aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "said"
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमीऔर मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमीज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमीनेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमीटुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमीअब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुएमुंकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरेक्या क्या करिश्मे कश्फ़-ओ-करामात के लिएहत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर सेख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमीफ़िरऔन ने किया था जो दावा ख़ुदाई काशद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदानमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमलाये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्यायाँ तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमीकुल आदमी का हुस्न ओ क़ुबह में है याँ ज़ुहूरशैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोरऔर हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमीमस्जिद भी आदमी ने बनाई है याँ मियाँबनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा-ख़्वाँपढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँऔर आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँजो उन को ताड़ता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी पे जान को वारे है आदमीऔर आदमी पे तेग़ को मारे है आदमीपगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमीचिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमीऔर सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमीचलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के मालऔर आदमी ही मारे है फाँसी गले में डालयाँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जालसच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लालऔर झूट का भरा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही शादी है और आदमी बियाहक़ाज़ी वकील आदमी और आदमी गवाहताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह-मख़ाहदौड़े हैं आदमी ही तो मशअ'ल जला के राहऔर ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बारऔर आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवारहुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मारकाँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहारऔर उस में जो पड़ा है सो है वो भी आदमीबैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगाऔर आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़ूनचाकहता है कोई लो कोई कहता है ला रे लाकिस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बनाऔर मोल ले रहा है सो है वो आदमीतबले मजीरे दाएरे सारंगियाँ बजागाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जारंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगाऔर आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ाजो नाच देखता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही लाल-ओ-जवाहर में बे-बहाऔर आदमी ही ख़ाक से बद-तर है हो गयाकाला भी आदमी है कि उल्टा है जूँ तवागोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चाँद-साबद-शक्ल बद-नुमा है सो है वो भी आदमीइक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैंरूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैंझमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैंकम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैंऔर चीथडों लगा है सो है वो भी आदमीहैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग हैऔर आदमी ही चोर है और आपी थांग हैहै छीना झपटी और बाँग ताँग हैदेखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग हैफ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमीमरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तयारनहला-धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवारकलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ारसब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबारऔर वो जो मर गया है सो है वो भी आदमीअशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीरये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीरयाँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीरअच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'और सब में जो बुरा है सो है वो भी आदमी
तो क्या वो झूट थातू ने जो उस लड़की से बोला थामैं तेरी झील जैसीनीली आँखों पर ग़ज़ल के शे'र लिक्खूंगामैं तेरी रेशमी ज़ुल्फ़ों मेंअपनी नज़्म के मोती पिरोउँगामैं तेरी दूधिया रंगत कलाई मेंतिलाई चूड़ियों ऐसेखनकते गीत पहनाने का ख़्वाहाँ हूँमुझे मा'लूम है फ़ुर्सत नहीं मिलतीबहुत से और मौज़ूआत भीमाना ज़रूरी हैंमगर उस से किया वा'दाभला क्या कम ज़रूरी हैतू ऐसा करकोई अपनी पुरानी नज़्म उस के नाम कर देयाग़ज़ल के शे'र में रद्द-ओ-बदल कर केकिसी सूरत भी उस का तज़्किरा कर देजो तेरी शाइरी के आइने के सामनेसिंघार करने बैठ जाती हैनहींमुझ से तो ऐसा भी नहीं मुमकिनउसे मेरी सभी नज़्मेंसभी ग़ज़लेंज़बानी याद होती हैंउसे तो मेरी वो ग़ज़लें भी अज़बर हैंजो मैं नेजा के सदियों बा'द कहनी हैंमैं उन याक़ूत होंटों परफ़क़तख़ामोशियाँ ही सब्त करता हूँ
ये दौर-ए-नौ-मुबारक फ़र्ख़न्दा-अख़तरी काजम्हूरियत का आग़ाज़ अंजाम क़ैसरी काक्या जाँ-फ़ज़ा है जल्वा ख़ुर्शीद-ए-ख़ावरी काहर इक शुआ-ए-रक़्साँ मिस्रा है अनवरी कारोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी कादौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का
ऐ फ़ल्सफ़ा-गो,कहाँ वो रूया-ए-आसमानी?कहाँ ये नमरूद की ख़ुदाई!तू जाल बुनता रहा है, जिन के शिकस्ता तारों से अपने मौहूम फ़लसफ़े केहम उस यक़ीं से' हम उस अमल से' हम उस मोहब्बत से'आज मायूस हो चुके हैं!कोई ये किस से कहे कि आख़िरगवाह किस अदल-ए-बे-बहा के थे अह्द-ए-तातार के ख़राबे?अजम, वो मर्ज़-ए-तिलिस्म-ओ-रंग-ओ-ख़्याल-ओ-नग़माअरब, वो इक़लीम-ए-शीर-ओ-शहद-ओ-शराब-ओ-खुर्माफ़क़त नवासंज थे दर-ओ-बाम के ज़ियाँ के,जो उन पे गुज़री थीउस से बद-तर दिनों के हम सैद-ए-नातवाँ हैं!कोई ये किस से कहे:दर-ओ-बाम,आहन ओ चोब ओ संग ओ सीमाँ केहुस्न-ए-पैवंद का फ़ुसूँ थेबिखर गया वो फ़ुसूँ तो क्या ग़म?और ऐसे पैवंद से उमीद-ए-वफ़ा किसे थी!
