aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "suulii"
1वो सुब्ह कभी तो आएगीइन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगाजब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगाजब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीजिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैंजिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैंइन भूकी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमाना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहींमिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहींइंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीदौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगाचाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगाअपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीबीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी केटूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी केजब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगामासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगाहक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीफ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगेसीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगेये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगी2वो सुब्ह हमीं से आएगीजब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगेजब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगेउस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगीवो सुब्ह हमीं से आएगीमनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगेजब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगेजेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगीवो सुब्ह हमीं से आएगीसंसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगेबे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगेदुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगीवो सुब्ह हमीं से आएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगीउन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगाजब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख सागर छलकेगाजब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीजिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मरमर के जीते हैंजिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैंइन भूकी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमाना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहींमिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहींइंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तोली जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीदौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगाचाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगाअपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीबीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी केटूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी केजब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाए जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगामा'सूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगाहक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीफ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगेसीने के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगेये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बताई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगी
ख़ून थुकवातामुझे हर लम्हे की सूली पे लटकाता
टेक्स्ट जब आशिक़-ए-बर्क़ी का अटक जाता हैतालिब-ए-शौक़ तो सूली पे लटक जाता है
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुमलबों से जैसे गुलों की बारिशकि जैसे झरना सा गिर रहा होकि जैसे ख़ुश्बू बिखर रही होकि जैसे रेशम उलझ रहा होअजब बलाग़त थी गुफ़्तुगू मेंरवाँ था दरिया फ़साहतों कावो एक मकतब था आगही कावो इल्म-ओ-दानिश का मय-कदा थावो क़ल्ब और ज़ेहन का तसादुमजो गुफ़्तुगू में रवाँ-दवाँ थावो उस के अल्फ़ाज़ की रवानीवो उस का रुक रुक के बात करनावो शो'ला-ए-लफ़्ज़ और मआ'नीकहीं लपकना कहीं ठहरनाठहर के फिर वो कलाम करनाबहुत से जज़्बों की पर्दा-दारीबहुत से जज़्बों को आम करनाजो मैं ने पूछागुज़िश्ता शब के मुशाएरे में बहुत से शैदाई मुंतज़िर थेमुझे भी ये ही पता चला था कि आप तशरीफ़ ला रहे हैंमगर हुआ क्याज़रा तवक़्क़ुफ़ के बा'द बोले नहीं गया मैंन जा सका मैंसुनो हुआ क्यामैं ख़ुद को माइल ही कर न पायाये मेरी हालत मेरी तबीअ'तफिर उस पे मेरी ये बद-मिज़ाजी-ओ-बद-हवासीये वहशत-ए-दिलमियाँ हक़ीक़त है ये भी सुन लो कि अब हमारे मुशाएरे भीनहीं हैं उन वहशतों के हामिलजो मेरी तक़दीर बन चुकी हैंजो मेरी तस्वीर बन चुकी हैंजो मेरी तक़्सीर बन चुकी हैंफिर इक तवक़्क़ुफ़कि जिस तवक़्क़ुफ़ की कैफ़ियत पर गराँ समाअ'त गुज़र रही थीउस एक साअ'त का हाथ थामे ये इक वज़ाहत गुज़र रही थीअदब-फ़रोशों ने जाहिलों ने मुशाएरे को भी इक तमाशा बना दिया हैग़ज़ल की तक़्दीस लूट ली है अदब को मुजरा बना दिया हैसुख़न-वरों ने भी जाने क्या क्या हमारे हिस्से में रख दिया हैसितम तो ये है कि चीख़ को भी सुख़न के ज़ुमरे में रख दिया हैइलाही तौबासमाअ'तों में ख़राशें आने लगी हैं अब और शिगाफ़ ज़ेहनों में पड़ गए हैंमियाँ हमारे क़दम तो कब के ज़मीं में ख़िफ़्फ़त से गड़ गए हैंख़मोशियों के दबीज़ कोहरे से चंद लम्हों का फिर गुज़रनावो जैसे ख़ुद को उदासियों के समुंदरों में तलाश करनावो जैसे फिर सुरमई उफ़ुक़ पर सितारे अल्फ़ाज़ के उभरनाये ज़िंदगी से जो बे-नियाज़ी है किस लिए हैये रोज़-ओ-शब की जो बद-हवासी है किस लिए हैबस इतना समझोकि ख़ुद को बरबाद कर चुका हूँसुख़न तो आबाद ख़ैर क्या होमगर जहाँ दिल धड़क रहे हों वो शहर आबाद कर चुका हूँबचा ही क्या हैथा जिस के आने का ख़ौफ़ मुझ को वो एक साअ'त गुज़र चुकी हैवो एक सफ़हा कि जिस पे लिक्खा था ज़िंदगी को वो खो चुका हैकिताब-ए-हस्ती बिखर चुकी हैपढ़ा था मैं ने भी ज़िंदगी कोमगर तसलसुल नहीं था उस मेंइधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थीसमझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थीसमझता कैसेन फ़लसफ़ी मैं न कोई आलिमउक़ूबतों के सफ़र पे निकला मैं इक सितारा हूँ आगही काअजल के हाथों में हाथ डाले इक इस्तिआ'रा हूँ ज़िंदगी काइ'ताब नाज़िल हुआ है जिस पर मैं वो ही मा'तूब आदमी हूँसितमगरों को तलब है जिस की मैं वो ही मतलूब आदमी हूँकभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँमगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँमैं एक बेकल सा आदमी हूँ बहुत ही बोझल सा आदमी हूँसमझ रही है ये दुनिया मुझ को मैं एक पागल सा आदमी हूँमगर ये पागल ये नीम-वहशी ख़िरद के मारों से मुख़्तलिफ़ हैजो कहना चाहा था कह न पायाकहा गया जो उसे ये दुनिया समझ न पाईन बात अब तक कही गई हैन बात अब तक सुनी गई हैशराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या