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नज़्म
अटा है धूल में इक नौजवाँ मिट्टी में लेटा है
उठा कर गर्द अपने जिस्म सर चेहरे पे मलता है
सय्यद हशमत सुहैल
नज़्म
जिस जगह हर सुब्ह को मिलता है ईमा-ए-ज़ुहूर
और बुने जाते हैं रातों के लिए ख़्वाब के जाल
नून मीम राशिद
नज़्म
रिज़्क़ मलता रहे रा'नाई का आँखों को यूँही
यूँ ही बटती रहे ख़ैरात-ए-कफ़न गर्द-ए-यक़ीं