aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "naadir"
मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामनेसैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामनेसैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामनेऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
आओ कि आज ग़ौर करें इस सवाल परदेखे थे हम ने जो वो हसीं ख़्वाब क्या हुएदौलत बढ़ी तो मुल्क में इफ़्लास क्यूँ बढ़ाख़ुश-हाली-ए-अवाम के अस्बाब क्या हुएजो अपने साथ साथ चले कू-ए-दार तकवो दोस्त वो रफ़ीक़ वो अहबाब क्या हुएक्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून कामरते थे जिन पे हम वो सज़ा-याब क्या हुएबे-कस बरहनगी को कफ़न तक नहीं नसीबवो व'अदा-हा-ए-अतलस-ओ-किम-ख़्वाब क्या हुएजम्हूरियत-नवाज़ बशर-दोस्त अम्न-ख़्वाहख़ुद को जो ख़ुद दिए थे वो अलक़ाब क्या हुएमज़हब का रोग आज भी क्यूँ ला-'इलाज हैवो नुस्ख़ा-हा-ए-नादिर-ओ-नायाब क्या हुएहर कूचा शो'ला-ज़ार है हर शहर क़त्ल-गाहयक-जेहती-ए-हयात के आदाब क्या हुएसहरा-ए-तीरगी में भटकती है ज़िंदगीउभरे थे जो उफ़ुक़ पे वो महताब क्या हुएमुजरिम हूँ मैं अगर तो गुनहगार तुम भी होऐ रहबरना-ए-क़ौम ख़ता-कार तुम भी हो
बैठे बे-फ़िक्र क्या हो हम-वतनोउठो अहल-ए-वतन के दोस्त बनोमर्द हो तुम किसी के काम आओवर्ना खाओ पियो चले जाओजब कोई ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाओदिल को दुख भाइयों के याद दिलाओपहनो जब कोई उम्दा तुम पोशाककरो दामन से ता गरेबाँ चाकखाना खाओ तो जी में तुम शरमाओठंडा पानी पियो तो अश्क बहाओकितने भाई तुम्हारे हैं नादारज़िंदगी से है जिन का दिल बेज़ारनौकरों की तुम्हारे जो है ग़िज़ाउन को वो ख़्वाब में नहीं मिलताजिस पे तुम जूतियों से फिरते होवाँ मयस्सर नहीं वो ओढ़ने कोखाओ तो पहले लो ख़बर उन कीजिन पे बिपता है नीस्ती की पड़ीपहनो तो पहले भाइयों को पहनाओकि है उतरन तुम्हारी जिन का बनावएक डाली के सब हैं बर्ग-ओ-समरहै कोई उन में ख़ुश्क और कोई तरसब को है एक अस्ल से पैवंदकोई आज़ुर्दा है कोई ख़ुरसंदमुक़बिलो! मुदब्बिरों को याद करोख़ुश-दिलो ग़म-ज़दों को शाद करोजागने वाले ग़ाफ़िलों को जगाओतैरने वालो डूबतों को तिराओहैं मिले तुम को चश्म ओ गोश अगरलो जो ली जाए कोर-ओ-कर की ख़बरतुम अगर हाथ पाँव रखते होलंगड़े लूलों को कुछ सहारा दोतंदुरुस्ती का शुक्र किया है बताओरंज बीमार भाइयों का हटाओतुम अगर चाहते हो मुल्क की ख़ैरन किसी हम-वतन को समझो ग़ैरहो मुसलमान उस में या हिन्दूबोध मज़हब हो या कि हो ब्रहमूजाफ़री होवे या कि हो हनफ़ीजीन-मत होवे या हो वैष्णवीसब को मीठी निगाह से देखोसमझो आँखों की पुतलियाँ सब कोमुल्क हैं इत्तिफ़ाक़ से आज़ादशहर हैं इत्तिफ़ाक़ से आबादहिन्द में