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नज़्म
पहन ओढ़ कर पैरहन की तरह फाड़ दी हैं
में रेशम का कीड़ा हूँ कोए में छप जाता हूँ डर के मारे
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
और बस में चारों जानिब बैठे लोगों की ये भूकी नज़रें
उस के कपड़े फाड़ के जिस्म के अंदर तक