आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "samajhnaa"
नज़्म के संबंधित परिणाम "samajhnaa"
नज़्म
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कहाँ हैं वो कि जो ख़ुद को ख़ुदा समझते हैं
वो जो कि अम्न-ओ-अमाँ के फ़साने कहते हैं
शिफ़ा कजगावन्वी
नज़्म
हक़ीक़त को समझना चाहते हैं साल और सिन की
ये सब मजबूर हैं इन पर दर-ए-तौबा खुला रखना
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
समझना चाहिए मजबूरियाँ अहल-ए-चमन को सब्ज़ बेलों की
नुमू मुहताज है जिन की हमेशा इक सहारे की
शहनाज़ परवीन शाज़ी
नज़्म
मिज़ाज उन का समझना किसी के बस में नहीं
वफ़ा की बात पर ऐसी भी तुम से तू होगी