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नज़्म
कोई मुल्क अब नहीं जिन में ये जौहर हो न रख़्शंदा
न ग़ाफ़िल इस से चीनी हैं न शामी हैं न अफ़्ग़ानी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
माल-ए-दीन ओ माल-ए-दुनिया का बड़ा डीलर बनूँ
मुल्क के अंदर बनूँ या मुल्क के बाहर बनूँ
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ऐन रशीद
नज़्म
सुना है उस के निज़ाम-ए-मुल्की पे सब हैं नाज़ाँ
उसे ही बख़्शेंगे फिर से वो मंसब-ए-हज़ारी
शहनाज़ नबी
नज़्म
जुज़ तिजारत क़ौम की मुल्की सियासत कुछ नहीं
लुत्फ़-ए-आज़ादी इसी में है यही स्वराज है
फ़ैज़ लुधियानवी
नज़्म
तेरी फ़ितरत क़ाबिलिय्यत तेरे काम आ ही गई
ग़ैर-मुल्की हाकिमों तक तुझ को पहुँचा ही गई
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
क्या मसनद तकिया मुल्क मकाँ क्या चौकी कुर्सी तख़्त छतर
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा