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नज़्म
जब माह अघन का ढलता हो तब देख बहारें जाड़े की
और हँस हँस पूस सँभलता हो तब देख बहारें जाड़े की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इन अमीरों के मोहल्लों को ज़रा सा छोड़ कर
पास की कच्ची सी बस्ती में कभी चलिए हुज़ूर
मारूफ़ रायबरेलवी
नज़्म
क़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहीं
कुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रा
पस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने रा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस राह में जो सब पे गुज़रती है वो गुज़री
तन्हा पस-ए-ज़िंदाँ कभी रुस्वा सर-ए-बाज़ार