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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मौजा-ए-बहर-ए-क़नाअत तेरी अबरू की शिकन
तख्त-ए-शाही पर हसीर-ए-फ़क़्र तेरा ख़ंदा-ज़न
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
थके-माँदे मुसाफ़िर को सुला देता लब-ए-दरिया
हवा-ए-सर्व बन कर मौजा-ए-‘अम्बर-फ़शाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
रौ में ये मौजा-ए-बातिल की बहा जाता है
फ़ज़्ल से अपने मुसलमाँ को मुसलमाँ कर दे
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
तेरी सुर्ख़ी में निहाँ है कुछ शराब-ए-ज़िंदगी
तेरी तह में ग़र्क़ है मौज-ए-शबाब-ए-ज़िंदगी
साक़िब कानपुरी
नज़्म
ये पारीना फ़साने मौज-हा-ए-ग़म में खो जाएँ
मिरे दिल की तहों से तेरी सूरत धुल के बह जाए