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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
किसी ने ज़हर-ए-ग़म दिया तो मुस्कुरा के पी गए
तड़प में भी सुकूँ न था, ख़लिश भी साज़गार थी
आमिर उस्मानी
नज़्म
तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन दुनिया से जो मुझ को मिली
झलकियाँ उस की न आईं कुछ मिरी तहरीर में
अख़तर बस्तवी
नज़्म
निगार-ए-शाम-ए-ग़म मैं तुझ से रुख़्सत होने आया हूँ
गले मिल ले कि यूँ मिलने की नौबत फिर न आएगी