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नज़्म
ऐ गुल-ए-रंगीं-क़बा ऐ ग़ाज़ा-ए-रू-ए-बहार
तू है ख़ुद अपने जमाल-ए-हुस्न का आईना-दार
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
ऐ कि ख़्वाबीदा तिरी ख़ाक में शाहाना वक़ार
ऐ कि हर ख़ार तिरा रू-कश-ए-सद-रू-ए-निगार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
दश्त-ओ-दमन में कोह कमर में बिखरे हुए हैं फूल ही फूल
रु-ए-निगार-ए-गीती पर हैं सब्त मिरे बोसों के निशाँ
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
फिर निगाह-ए-शौक़ की गर्मी है और रू-ए-निगार
फिर अरक़-आलूद इक काफ़िर की पेशानी है आज
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
न ख़ातूनों में रह जाएगी पर्दे की ये पाबंदी
न घूँघट इस तरह से हाजिब-ए-रू-ए-सनम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
रू-ए-ज़ेबा-ए-उरूस-ए-फ़त्ह पुर ग़ाज़ा करें
मिल के गाएँ राम के गुन दिल में हो जोश-ए-सुरूर
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
नज़्म
ताबिश-ए-रंग-ए-शफ़क़ आतिश-ए-रू-ए-ख़ुर्शीद
मिल के चेहरे पे सहर आई है ख़ून-ए-अहबाब