हैसुना है हम ने कि आप पर भी बहुत से फ़तवे लगे हैं लेकिनशराब-नोशी हराम है तोये मसअला भी बड़ा अजब हैमैं एक मय-कश हूँ ये तो सच हैमगर ये मय-कश कभी किसी के लहू से सैराब कब हुआ हैहमेशा आँसू पिए हैं उस ने हमेशा अपना लहू पिया हैये बहस छोड़ो हराम क्या है हलाल क्या है अज़ाब क्या है सवाब क्या हैशराब क्या हैअज़िय्यतों से नजात है ये हयात है येशराब-ओ-शब और शाइ'री ने बड़ा सहारा दिया है मुझ कोसँभाल रक्खा शराब ने और रही है मोहसिन ये रात मेरीइसी ने मुझ को दिए दिलासे सुनी है इस ने ही बात मेरीहमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोईमैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोईये शेर-गोई है ख़ुद-कलामी का इक ज़रीयाइसी ज़रीये इसी वसीले से मैं ने ख़ुद से वो बातें की हैंजो दूसरों से मैं कह न पायाहराम क्या है हलाल क्या है ये सब तमाशे हैं मुफ़्तियों केये सारे फ़ित्ने हैं मौलवी केहराम कर दी थी ख़ुद-कुशी भी कि अपनी मर्ज़ी से मर न पाएये मय-कशी भी हराम ठहरी कि हम को अपना लहू भी पीने का हक़ नहीं हैकि अपनी मर्ज़ी से हम को जीने का हक़ नहीं हैकिसे बताएँज़मीर-ओ-ज़र्फ-ए-बशर पे मौक़ूफ़ हैं मसाइलसमुंदरों में उंडेल जितनी शराब चाहेन हर्फ़ पानी पे आएगा और न उस की तक़्दीस ख़त्म होगीतो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखोकि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीनाये नुक्ता-संजी ये नुक्ता-दानी जो मौलवी की समझ में आती तो बात बनतीन दीन-ओ-मज़हब को जिस ने समझा न जिस ने समझा है ज़िंदगी कोतहूरा पीने की बात कर के हराम कहता है मय-कशी कोजो दीन-ओ-मज़हब का ज़िक्र आया तो मैं ने पूछाकि इस हवाले से राय क्या हैये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला हैजो इक ख़ला है ये क्या बला हैये दीन-ओ-मज़हब फ़क़त किताबेंब-जुज़ किताबों के और क्या हैकिताबें ऐसी जिन्हें समझने की कोशिशें कम हैं और ज़ियादा पढ़ा गया हैकिताबें ऐसी कि आम इंसाँ को इन के पढ़ने का हक़ है लेकिनइन्हें समझने का हक़ न हरगिज़ दिया गया हैकि इन किताबों पे दीन-ओ-मज़हब के ठेकेदार इजारा-दारों की दस्तरस हैइसी लिए तो ये दीन-ओ-मज़हब फ़साद-ओ-फ़ित्ना बने हुए हैंये दीन-ओ-मज़हबजो इल्म-ओ-हिकमत के साथ हो तो सुकून होगाजो दस्तरस में हो जाहिलों की जुनून होगाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये ज़िंदगी का जवाज़ क्या हैये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँये राज़ क्या हैहै क्या हक़ीक़त मजाज़ क्या हैसिवाए ख़्वाबों के कुछ नहीं हैब-जुज़ सराबों के कुछ नहीं हैये इक सफ़र है तबाहियों का उदासियों की ये रहगुज़र हैन इस को दुनिया का इल्म कोई न इस को अपनी कोई ख़बर हैकभी कहीं पर नज़र न आए कभी हर इक शय में जल्वा-गर हैकभी ज़ियाँ है कभी ज़रर हैन ख़ौफ़ इस को न कुछ ख़तर हैकभी ख़ुदा है कभी बशर हैहुआ हक़ीक़त से आश्ना तो ये सू-ए-दार-ओ-रसन गया हैकभी हँसा है ये ज़ेर-ए-ख़ंजर कभी ये सूली पे हँस दिया हैकभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया हैकभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरियाकभी ये तक़्दीर-ए-दश्त-ओ-सेहरारक़म हुआ है ये आंसुओं मेंकभी लहू ने है इस को लिक्खाहिकायत-ए-दिल हिकायत-ए-जाँ हिकायत-ए-ज़िन्दगी यही हैअगर सलीक़े से लिक्खी जाए इबारत-ए-ज़िन्दगी यही हैये हुस्न है उस धनक की सूरतकि जिस के रंगों का फ़ल्सफ़ा ही कभी किसी पर नहीं खुला हैये फ़ल्सफ़ा जो फ़रेब-ए-पैहम का सिलसिला हैकि इस के रंगों में इक इशारा है बे-रुख़ी काइक इस्तिआ'रा है ज़िंदगी काकभी अलामत है शोख़ियों कीकभी किनाया है सादगी काबदलते मौसम की कैफ़ियत के हैं रंग पिन्हाँ इसी धनक मेंकशिश शरारत-ओ-जाज़बिय्यत के शोख़ रंगों ने इस धनक को अजीब पैकर अता किया है इक ऐसा मंज़र अता किया हैकि जिस के सेहर-ओ-असर में आ करलहू बहुत आँखें रो चुकी हैं बहुत तो बीनाई खो चुकी हैंबसारतें क्या बसीरतें भी तो अक़्ल-ओ-दानाई खो चुकी हैंन जाने कितने ही रंग मख़्फ़ी हैं इस धनक मेंबस एक रंग-ए-वफ़ा नहीं हैंइस एक रंगत की आरज़ू ने लहू रुलाया है आदमी कोयही बताया है आगही कोये इक छलावा है ज़िंदगी काहसीन धोका है ज़िंदगी कामगर मुक़द्दर है आदमी काफ़रेब-ए-गंदुम समझ में आया तो मैं ने जानाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये एक लग़्ज़िश है जिस के दम से हयात-ए-नौ का भरम खुला है
इल्म सूली पे चढ़ा तब कहीं तख़्मीना बनाज़हर सदियों ने पिया तब कहीं नौशीना बना
अग्नी माँ से भी न जीने की सनद जब पाईज़िंदगी के नए इम्कान ने ली अंगड़ाईऔर कानों में कहीं दूर से आवाज़ आईबुद्धम् शरणम् गच्छामिधम्मम् शरणम् गच्छामिसंघम् शरणम् गच्छामिचार अबरू का सफ़ाया कर केबे-सिले वस्त्र से ढाँपा ये बदनपोंछ के पत्नी के माथे से दमकती बिंदियासोते बच्चों को बिना प्यार किएचल पड़ा हाथ में कश्कोल लिएचाहता था कहीं भिक्शा ही में जीवन मिल जाएजो कभी बंद न हो दिल को वो धड़कन मिल जाएमुझ को भिक्शा में मगर ज़हर मिलाहोंट थर्राने लगे जैसे करे कोई गिलाझुक के सूली से उसी वक़्त किसी ने ये कहातेरे इक गाल पे जिस पल कोई थप्पड़ मारेदूसरा गाल भी आगे कर देतेरी दुनिया में बहुत हिंसा हैउस के सीने में अहिंसा भर देकि ये जीने का तरीक़ा भी है अंदाज़ भी हैतेरी आवाज़ भी है मेरी आवाज़ भी हैमैं उठा जिस को अहिंसा का सबक़ सिखलानेमुझ को लटका दिया सूली पे उसी दुनिया ने
तुम ख़ुदा होख़ुदा के बेटे होया फ़क़त अम्न के पयम्बर होया किसी का हसीं तख़य्युल होजो भी हो मुझ को अच्छे लगते होमुझ को सच्चे लगते होउस सितारे में जिस में सदियों केझूट और किज़्ब का अँधेरा हैउस सितारे में जिस को हर रुख़ सेरेंगती सरहदों ने घेरा हैउस सितारे में जिस की आबादीअम्न बोती है जंग काटती हैरात पीती है नूर मुखड़ों कासुब्ह सीनों का ख़ून चाटती हैतुम न होते तो जाने क्या होतातुम न होते तो उस सितारे मेंदेवता राक्शस ग़ुलाम इमामपारसा रिंद राहबर रहज़नबरहमन शैख़ पादरी, भिक्षुसभी होते मगर हमारे लिएकौन चढ़ता ख़ुशी से सूली पर
बोझ से अपने उस की कमर झुक गईक़द मगर और कुछ और बढ़ता रहाख़ैर-ओ-शर की कोई जंग होज़िंदगी का हो कोई जिहादवो हमेशा हुआ सब से पहले शहीदसब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा
बरगद के नीचे बैठो या सूली चढ़ जाओभैंसे लड़ने से बाज़ नहीं आएँगेमौत से हम ने एक तआवुन कर रक्खा हैसड़कों पर से हर लम्हा इक मय्यत जाती हैपस-मंज़र में क्या होता है नज़र कहाँ जाती हैसामने जो कुछ है रंगों आवाज़ों चेहरों का मेला है!
कौन है जिस ने मिरे क़ल्ब की धड़कन धड़कनअपने एहसास की सूली पे चढ़ा रक्खी हैमेरी रफ़्तार के पुर-ख़ाैफ़-ओ-ख़तर रस्ते मेंकिस ने आवाज़ की दीवार बना रक्खी हैसंग-ए-आवाज़ की दीवार गिराऊँ कैसेकुछ किया जाए न सोचा जाएमुड़ के देखूँ तो न देखा जाए
अज़ीम काम करूँ कोई एक दिन सोचाकि रहती दुनिया में अपना भी नाम रह जाएमगर वो काम हो क्या ज़ेहन में नहीं आयापयम्बरी तो ज़ियाँ जान का है दावा क्यातू जाने सूली पे चढ़ना हो या चलें आरेकि ज़िंदा आग की लपटों की नज़्र होना पड़ेख़याल आया फ़ुनून-ए-लतीफ़ा ढेरों हैंसनम-तराशी है नग़्मागरी कि नक़्क़ाशीये सब ही दाइमी शोहरत का इक वसीला हैंमगर न लफ़्ज़ों पे क़ुदरत न रंग क़ाबू मेंफिर इक ज़रिया सियासत है नाम पाने काअलावा नाम के मोहरे बना के लोगों कोबिसात-ए-अर्ज़ पे शतरंज खेल सकते हैंमगर ये फ़न भी मिरी दस्तरस से बाहर थाफिर और क्या हो बहुत कुछ ख़याल दौड़ायाअलावा इन के मुझे और कुछ नहीं सूझाज़माने बाद समुंदर किनारे बैठा थाअज़ीम शय है समुंदर भी मेरे दिल ने कहावो क्या तरीक़ा हो मैं इस का भाग बन जाऊँसमझ में आया नहीं कोई रास्ता भी जबतो झुँझला के समुंदर में कर दिया पेशाब