रेस्तौरान की रंगा-रंग रौशनियों मेंडूबा समर के ख़ूबसूरत गीत की मद्धम लय मेंमेरे सामने बैठी उदास चेहरे वाली ऐ ख़ूबसूरत लड़कीअब पीछे मुड़ के मत देखोदेखो तो हमारे सामने रास्ता कितना ख़ूबसूरत हैहमारे सरों पर सुख और शांति का कितना गहरा बादल है
और तुम नहीं आतेचाँद डूब जाता हैउम्र बीत जाती हैइंतिज़ार की बाज़ीरात जीत जाती हैजब्र का कड़ा लम्हाआस का बुझा ताराशाम-ए-हिज्र का दरियामुझ में डूब जाता हैऔर तुम नहीं आते
मेरे आज़ाद वतन तेरी बहारों को सलामतेरी पुर-कैफ़ फ़ज़ा तेरे नज़ारों को सलामजिन की ख़िदमात से चमकी है वतन की क़िस्मतजगमगाते हुए उन चाँद सितारों को सलामकारवाँ जिन का लुटा राह में आज़ादी कीक़ौम का मुल्क का उन दर्द के मारों को सलामलिख गए अपने लहू से जो वफ़ा के क़िस्सेउन शहीदों पे दरूद उन के मज़ारों को सलाम'ताहिरा' सालगिरह आज है आज़ादी कीहिन्द के ख़ुर्द-ओ-कलाँ साथियों प्यारों को सलाम
कितनी मीठी ज़बाँ कैसी प्यारी ज़बाँमेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँइस में राधा के पायल की झंकार हैज़ुल्फ़-ए-ज़ेब-उन-निसा की भी महकार हैइस में झांसी की रानी की ललकार हैसाज़-ओ-नग़्मा के हम-राह तलवार हैउस के दामन में हैं कितनी रंगीनियाँमेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ
लब-ए-ज़र्द परकोई हम्द है कि गिलाकहोमिरी पीली आँख मेंबुझते ख़ूँ काअलाव है कि तिलाकहोमिरे दस्त-ओ-बाज़ूमें आज भीकोई लम्स क़ैद हैऔर सीने कीबे-वक़ारीके अंदरूँकोई हर्फ़ अपना ही सैद हैकि जिसे रसाईन मिल सकीये मिरी झिझक कीबुरीद है कि सिलाकहोकभी एक बात न कह सकूँकभी अब कि चीख़मुझे चाहिए वहीदूद दूद साएक क़ुर्ब के दरमियाँकोई ख़्वाब ख़्वाब साफ़ासलाकोई आज मुझ सेवो बात पूछेकि जिस के म'अनी-ए-दूरजानता हूँ मैं अबकि हज़ार शोलोंकी राख परकिसी बूँद आँसूके सैल मेंये गँवाए रिश्तोंका सर्द फूल खिलाकहोलब-ए-ज़र्द परकोई हम्द है कि गिलाकहो!
