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नज़्म
वो जब हंगाम-ए-रुख़्सत देखती थी मुझ को मुड़ मुड़ कर
तो ख़ुद फ़ितरत के दिल में महशर-ए-जज़्बात होता था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो राह बदलते हैं अपनी और मुड़ कर हाथ हिलाते हैं
लेकिन वो दिलों को यादों की ख़ुशबू बन कर महकाते हैं