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नज़्म
सैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी
सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ज़बान-आवर हैं लेकिन ज़ाहिदा परवीन की लय हैं
कई नादिर किताबों के मुसन्निफ़ हैं बड़ी शय हैं