इत्तिफ़ाक़ होता अगरखाते ग़ैरों की ठोकरें क्यूँकरक़ौम जब इत्तिफ़ाक़ खो बैठीअपनी पूँजी से हात धो बैठीएक का एक हो गया बद-ख़्वाहलगी ग़ैरों की पड़ने तुम पे निगाहफिर गए भाइयों से जब भाईजो न आनी थी वो बला आईपाँव इक़बाल के उखड़ने लगेमुल्क पर सब के हाथ पड़ने लगेकभी तूरानियों ने घर लूटाकभी दुर्रानियों ने ज़र लूटाकभी नादिर ने क़त्ल-ए-आम कियाकभी महमूद ने ग़ुलाम कियासब से आख़िर को ले गई बाज़ीएक शाइस्ता क़ौम मग़रिब कीये भी तुम पर ख़ुदा का था इनआ'मकि पड़ा तुम को ऐसी क़ौम से कामवर्ना दुम मारने न पाते तुमपड़ती जो सर पे वो उठाते तुममुल्क रौंदे गए हैं पैरों सेचैन किस को मिला है ग़ैरों से
बैठे बे-फ़िक्र क्या हो हम-वतनोउट्ठो अहल-ए-वतन के दोस्त बनोतुम अगर चाहते हो मुल्क की ख़ैरन किसी हम-वतन को समझो ग़ैरहों मुसलमान इस में या हिन्दूबोध मज़हब हो या कि हो ब्रहमूसब को मीठी निगाह से देखोसमझो आँखों की पुतलियाँ सब कोमुल्क हैं इत्तिफ़ाक़ से आज़ादशहर हैं इत्तिफ़ाक़ से आबादहिन्द में इत्तिफ़ाक़ होता अगरखाते ग़ैरों की ठोकरें क्यूँकरक़ौम जब इत्तिफ़ाक़ खो बैठीअपनी पूँजी से हाथ धो बैठीएक का एक हो गया बद-ख़्वाहलगी ग़ैरों की तुम पे पड़ने निगाहफिर गए भाइयों से जब भाईजो न आनी थी वो बला आईपाँव इक़बाल के उखड़ने लगेमुल्क पर सब के हाथ पड़ने लगेकभी तूरानियों ने घर लूटाकभी दुर्रानियों ने ज़र लूटाकभी नादिर ने क़त्ल-ए-आम कियाकभी महमूद ने ग़ुलाम कियासब से आख़िर को ले गई बाज़ीएक शाइस्ता क़ौम मग़रिब कीमुल्क रौंदे गए हैं पैरों सेचैन किस को मिला ही ग़ैरों से
चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखीसुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखीबनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखीसलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखीन पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी
तो जब सात सौ आठवीं रात आईतो कहने लगी शहरज़ाद:ऐ जवाँ-बख़्तशीराज़ में एक रहता था नाई;वो नाई तो था हीमगर उस को बख़्शा था क़ुदरत नेइक और नादिर गिराँ-तर हुनर भीकि जब भीकिसी मर्द-ए-दाना का ज़ेहन-ए-रसाज़ंग-आलूदा होने को आतातो नाई को जा कर दिखाताकि नाई दिमाग़ों का मशहूर माहिर थावो कासा-ए-सर से उन को अलग कर केइन की सब आलाइशें पाक कर केफिर अपनी जगह पर लगाने के फ़न में था कामिल
इधर से न जाओइधर रौशनी हैकहीं आओ छुप जाएँ जाकर तमाम आफ़तों सेमुझे एक तह-ख़ाना मालूम है ख़ुशनुमा साजो शाहान-ए-देहली ने बनवाया था इस ग़रज़ सेकि अबदालियों, नादिरी फ़ौज की दस्तरस सेबचें और बैठे रहें सारे हंगामों की ज़द से हट करये दर-अस्ल मीरास है आप की मेरी सब कीसलातीन-ए-देहली से पहले किसी और ने इस की बुनियाद रक्खी थी लेकिनवो अब क़ब्ल-ए-तारीख़ की बात है कौन जाने
