिरी साअद-ए-सीमीं का ज़मुर्रद भी ख़जिल
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