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नज़्म
तू गर मेरी भी हो जाए
दुनिया के ग़म यूँही रहेंगे
पाप के फंदे ज़ुल्म के बंधन
अपने कहे से कट न सकेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
यहाँ की घाटियों में हुस्न के चश्मे उबलते हैं
यहाँ हर चीज़ पर जज़्बात-ए-इंसानी मचलते हैं
मयकश अकबराबादी
नज़्म
जब जंग के बादल छाए थे
दुश्मन सरहद पर आए थे
कुछ टैंक तोप भी लाए थे
फिर तो वो मुँह की खाए थे