ये आदमी की गुज़रगाह-ए-शाहराह-ए-हयातहज़ारों साल का बार-ए-गराँ उठाए हुएजबीं पे कातिब-ए-तक़दीर की जली तहरीरगले से सैकड़ों नक़्श-ए-क़दम लगाए हुएगुज़रते वक़्त के गर्द-ओ-ग़ुबार के नीचेहसीन जिस्म की ताबिंदगी छुपाए हुएगुज़िश्ता दौर की तहज़ीब की मनाज़िल कोजवान माँ की तरह गोद में सुलाये हुएये आदमी की गुज़रगाह-ए-शाहराह-ए-हयातहज़ारों साल का बार-ए-गराँ उठाए हुएइधर से गुज़रे हैं चंग़ेज़-ओ-नादिर-ओ-तैमूरलहू में भीगी हुई मिशअलें जलाए हुएग़ुलामों और कनीज़ों के कारवाँ आएख़ुद अपने ख़ून में डूबे हुए नहाए हुएशिकस्ता दोश पे दीवार-ए-चीन को लादेसरों पे मिस्र के एहराम को उठाए हुएजलाल-ए-शैख़-ओ-शिकोह-ए-बरहमनी के जुलूसहवस के सीनों में आतिश-कदे छुपाए हुएजहालतों की तवील-ओ-अरीज़ परछाईंतवहहुमात की तारीकियाँ जगाए हुएसफ़ेद क़ौम के अय्यार ताजिरों के गिरोहफ़रेब-ओ-मक्र से अपनी दुकाँ सजाए हुएशिकस्त-ख़ुर्दा सियासी गदागरों के हुजूमअदब से टूटी हुई गर्दनें झुकाए हुएग़मों से चूर मुसाफ़िर थके हुए राहीचराग़-ए-रूह के दिल के कँवल बुझाए हुएये आदमी की गुज़रगाह-ए-शाहराह-ए-हयातहज़ारों साल का बार-ए-गराँ उठाए हुएनए उफ़ुक़ से नए क़ाफ़िलों की आमद हैचराग़-ए-वक़्त की रंगीन लौ बढ़ाए हुएबग़ावतों की सिपह इंक़लाब के लश्करज़मीं पे पाँव फ़लक पे नज़र जमाए हुएग़ुरूर-ए-फ़त्ह के परचम हवा में लहरातेसबात-ओ-अज़्म के ऊँचे अलम उठाए हुएहथेलियों पे लिए आफ़्ताब और महताबबग़ल में कुर्रा-ए-अर्ज़-ए-हसीं दबाए हुएउठो और उठ के इन्हें क़ाफ़िलों में मिल जाओजो मंज़िलों को हैं गर्द-ए-सफ़र बनाए हुएक़दम बढ़ाए हुए हैं मुजाहिदान-ए-वतनमुजाहिदान-ए-वतन हैं क़दम बढ़ाए हुए
حضور حق سے چلا لے کے لولوئے لالاوہ ابر جس سے رگ گل ہے مثل تار نفسبہشت راہ ميں ديکھا تو ہو گيا بيتابعجب مقام ہے ، جي چاہتا ہے جاؤں برسصدا بہشت سے آئي کہ منتظر ہے تراہرات و کابل و غزني کا سبزئہ نورسسرشک ديدہ نادر بہ داغ لالہ فشاںچناں کہ آتش او را دگر فرونہ نشاں!
नमी दे कर जो मिट्टी कोमुसलसल गूँधते हो तुमबताओ क्या बनाओगेकोई कूज़ा कोई मूरत या फिर महबूब की सूरतसुख़नवर हूँ कहो तो मशवरा इक दूँये घाटे का ही सौदा हैयहाँ मिट्टी की मूरत की अगर आँखें बनाओगेतुम्हें आँखें दिखाएगीतराशोगे ज़बान उस की तो तुरशी झेल पाओगेअगर जो दिल बनाया तो हज़ारों ख़्वाहिशें बन कर तुम्हें तुम से ही मांगेगीअता-ए-ख़िलअत-ए-अह्मर उसे ख़ुद-सर बना देगीवहाँ अपनी मोहब्बत का जो नादिर ताज पहनायाख़ुदा ख़ुद को ही समझेगीअभी भी वक़्त है मानोइरादा मुल्तवी कर दोइसे मिट्टी ही रहने दोइसे मिट्टी ही रहने दो
