aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "milk"
मज्लिस-ए-इत्तिहाद-ए-मिल्लत कोलिखिए हब्ल-उल-मतीन-ए-कलकत्तासारे हिन्दोस्ताँ की दौलत कोकहिए मिल्क-ए-यमीन-ए-कलकत्ताकुफ़्र हुगली में जा के डूब गयादीं हुआ है मकीन-ए-कलकत्ताअसर-ए-सज्दा-हा-ए-पैहम सेहुई रौशन जबीन-ए-कलकत्ताहर तरफ़ फिर रहे हैं नीली पोशआसमाँ है ज़मीन-ए-कलकत्ता
तमाज़त से महरूम अफ़्कार के ज़र्द सूरज उगल करसभी अपने अस्लाफ़ की खोपड़ियों की मालाएँ पहनेअजन्मे हुए अपने बच्चों की शक्लों कोबारूद के ढेर पर रख रहे हैंवो बच्चे जिन्हें जन्म लेना पड़ा थावो अपने घरों में अँधेरे सजा करचराग़ों को अपनी ही क़ब्रों पे रखनेचले आ रहे हैंयहाँ माँ के सीने से उखड़ी हुईछातियाँमिल्क पाउडर से भरनेनई नस्ल बाज़ार में आ चुकी हैकिताबों के अम्बार से उगने वालीये तहज़ीबअपने ख़ुदाओं को आवाज़ देने लगी हैमगर अम्न की सारी जेबें हैं ख़ालीवो सारे ख़ुदा ग़ैर-महफ़ूज़ हैं
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँगमैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयाततेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या हैतेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबाततेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या हैतू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाएयूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाएऔर भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवाराहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुमहर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैंतुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुममैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैंतुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब मेंऔर इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहरवो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहींये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले करचले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहींफ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िलकहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिलकहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिलजवाँ लहू की पुर-असरार शाह-राहों सेचले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़ेदयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों सेपुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहेबहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगनबहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामनसुबुक सुबुक थी तमन्ना दबी दबी थी थकन
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनियाये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनियाये दौलत के भूके रिवाजों की दुनियाये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ सेबज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मअ'नी
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहींलौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहींऔर कोई हम-नवा मिल जाए ये क़िस्मत नहींऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
नाम भूले से जो मेरा कहीं आया होगाग़ैर-महसूस तरीक़े से वो चौंका होगाएक जुमले को कई बार सुनाया होगाबात करते हुए सौ बार वो भूला होगाये जो लड़की नई आई है कहीं वो तो नहींउस ने हर चेहरा यही सोच के देखा होगाजान-ए-महफ़िल है मगर आज फ़क़त मेरे बग़ैरहाए किस दर्जा वही बज़्म में तन्हा होगाकभी सन्नाटों से वहशत जो हुई होगी उसेउस ने बे-साख़्ता फिर मुझ को पुकारा होगाचलते चलते कोई मानूस सी आहट पा करदोस्तों को भी किस उज़्र से रोका होगायाद कर के मुझे नम हो गई होंगी पलकें''आँख में पड़ गया कुछ'' कह के ये टाला होगाऔर घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाहहर सतर में मिरा चेहरा उभर आया होगाजब मिली होगी उसे मेरी अलालत की ख़बरउस ने आहिस्ता से दीवार को थामा होगासोच कर ये कि बहल जाए परेशानी-ए-दिलयूँही बे-वज्ह किसी शख़्स को रोका होगा!
ना-रसाई अगर अपनी तक़दीर थीतेरी उल्फ़त तो अपनी ही तदबीर थीकिस को शिकवा है गर शौक़ के सिलसिलेहिज्र की क़त्ल-गाहों से सब जा मिले
है शायद दिल मिरा बे-ज़ख़्म और लब पर नहीं छालेमिरे सीने में कब सोज़िंदा-तर दाग़ों के हैं थालेमगर दोज़ख़ पिघल जाए जो मेरे साँस अपना लेतुम अपनी माम के बेहद मुरादी मिन्नतों वालेमिरे कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं बालेमगर पहले कभी तुम से मिरा कुछ सिलसिला तो थागुमाँ में मेरे शायद इक कोई ग़ुंचा खिला तो थावो मेरी जावेदाना बे-दुई का इक सिला तो थासो उस को एक अब्बू नाम का घोड़ा मिला तो था
जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गयाचेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गयाहाथों से ख़ुशी का जाम छुटा होंटों से हँसी का नाम गया
मिले आबशारों से भी हौसलेपहाड़ों में तुझ को दिए रास्ते
तुम्हारी क़ब्र परमैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आयामुझे मालूम थातुम मर नहीं सकतेतुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थीवो झूटा थावो तुम कब थेकोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा थामिरी आँखेंतुम्हारे मंज़रों में क़ैद हैं अब तकमैं जो भी देखता हूँसोचता हूँवो वही हैजो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थीकहीं कुछ भी नहीं बदलातुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैंमैं लिखने के लिएजब भी क़लम काग़ज़ उठाता हूँतुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूँबदन में मेरे जितना भी लहू हैवो तुम्हारीलग़्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता हैमिरी आवाज़ में छुप करतुम्हारा ज़ेहन रहता हैमिरी बीमारियों में तुममिरी लाचारियों में तुमतुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा हैवो झूटा हैतुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँतुम मुझ में ज़िंदा होकभी फ़ुर्सत मिले तो फ़ातिहा पढ़ने चले आना
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भीमगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल औरमहके हुए रुकएकिताबें माँगने गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थेउन का क्या होगावो शायद अब नहीं होंगे!
ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारोये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारोविर्से में हमें ये ग़म है मिला इस ग़म को नया क्या लिखनाज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामतनिगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़तधड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृतहमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकतलचक लचक गुनगुना रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
कह भी दे अब वो सब बातेंजो दिल में पोशीदा हैंसारे रूप दिखा दे मुझ कोजो अब तक नादीदा हैंएक ही रात के तारे हैंहम दोनों उस को जानते हैंदूरी और मजबूरी क्या हैउस को भी पहचानते हैंक्यूँ फिर दोनों मिल नहीं सकतेक्यूँ ये बंधन टूटा हैया कोई खोट है तेरे दिल मेंया मेरा ग़म झूटा है
हाँ उम्र का साथ निभाने के थे अहद बहुत पैमान बहुतवो जिन पे भरोसा करने में कुछ सूद नहीं नुक़सान बहुतवो नार ये कह कर दूर हुई 'मजबूरी साजन मजबूरी'ये वहशत से रंजूर हुए और रंजूरी सी रंजूरी?उस रोज़ हमें मालूम हुआ उस शख़्स का मुश्किल समझानाइस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवानागो आग से छाती जलती थी गो आँख से दरिया बहता थाहर एक से दुख नहीं कहता था चुप रहता था ग़म सहता थानादान हैं वो जो छेड़ते हैं इस आलम में नादानों कोउस शख़्स से एक जवाब मिला सब अपनों को बेगानों को'कुछ और कहो तो सुनता हूँ इस बाब में कुछ मत फ़रमाना'इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवानाअब आगे का तहक़ीक़ नहीं गो सुनने को हम सुनते थेउस नार की जो जो बातें थीं उस नार के जो जो क़िस्से थेइक शाम जो उस को बुलवाया कुछ समझाया बेचारे नेउस रात ये क़िस्सा पाक किया कुछ खा ही लिया दुखयारे नेक्या बात हुई किस तौर हुई अख़बार से लोगों ने जानाइस बस्ती के इक कूचे में इक इंशा नाम का दीवाना
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