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नज़्म
वो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखे
नज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
न हो नौमीद नौमीदी ज़वाल-ए-इल्म-ओ-इरफ़ाँ है
उमीद-ए-मर्द-ए-मोमिन है ख़ुदा के राज़-दानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तिरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा है
अगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कभी किया रम इश्क़ से ऐसे जैसे कोई वहशी आहू
और कभी मर-मर के सहर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
ऐ मर्द-ए-ख़ुदा तुझ को वो क़ुव्वत नहीं हासिल
जा बैठ किसी ग़ार में अल्लाह को कर याद