मिरा वजूददेखते ही देखतेएक अजाइब-ख़ाने में ढल रहा हैकि मेरे ला-शुऊर नेआसार-ए-क़दीमा की नादिर इनायतों कोछुपा के मुझ सेमुझ ही में जम्अ कर दिया हैयहाँ कहीं किसी रैक मेंमिरे हुनूत-शूदा हर्फ़ और लम्हेपड़े हुए हैंजिन्हें न-जाने कौन सा मसाला लगा दिया गया हैकि मिरे जिस्म की हरारत से भी वोगल नहीं रहे हैंइन अलमारियों सेमिरी टूटी हुई चूड़ियों के साज़ कीआवाज़ आ रही हैये देखो शेल्फ़ मेंमेरी बचपन की गुड़िया काटूटा हुआ जिस्म सो रहा हैकहीं मेरी सिंघार-मेज़ का आईनाबे-रंग हो कर चटख़ गया हैमगर अब भीमेरे अज़ाब-लम्हों काअक्स दे रहा हैकहीं किसी सुरमे-दानी मेंशायद कभी मैं ने अपनी आँख छोड़ दी थीजो उस में से मुझे घूरती हैऔर मेरी ज़िंदगीमेरे ज़ंग-आलूद ज़ेवरों मेंदब के चीख़ती हैऔर पायलों की आवाज़ से डर रही हैएक टूटी हुई कंघी सेमिरे बाल उलझे हुए हैंऔर किनारे पे रक्खी हुईसुराही से प्यास की बूरिस रही हैकिसी घड़ियाल की टूटी हुई सूईइक अज़ाब-लम्हे में मुर्तइश हैऔर क़रीब हीमेरे जज़्बों के तालाब सेबास उठ रही हैऔर तमाश-बीन,जौक़-दर-जौक़ मेरे अजाइब-ख़ाने कोदेखने को आ रहे हैंइन में से कोई तमाश-बीनइस अजाइब-ख़ाने कीसाँस लेती हुई मौत कोतज़हीक से देख करनज़र-अंदाज़ करता हुआ जा रहा हैऔर कोई अजाइबात का शौक़ीनइन तमाम अश्या पे तहक़ीक़ कर केअपना-आप साबित करना चाहता हैमगर उन को धूल में पड़ी हुईतारीख़ की उलझी हुई डोर काकोई सिरा नहीं मिल रहा हैऔर में किनारे पे खड़ी हुईअपने उसी एक सिरे के मिलने की मुंतज़िर हूँकि मिरा वजूद देखते ही देखतेएक अजाइब-ख़ाने में ढल चुका है
ब-ज़ोम-ए-ख़्वेश अपने दौर के सुक़रात-ए-सानी हैंमुक़द्दस लोग हैं 'अहमद-रज़ा-ख़ाँ’ की निशानी हैंग़ुलामान-ए-रसूलुल्लाह की तकफ़ीर करते हैंहमेशा इंशिराह-ए-सद्र से तक़रीर करते हैंज़बान-आवर हैं लेकिन ज़ाहिदा परवीन की लय हैंकई नादिर किताबों के मुसन्निफ़ हैं बड़ी शय हैंरऊनत से जबीं में ज़ोह्द के असरार घुलते हैंनिगाहों के ग़ज़ब से सैंकड़ों अल्फ़ाज़ खुलते हैंतकब्बुर ज़ाविए बनता हुआ गुफ़्तार की लौ मेंहज़ारों ख़ुसरुओं का दबदबा रफ़्तार की रो मेंज़बान-ए-शुस्ता-ओ-रफ़्ता पे नस्तालीक़ बोली हैमुसल्ले पर मुरादाबाद के पानों की ढोली हैब-ज़ोम-ए-ख़्वेश ज़ोह्द-ओ-इत्तिक़ा के बीज बोते हैंख़ुदा के फ़ज़्ल से हूरों के शौहर ऐसे होते हैं
ये दिल्ली हैये पहली बार पांडव ने बसाई थीइसे देखा तो दुर्योधन हसद से खौल उठा थायहीं वो शेर-दिल चौहान रहता थाजिसे आवाज़ पर अपना निशाना दाग़ने का कश्फ़ आता थानिज़ामुद्दीन से रूहानियत का दर्स ले करवज्द-ए-ख़ुसरव ने इसी के गीत गाए थेहुमायूँ ने इसी की ख़ाक में ख़ुद को मिलाया थाइसी के दिल की नाज़ुक धड़कनों को 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' ने ज़बाँ दी थीये अपनी ज़ात में इक मुख़्तसर हिन्दोस्ताँ या'नीये रोहीलों की नादिर शाह की रौंदी हुई दिल्लीइक ऐसा शहर है जो बारहा उजड़ा मगर जिस नेकभी अपनी अदा-ए-दिल-नवाज़ी को नहीं छोड़ाइसे तख़रीब के हर वार ने ता'मीर का इरफ़ान बख़्शा हैयहाँ हर ज़ुल्म करने वाला आख़िर मुँह की खाता हैये हर वक़्त एक अलबेली दुल्हन की मिस्लअपनी माँग में सिंदूर भर कर मुंतज़िर रहती है हर आज़ुर्दा-ख़ातिर कीयहाँ हर साहिब-ए-दिल आ के जाना भूल जाता है
