aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ramzaan"
ज़हे-क़िस्मत हिलाल-ए-ईद की सूरत नज़र आईजो थे रमज़ान के बीमार उन सब ने शिफ़ा पाई
मैं हूँ रोज़ा तो फिर इफ़्तार तू हैमहीना मैं अगर रमज़ान का तो
माह-ए-रहमत की ख़बर किस के लिए लाया है तूकौन तेरा मुंतज़िर था किस लिए आया है तू
रमज़ान आयाहर दिल पे छाया
पकड़े लाठी को मटकते चले रमज़ानी मियाँपीछे से बच्चों का इक गोल चला ईद के रोज़
दर्स-ए-इंसानियत जिस से मिलता है 'शौक़'ईद-ए-रमज़ाँ है अम्न-ओ-अमाँ का निशाँ
अकड़ शाह बेहद परेशान थाकि अब जा रहा माह-ए-शाबान था
फिर आज्ञा जहाँ में रमज़ान का महीनाअल्लाह के करम और एहसान का महीना
देख के बदलियाँ रमज़ान मुसलसल भागाखींच के लाई हवा मेंह का आबी धागा
रहमत भरा सफ़ीनारमज़ान का महीना
तब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी है
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलोदस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलो
बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा हैकि तेरी माँग सितारों से भर गई होगी
कानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा हो
हक़ बात पे कोड़े और ज़िंदाँ बातिल के शिकंजे में है ये जाँइंसाँ हैं कि सहमे बैठे हैं खूँ-ख़्वार दरिंदे हैं रक़्साँ
जो है वो भी खो सकता हैइस राह में रहज़न हैं इतने
राम कब लौटेंगे मालूम नहींकाश रावण ही कोई आ जाता
इस माल की धुन में फिरते थेताजिर भी बहुत रहज़न भी कई
मोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी है
हमराह हमारे थेरहरव थे कि रहज़न थे
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