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नज़्म
हर मंज़िल में अब साथ तिरे ये जितना डेरा-डांडा है
ज़र दाम-दिरम का भांडा है बंदूक़ सिपर और खांडा है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँ
मैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर का
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़रदार नमाज़ी ईद के दिन कपड़ों में चमकते जाते हैं
नादार मुसलमाँ मस्जिद में जाते भी हुई शरमाते हैं
नुशूर वाहिदी
नज़्म
दैर में ख़ूँ, मस्जिद में ख़ूँ, कलीसाओं में ख़ूँ
ख़ून के दरिया नज़र आएँगे हर मैदान में