वक़्त की गोद में सूखे बच्चेचार-सू घूमते लाग़र राँझेनए चंगेज़ नए नादिर-शाहआहन हो शरबा के शब-दीज़काहिन मकतब-ए-नख़शब केफ़ुसूँ-कार बगूले हैं किसरसाम के सर चश्मे हैंगूँजते शहपर-ए-आसेब के ख़ूनी पंजेआदम-ए-शाएक़-ए-फ़ितरत के लिएक़ुफ़्ल अबजद भी हैंज़ंजीरें भीरूप की नगरी में बहरूप के ताजिर आएदूर देसों के फ़ुसूँ-कारज़र काग़ज़ राहत के लिएचार-सू कुश्तों के पुश्ते भी लगे हैं देखोकिस क़दर ख़ून-बहा बाक़ी हैआँखें पथराई हैं माओं कीग़ुलामान-ए-रुसूम-ए-अमवाजअपनी अक़्लीम की मेराजकहाँ बैठे हैंज़र्रे ज़र्रे से निकलते हैं अँधेरे बिच्छू
मिरे अंदर है क्या बाहर है क्यामुझ को नहीं मालूम लेकिन कुछ तो होगा जिस की ख़ातिरकोई मुझ को खोलता है बंद करता हैमैं अक्सर सोचता हूँ मेरे पीछे भीकोई गंज-ए-गिराँ-माया हैकोई बे-बहा नादिर ख़ज़ाना हैजभी तो लोग मुझ पर क़ुफ़्ल के पहरे बिठाते हैं
याद है मुझ को जब मैं चढ़ करएक पहाड़ी की चोटी परशाख़ पे एक दरख़्त के बैठाकरता था मैं तेरा नज़ाराकोसों तक वो तेरा शेवाधानी माशी का ही भूराकोसों तक वो तेरे मैदाँसुथरे साफ़ चटीले मैदाँछिटकी छिटकी झाड़ियाँ उस परक़ुदरत की गुल-कारियाँ उस परताल तलैयाँ दरिया रेतीबाग़ चमन आबादी खेतीऐसे थे सब मेरी नज़र मेंपाएँ बाग़ हो जैसे घर मेंजब मैं ये सब देख रहा थाख़ुश था दिल और ये कहता थाहद्द-ए-नज़र को और बढ़ाऊँऐसी बुलंदी पर चढ़ जाऊँऐसी चोटी पर जा बैठूँ मैंसाफ़ जहाँ से देख सकूँ मैंशहर और सूबे गाँव और क़स्बेबिखरे बिखरे छिटके छिटकेसारा क़ुदरत का फ़र्नीचरमेरे आगे आए सिमट करसारी इंसानी आबादीया'नी दुनिया की आबादीमेरे आगे खेल रही होरोती गाती और हँसती होइस मह्विय्यत में जब मैं थामुझ को हुआ मालूम कि गोयाकोई मुझ को खींच रहा हैचौंक पड़ा मैं कौन है क्या है
ये तुम सबकि जिन के सरों में जवानी का ख़ूँ लहलहाता हैमुझ से रसीद अपनी मेहनत की भी लेते जाओमोहब्बत के बारे में जो भी किसी ने बताया हैपूरी हक़ीक़त नहींक्यूँकि चाहत रिवायत नहींतज्रबा हैहक़ीक़त में हर आदमी मोहतरम हैवो ख़ुद उस की जब तक न तरदीद कर देये पहले भी मैं ने कहा थातुम्हारे लबों से जो कानों को पहुँचेवो हर्फ़ इस्म-ए-आज़म होदेखो वहीजिस में कल की बशारतहिदायत हर इक ख़ैर कीताज़ा एहसास की रौशनी होजो कानों में उतरेतुम उस में से अमृत निथारोकि अमृत में दिल रूह और ज़ह्न कीतीस बीमारियों की शिफ़ा हैज़बाँ पर वो तासीर रखनाकि जिस से ज़माने को ख़ुद