जिन्हें ज़ेर कर न सका सितम हुए सैद-ए-सिलसिला-ए-करमतिरी नेकियों ने तिरी क़सम सर-ए-ख़ुद-सरी को झुका दिया
हवा के हाथों में हाथ दे करजुदाइयों के सफ़र पे निकले थे तुममगर क्यूँरुके हुए होयक़ीन-ए-ख़ुफ़्ता गुमान-ए-पुख़्ता के पानियों परजहाँ पे अव्वल मोहब्बतों के कँवल खिले थेअभी वहीं हो!जुदाइयों के सफ़र पे जा कर भी अब तलक तुमगए नहीं हो!चले भी जाओचले भी जाओकि गुम-शुदा ज़ात के ख़ज़ीने की कुंजियाँ ढूँडनी हैं मैं नेसुकूत-ए-सौत-ओ-सदा के पर्दे में तर्ज़-ए-गुफ़्तार सीखनी हैनिकल के मौजूदा वक़्त के बे-दरीचा बे-दर हवेलियों सेमुझे मुलाक़ात सोचनी हैबहुत सी बे-नाम ग़ैर महदूद साअतों की सहेलियों से
खरी बातों का ज़ाइक़ा तुर्श होता हैब-हैसियत इंसानऔरत की ज़रूरतकिसी मर्द को नहींवो गिरवी रखी जाएया बेच दी जाएकिराए पे ली जाएया यक-मुश्त ख़रीद ली जाएउस के ख़यालात कीबंदर-बाँट मुमकिन नहींहुक्म की पाबंदी का तौक़ पहन करजीवन की कुटिया काकिराया अदा करते हुएअगर औरत कमा सकती तोलाती मर्द के लिए ख़रीद करवो हौसलाकि जिस से वो अपना चेहराउस के ख़याल आईने में देख सकताना-ख़ुश तमाम बातों कोइंसाफ़ के पलड़े में तौल सकताअदम-ए-तहफ़्फ़ुज़ के पिंजरे मेंतीसरे दर्जे के क़ैदी की हैसियत सेअगर औरत कमा सकती तोलाती मर्द के लिए ख़रीद करवो मोहब्बतजो उस की फ़ितरी ज़रूरत से मावरा होतीअगर औरत कमा सकती तो
ज़िंदगी इस तरह गुज़रती हैजिस तरह जून के महीने मेंकोई बूढ़ा ग़रीब परदेसीलाख अरमाँ दबाए सीने मेंबोझ से चूर और थकन से निढालहाँफता-काँपता पसीने मेंऊँचे महलों तले गुज़रता होऔर हर-गाम आह भरता हो
धूप से दर्द तकरंग से नाम तकसब्ज़ आग़ाज़ सेसुर्ख़ अंजाम तकसैद से दाम तक
शाहिद-ए-बज़्म-ए-सुख़न नाज़ूरा-ए-मअ'नी-तराज़ऐ ख़ुदा-ए-रेख़्ता पैग़मबर-ए-सोज़-अो-गुदाज़यूसुफ़-ए-मुल्क-ए-मआनी पीर-ए-कनआ'न-ए-सुख़नहै तिरी हर बैत अहल-ए-दर्द को बैत-उल-हुज़नऐ शहीद-ए-जलवा-ए-मानी फ़क़ीर-ए-बे-नियाज़इस तरह किस ने कही है दास्तान-ए-सोज़-अो-साज़है अदब उर्दू का नाज़ाँ जिस पे वो है तेरी ज़ातसर-ज़मीन-ए-शेर पर ऐ चश्मा-ए-आब-ए-हयाततफ़्ता-दिल आशुफ़्ता-सर आतिश-नवा बे-ख़ेशतनआह तेरी सीना-सोज़ और नाला तेरा दिल-शिकनख़त्म तुझ पर हो गया लुत्फ़-ए-बयान-ए-आशिक़ीमर्हबा ऐ वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहान-ए-आशिक़ीसर-ज़मीन-ए-शेर काबा और तू इस का ख़लीलशाख़-ए-तूबा-ए-सुख़न पर हमनवा-ए-जिब्रईलजोश-ए-इस्तिग़्ना तिरा तेरे लिए वजह-ए-नशातशान-ए-ख़ुद्दारी तिरी आईना-दार-ए-एहतियातबज़्म से गुज़रा कमाल-ए-फ़क़्र दिखलाता हुआताज-ए-शाही