जिस क़दर दुनिया में मख़्लूक़ात हैसब से अशरफ़ आदमी की ज़ात हैइस की पैदाइश में है उल्फ़त का राज़इस की हस्ती पर है ख़ुद ख़ालिक़ को नाज़इस की ख़ातिर कुल जहाँ पैदा हुआये ज़मीं ये आसमाँ पैदा हुआअक़्ल का जौहर इसे बख़्शा गयाइल्म का ज़ेवर इसे बख़्शा गयाइस के सर में है निहाँ ऐसा दिमाग़जिस में रौशन है लियाक़त का चराग़सोच कर हर काम कर सकता है येशेर को भी राम कर सकता है येये सफ़ाई से चटानें तोड़ देअपनी दानाई से दरिया मोड़ देमन-चला है इस की हिम्मत है बुलंदडाल सकता है सितारों पर कमंदइस को ख़तरों की नहीं पर्वा ज़राआग में कूदा ये सूली पर चढ़ाइस के हर अंदाज़ में ए'जाज़ हैअर्श तक इस नूर की परवाज़ हैइस की बातों में अजब तासीर हैख़ाक का पुतला नहीं इक्सीर हैये अगर नेकी के ज़ीने पर चढ़ेएक दिन सारे फ़रिश्तों से बढ़ेऔर अगर इस्याँ की दलदल में फँसेइस का दर्जा कम हो हैवानात सेये कभी रुई से बढ़ कर नर्म हैये कभी सूरज से बढ़ कर गर्म हैएक हालत पर नहीं इस का मिज़ाजहर ज़माने में बदलता है रिवाजऔर था पहले ये अब कुछ और हैआए दिन इस का निराला तौर हैइस ने बेहद रूप बदले आज तकइस की तदबीरों से हैराँ है फ़लकडॉक्टर ताजिर प्रोफ़ेसर वकीलइन का होना है तरक़्क़ी की दलीलइस के पहलू में वो दिल मौजूद हैजो भड़कने में निरा बारूद हैरेल गाड़ी रेडियो मोटर जहाज़इस की ईजादों का क़िस्सा है दराज़दस्त-कारी में बड़ा मश्शाक़ हैजिद्दतों का हर घड़ी मुश्ताक़ हैखोल आँखें जंग की रफ़्तार देखदेख इस के ख़ौफ़नाक औज़ार देखये कहीं हाकिम कहीं महकूम हैये कहीं ज़ालिम कहीं मज़लूम हैआदमी जब ग़ैर के आगे झुकाआदमिय्यत से भटकता ही गयाआदमी मिलना बहुत दुश्वार हैख़ुद ख़ुदा को आदमी दरकार हैप्यारे बच्चो आदमी बन कर रहोहर किसी के साथ हमदर्दी करोसच अगर पूछो तो बस वो मर्द हैजिस के दिल में दूसरों का दर्द है'फ़ैज़' पहुँचाता नहीं जो आदमीउस को अपनी ज़ात से है दुश्मनीउस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी
जब उस का बोसा लेता था सिगरेट की बू नथनों में घुस जाती थीमैं तम्बाकू-नोशी को इक ऐब समझता आया हूँलेकिन अब मैं आदी हूँ, ये मेरी ज़ात का हिस्सा हैवो भी मेरे दाँतों की बद-रंगी से मानूस है, इन की आदी हैजब हम दोनों मिलते हैं, लफ़्ज़ों से बेगाना से हो जाते हैंकमरे में कुछ साँसें और पसीने की बू, तन्हाई रह जाती है!हम दोनों शायद मुर्दा हैं एहसास का चश्मा सूखा हैया फिर शायद ऐसा है ये अफ़्साना बोसीदा हैदर्द-ए-ज़ेह से ज़ीस्त यूँही हलकान तड़पती रहती हैनए मसीहा आते हैं और सूली पर चढ़ जाते हैंइक मटियाला इंसान सफ़ों को चीर के आगे बढ़ता है और मिम्बर से चिल्लाता हैहम मस्लूब के वारिस हैं ये ख़ून हमारा विर्सा हैऔर वो सब आदर्श, वो सब जो वजह-ए-मलामत ठहरा थाइस मटियाले शख़्स के गहरे मेदे में खुप जाता हैफिर तफ़सीरों और तावीलों की शक्ल में बाहर आता हैये तावीलें मजबूरों का इक मौहूम सहारा हैंया शायद सब का सहारा हैंयूँही में आदर्श इंसान का जूया हूँसब ही सपने देखते हैं ख़्वाबों में हवा में उड़ते हैंफिर इक मंज़िल आती है जब फूट फूट कर रोते हैंशाख़ों की तरह टूटते हैंइक रूह-ए-जान-ओ-दिल को जो दुनिया में सब से बढ़ कर है पा लेते हैंफिर उस से नफ़रत करते हैं गो फिर भी मोहब्बत करते हैं!
