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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हवा गर हिज्र की साज़िश में हिस्से-दार बन कर दरमियाँ आए
हिज्र के पर भीग जाएँ और
हवा पानी में मिल जाए
नोशी गिलानी
नज़्म
निगाह-ए-बद से देखा है किसी ने गर गुलिस्ताँ को
तो गुल-ची की हर इक साज़िश हमीं को साज़गार आई
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
नाम ले कर देश-भक्ति का जो ख़ूँ-रेज़ी करे
कैसी साज़िश कैसी नफ़रत उस दिल-ए-क़ातिल में है