पा-ए-इस्ति़ग़ना से ठुकराता हुआथा दिमाग़-ओ-दिल में सहबा-ए-क़नाअत का सुरूरथी जवाब-ए-सतवत-ए-शाही तिरी तब-ए-ग़यूरमौजा-ए-बहर-ए-क़नाअत तेरी अबरू की शिकनतख्त-ए-शाही पर हसीर-ए-फ़क़्र तेरा ख़ंदा-ज़नथा ये जौहर तेरी फ़ितरी शाइरी के रूतबा-दाँइज़्ज़त-ए-फ़न थी तिरी नाज़ुक-मिज़ाजी में निहाँमुल्तफ़ित करता तुझे क्या अग़निया का कर्र-ओ-फ़र्रथा तिरी रग रग में दरवेशों की सोहबत का असरदिल तिरा ज़ख़्मों से बज़्म-ए-आशिक़ी में चूर हैजिस सुख़न को देखिए रिसता हुआ नासूर हैबज़्म-गाह-ए-हुस्न में इक परतव-ए-फ़ैज़-ए-जमालसैद-गाह-ए-इश्क़ में है एक सैद-ए-ख़स्ता-हालदेखना हो गर तुझे देखे तिरे अफ़्कार मेंहै तिरी तस्वीर तेरे ख़ूँ-चकाँ अशआ'र मेंसैर के क़ाबिल है दिल सद-पारा उस नख़चीर काजिस के हर टुकड़े में हो पैवस्त पैकाँ तीर काआसमान-ए-शेर पर चमके हैं सय्यारे बहुतअपनी अपनी रौशनी दिखला गए तारे बहुतअहद-ए-गुल है और वही रंगीनी-ए-गुलज़ार हैख़ाक-ए-हिंद अब तक अगर देखो तजल्ली-ज़ार हैऔर भी हैं माअ'रके में शहसवार-ए-यक्का-ताज़और भी हैं मय-कदे में साक़ियान-ए-दिल-नवाज़हैं तो पैमाने वही लेकिन वो मय मिलती नहींनग़्मा-संजों में किसी से तेरी लय मिलती नहींसाहिबान-ए-ज़ौक़ के सीनों में थी जिस की खटकतैरते हैं दिल में वो सर-तेज़ नश्तर आज तककारवान-ए-रफ़्ता को था तेरी यकताई पे नाज़अस्र-ए-मौजूदा ने भी माना है तेरा इम्तियाज़हो गए हैं आज तुझ को एक सौ बाईस सालतो नहीं ज़िंदा है दुनिया में मगर तेरा कमालहक़ है हम पर याद कर के तुझ को रोना चाहिएमातम अपनी ना-शनासी का भी होना चाहिएढूँडते हैं क़ब्र का भी अब निशाँ मिलता नहींऐ ज़मीं तुझ में हमारा आसमाँ मिलता नहीं
एक मज़दूरकि जिस के बदन नेकई दिनों की अन-थक रियाज़तसीमेंट रेत और बजरी के बीच कटी थीएक प्याली चाय की तलबबेलचे की मिट्टी के साथ उछाली थीफ़िक्र-ए-अयाल कोलोहे की रेढ़ी पेईंटों के साथ धकेला थाचंद लम्हेसुस्ताने की ख़्वाहिश कोसब्र के हथौड़े से कूट डाला थातब जा कर कहींआख़िर कारआज अपनी दावत मनानी थीघर में मुर्ग़ी पकानी थीमगर चमकती किरोला कीदमकती मख़्लूक़ को क्या ख़बरबीच सड़क मेंजिस का शापर फटा थाजो ला-वारिस लाश की सूरत पड़ा थाआज उस नेअपनी दावत मनानी थीघर में मुर्ग़ी पकानी थी
अल-ग़रज़ इक न इक ग़म-ए-गुल-ओ-ख़ारफ़लसफ़े का ख़ुमार इश्क़ का बारदिल को इक सुब्ह-ओ-शाम का आज़ारहसरत-ए-सुल्ह-ओ-हसरत-ए-पैकारसैद-ए-इबलीस-ओ-कुश्ता-ए-यज़्दाँ
गेसुओं वालों में अबरू के कमान-दारों मेंएक सैद आ ही गया एक शिकार आ ही गया
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books