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नज़्म
मगर इक बात पूछूँ तुम ख़फ़ा तो हो न जाओगे
ये आख़िर क्या सबब है आज कल नज़्में नहीं लिखते
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
कि अपनी इज़्ज़त पे नाम धरने से कोई भी फ़ाएदा नहीं है
अगर कभी मैं जुदाइयों का सबब बताऊँ
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
कुछ लोग कहते हैं बहुत तन्हा रहना भी उदासी का सबब बन जाता है
मुमकिन है ये भी ठीक हो