सलीबें भी सभी ख़ाली मिलेंगीहर तरफ़ गिरजा-घरों मेंक्यूँ कि सब मासूम-तीनत लोगगली के मोड़ पर सूली से लटकेदुआ-ए-मग़्फ़िरत में हर घड़ी मसरूफ़ होंगेक़ातिलों के वास्तेअज़ानों मेंख़ुदा-ए-पाक के हर ज़िक्र के बदलेशायद किसी क़हहार या जब्बार कीहम्द ओ सना होगीहम अपनी आक़िबत की भीक माँगेंगेख़ुदा के नेक बंदों से
कौन समझेगा कि नेमत से भरी जन्नत मेंअज्नबिय्यत के अज़ाबों की मलामत क्या हैमेहर-ओ-अल्ताफ़-ओ-इनायत के फ़ुसूँ-ख़ाने मेंपास रहते हुए दूरी की अज़िय्यत क्या हैज़िंदगी की तो अलामत है ये एहसास मगरजाँ निकाले जो, ये एहसास की शिद्दत क्या हैदर्द हर एक उमूमी नहीं होता वर्नाकोई कह दे तो हमें कहने की हाजत क्या हैज़िंदगी हो भी और एहसास की सूली पे रहेदस्त-ए-क़ुदरत की ख़ुदा जानिए ग़ायत क्या है
वक़्त ने हम को किस रस्ते पर ला डाला हैदोनोंइक अन-चाही हम-राही की सूली ले करबोझल बोझल पाँव धरते जाएँ चलते जाएँ
मज़हब की तलवार बना करख़्वाहिशों के अंधे घोड़े पर सवारमेरे मन आँगन को रौंद डालामेरे भरोसे को सूली पर टाँग करतुम ने दूसरा ब्याह रचा लियातुम्हारे संग गुज़ारे पल पल कोमैं ने अपने मास पर खाल की तरह मुंढ लिया थातुम्हारे साथ आँचल बाँध करबाबा का आँगन पार कर केतुम्हारे लाए साँचे मेंमैं ने पाया था अपना वजूदप्यार क्या है ये नहीं जानतीपर तुम्हारे घर ने बड़ के पेड़ सी छाँव की थी मुझ परबचाया था ज़माने के गुनाहों केतीरों की बौछाड़ सेइस साँचे में रहने की ख़ातिरमैं अपने वजूद को काटती छाँटती तराशती रहीतुम्हारे लहू की बूँद को अपने मास में जन्म दियाऔलाद भी हम दोनों का बंधन न बन सकीबंधन क्या है ये नहीं जानतीमुझे फ़क़त एक सबक़ पढ़ाया गया थातुम्हारा घर मेरी आख़िरी पनाह-गाह हैमैं ने कई बार देखा हैज़माने की निगाहों से संगसार होतेतलाक़-याफ़ता औरत कोइस लिए बारिश से डरी बिल्ली की तरहघर के एक कोने और तुम्हारे नाम के इस्ती'माल परक़नाअ'त किए बैठी रहीजन्नत क्या है जहन्नम क्या है ये नहीं जानतीमगर इतना यक़ीन हैजन्नत भरोसे से बाला-तर नहींऔर जहन्नम सौत के क़हक़हों से बढ़ कर गिराँ नहींतानों और रहम भरी नज़रों से बढ़ कर मुश्किलकोई पुल-सिरात नहींकभी कभी सोत का चेहरा मुझे अपना जैसा लगता हैउस की पेशानी पर भीमैं ने बे-ए'तिबारी की शिकनें देखी हैंजब वो मुझे देखती हैख़ुशी उस के सीने मेंहाथों में दबाए कबूतर की तरह फड़ फड़ा उठती हैमैं उन से लड़ नहीं सकतीउन में तुम शामिल होमैं तुम से लड़ नहीं सकतीमज़हब क़ानून और समाज तुम्हारे साथ हैंरीतें रस्में तुम्हारे हथियार हैंदिल चाहता है कि ज़िंदगी की किताब सेवो बाब ही फाड़ कर फेंक दूँजो अपने मफ़ाद में तुम नेमेरे मुक़द्दर में लिक्खा है
