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नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मैं राहों का
मुक़द्दर हूँ
सितम देखो
मिरे सीने पे फोड़े फुंसियाँ अब भी
गढ़ों की शक्ल में
फैली हुई हैं
ग़यास मतीन
नज़्म
फिर दुनिया वालों ने तुम से
ये साग़र ले कर फोड़ दिया
जो मय थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर तोड़ दिया