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नज़्म
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तू ने सर्द हवाओं की ज़बाँ सीखी है
तेरे ठंडे लम्स से धड़कनें यख़-बस्ता हुईं और मैं चुप हूँ