और इस के बा'द भी क़ुर्बानियाँ देते रहेफिर भगत सिंह और साथी उस के सूली पर चढ़ेसर पे लाला-लाजपत राय के भी डंडे पड़ेबोस बाबू मुल्क से बाहर ही जा कर मर गए
1सरिश्क-ए-ख़ूँ रुख़-ए-मज़मून पे चलता है तो इक रस्तानिकलता हैनदी दरिया पे थम जाएलहू नुक़्ते पे जम जाए तो उन्वान-ए-सफ़र ठहरेउसी रस्ते पे सरकश रौशनी तारों में ढलती हैउसी नुक़्ते की सूली पर पयम्बर बात करते हैंमुझे चलना नहीं आताशब-ए-साकिन की ख़ाना-ज़ाद तस्वीरो गवाही दोफ़सील-ए-सुब्ह-ए-मुमकिन पर मुझे चलना नहीं आतामिरे चश्मों में शोर-ए-आब यकजा बर-शकाली हैनदी मक़रूज़ बादल कीमिरा दरिया सवाली हैरग-ए-हर्फ़-ए-ज़ुबूँ में जो चराग़-ए-ख़ूँ सफ़र में हैअभी उस नुक़्ता-ए-आख़िर के ज़ीने तक नहीं आताजहाँ जल्लाद का घर हैजहाँ दीवार-ए-सुब्ह-ए-ज़ात के रख़्ने से निगह-ए-ख़शमगींबारूद की चश्मक डराती हैजहाँ सूली के मिम्बर पर पयम्बर बात करते हैं2अब इन बातों के सिक्के जेब के अंदर खनकते हैं कि जिन परक़स्र-ए-शाही के मनाज़िरअस्लहा-ख़ानों से जारी हुक्म कुंदा हैंभरे बाज़ार में तिफ़्ल-ए-तही-कीसा परेशाँ है कि उस के पाँवटक्सालों के रस्ते से अभी ना-आश्ना हैंऔर उस का बाप गूँगा हैनदी रुक रुक के चलती हैतकल्लुम रेहन रखने से सफ़र आसाँ नहीं होताहुआ पसपा जहाँ पानीजहाँ मौजों ने ज़ंजीर-ए-वफ़ा पहनी सिपर गिर्दाब की रख दीअलम रखे क़लम रखेख़फ़ा बादल ने जिन पायाब दरियाओं से मुँह मोड़ाजहाँ ताराज है खेतीजहाँ क़र्या उजड़ता हैतनाब-ए-राह कटती है कहीं ख़ेमा उखड़ता हैवहाँ से दूर है नदीवहाँ से दूर है बच्चा कि उस के पाँवदरियाओं के रस्ते से अभी ना-आश्ना हैंऔर उस का बाप गूँगा हैउसे चलना नहीं आताफ़सील-ए-सुब्ह-ए-मुमकिन पर उसे चलना नहीं आता3सहर के पास हैं मंसूख़ शर्तें सुल्ह-नामे कीसबा दर्स-ए-ज़ियाँ-आमोज़ की तफ़्सील रखती हैकिसी तमसील में तुम होकिसी इज्माल में मैं हूँकहीं क़िर्तास ख़ाली का वो बे-उनवान साहिल हैजहाँ आशुफ़्तगान-ए-अद्ल ने हथियार डाले हैंबहुत ज़ातें हैं सदमों कीकई हिस्से हैं सीने में नफ़स गुम-कर्दा लम्हे केकई तबक़ात हैं दिन केकहीं सुब्ह-ए-मुकाफ़ात-ए-सुख़न के मंतक़े में तुम मुक़य्यद होकिसी पिछले पहर के सुल्ह-नामे की अदालत मेंकड़ी शर्तों पर अपने दस्तख़त के रू-ब-रू मैं हूँसुनो क़िर्तास-ए-ख़ाली के सिपर-अंदाज़ साहिल सेहवा क्या बात कहती हैइधर उस दूसरे साहिल से जो मल्लाह आया हैज़मीनें बेचती बस्ती से क्या पैग़ाम लाया हैकोई ता'ज़ीर की धमकीकोई वा'दा रिहाई काकोई आँसूकोई छुट्टी
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