अपनी पहचान होअपने हर इल्म को आप ही देखना और अपनी ज़बाँ से ही पढ़नाज़माने को छूनाकि हर नस्ल ने जो हक़ाएक़ तराशेवो अपने ही हाथों घड़े हैंकि हर अहद ने आग को छू के ही आग मानाये तुम भी करोगेये सब तुम भी करनाकिताबों को बस सूँघना छोड़ देनाये कुल्ली सदाक़त नहीं हैंतुम्हारे ज़माने से पहले के लिखे हुए नादिर औराक़कल की हर इक पेश-बीनी से आरी हैंइन सब किताबों के पहले वरक़सिर्फ़ इस वास्तेख़ाली रक्खे गए हैंकि तुम इन पे अपने ज़माने की सच्चाइयाँ लिख के जाओहम ऐसों की ख़ातिरजिन्हें कल तुम्हारा लिखा पढ़ के फिर याद करना हैआते हुओं को सुनाना है
बहुत दिन हुएएक तालाब के पास मैं ने परिंदों को देखाफ़लक पर भटकते हुए चंद बादल थेऔर सुब्ह की धूप में हल्की हल्की सी ठंडकवहाँ गहरे तालाब के पास ऊँचे दरख़्तों की इस ओट मेंधूप की ठंडी ठंडी सी किरनों से लिपटे हुए सब्ज़ पत्तेदरख़्तों से तालाब में गिर रहे थेवहीं मैं ने देखा कि दुनिया के सारे परिंदेन जाने कहाँ से ज़मानों के फैले हुए फ़ासलों सेउभरते हैं तालाब के पास आ कर उतरते हैं और बोलते हैंवहीं मैं ने उन सब परिंदों को ऊँचे दरख़्तों पे नीली फ़ज़ाओं में तालाब के पानियों पर किनारों पे हर सम्त देखावो उड़ते हुए हंस गाती हुई बुलबुलें मोर सदियों के क़ासिद कबूतरवो ऐसे परिंदे भी जो अपने नामों को बस आप ही जानते हैंवो नादिर सदाएँ कि जैसे वो सदियों के असरार को खोलती हूँवो चहकार जैसे वो अन-देखी दुनियाओं से आ रही होपरिंदों की बोली के असरार को सीखते दिन कटा रात गुज़रीबहारें खिज़ाएँ पलट कर कई बार आईंबहुत दिन हुए मैं ने जब उन परिंदों को देखाऔर अब उन की ग़ैबी सदाओं के असरार को चार-सू देखता हूँमुझे इल्म है हर सदा दूर से आने वाली सदा हैहर इक शय में कोई इशारत निहाँ है
सफ़ीना-साज़ था वो लकड़ियाँ मैं काट लाती थीसो बस इक दिन कहा उस ने लकड़हारीअनोखे इक सफ़ीने की ही अब तख़्लीक़ बाक़ी हैमुझे दरकार है जिस के लिए नादीदा जंगल कीखनकती सुरमई लकड़ीअगर तू ढूँड लाए तोबना सकता हूँ मैं नादिर सफ़ीना इकमैं उस की बात सुनते ही यकायक चौंक उट्ठी फिरनज़र भर कर उसे देखा ज़रा सा मुस्कुराई औरकिसी नादीदा जंगल की तरफ़ चलने लगी पैहमन-जाने कितने मीलों की मसाफ़त पर खड़ी हूँ परकोई नादीदा जंगल ही नहीं मिलताखनकती सुरमई लकड़ीकहाँ से हाथ आएगीमगर अब सोचती हूँ कि सफ़ीना-साज़ को मेरे किसी सरसब्ज़ जंगल की खनकती सुरमई लकड़ी यक़ीनन मिल गई होगी
मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजातमैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहोअपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मिरे लिएबाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो
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